बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां
- निदा फ़ाजली
बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका बासन, चिमटा फुकनी जैसी मां
चिड़ियों की चहकार में गूंजे राधामोहन अली अली
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती घर की कुंडी जैसी मां
बान की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी भरी दोपहरी जैसी मां
बीवी, बेटी, बहिन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सबमें
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां
बांट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गयी
फटे पुराने इक एलबम में चंचल लड़की जैसी मां
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साभार – नया ज्ञानोदय, अंक मार्च 2007 – उर्दू कहानी विशेषांक. प्रकाशक – भारतीय ज्ञानपीठ, पोस्ट बॉक्स नं. 3113, नई दिल्ली 110033
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चित्र – 48x48 इंच बोर्ड पर तैल रंग से बनी विनोद शाह की कलाकृति.












6 टिप्पणियाँ.:
रवि जी
इस शनिवार को एनडीटीवी के गुडमार्निंग इंडिया कार्यक्रम में हमने रचनाकार के बारे में जानकारी दी थी । आपको पहले बताना भूल गया था । हमने रचनाकार में मनोहर श्याम जोशी पर चल रही बहस पर चर्चा की थी । रवीश कुमार
कस्बा से
रवीश जी,
धन्यवाद. मुझे भी बाद में पता चला और यह प्रसारण देख नहीं पाया. श्रृजन शिल्पी जी ने बताया था और बाद में अविनाश जी से ईमेलिया बातचीत भी हुई थी.
बहरहाल, एनडीटीवी के जरिए हिन्दी चिट्ठों को आम जनता तक पहुँचाने का एक और माध्यम प्रस्तुत करने के लिए आप सभी साधुवाद के पात्र हैं.
रवि भाई
अच्छा लगा निदा फ़ाजली की यह गज़ल पढ़ कर. पिछली बार जब वे वाशिंगटन में मुशायरे में आये थे ( २००५ ) में, तब उनसे सुनी थी. आज आपने याद ताजा कर दी.
धन्यवाद
निदा फ़ाजली जी पेशकश देने के लिये आपका साधूवाद!!
निदा फाजली की ये कविता मेरी पसंदीदा है । कुछ साल पहले अनुभूति पर पढ़ी थी । यहाँ बाँटने का शुक्रिया !
बहुत ही अच्छा लगा पढ़ कर निदा फाज़ली जी का मैं फैन हूँ मेरी सबसे प्रिया पुस्तक भी उनकी लिखी गजलों का संग्रह है. सफर मे धूप तो होगी उसमे भी ये ग़ज़ल शामिल है. बहुत बहुत साधुवाद
Arun Mittal Adbhut
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