May 15, 2008

शैलेन्द्र चौहान की कविताएं

krishna kumar kabir

दो कविताएं

 

-शैलेन्द्र चौहान

(1)

कबीर बड़ी

बड़ी/तुम्हारी आत्मा की पहचान

ताँत, तुम्हारी रगें

तन, रबाब

अभिन्न

परमात्मा और तुम

हम कैसे पहचानें

नर्मदा इस पार

धान, कबीर बड

हैं मंदिर में विराजे

राम

पार धार

हनुमान

नाव, नदी बीच

बड का पेड़ मुस्तैद

छाता ताने मंदिर पर

भक्त, गाते-नाचते

मौज में

खाते खूब

पिकनिक का आनंद बहुत

लहरों के साथ

झिलमिलाती है

कबीर दास की आकृति

नर्मदा प्रवाह में

कोई कैसे सुने

विरहा

और तुम्हारे व

साईं बीच

अकथ संवाद।

लोअर परेल

धागे पर धागे

धागे पर धागे

कौन सा स्पूल

कोई करघा

वो चरखा

क्या है

बुना

उलझा,

ताना

बाना,

सूत गिरणी कहाँ

झाँकती ईंट-दीवारों से

धुएँदार पस्ती

दशकों से बंद

हलचल

थम चुके चर्चे

बेरोजगारी के

साजिशें फली-फूलीं बहुत

अरबों की सम्पत्ति

धुआँती आकृतियाँ

खो चुकीं वजूद

रेशमी सफेद कुरते में

देवदूत विराजे हैं, अब

यहाँ।

 

(2)

जघन्यतम

हवा में

चित्राकृतियाँ विचित्र

तीव्र

ध्वनि तरंगें

मस्तिष्क में

समरूपी रसायन वह

मनुष्य!

हवा...

हवा!

मनुष्य...

हवा!

प्रहारी...

हवा!

शिकारी...

हवा!

कटारी

चित्राकृतियाँ

नराधम नरपिशाचों की

अबोध वध

कितने बाल कंकाल

विरूपी रसायन

लीपा पोती इंटेलीजेंस

निठारी!

निठारी!

निठारी!

काँपते हुए

रोज मिल जाते

कहीं भी

किसी भी स्थान

दौड़ती राज्य परिवहन की

बस के पीछे

मुस्कराते

अनेक रंगरूपों में

कभी बाँध का महत्व

कहीं धरती का निजत्व

वनवासी तो कहीं किसान

विकास और प्रगति की

धनी चिता झाँकती

हल्की सफेद दाढ़ी से

इधर विकास

प्रगति उधर

राजपथ पर सदा

झूमती गाती

कितनी उत्तेजना

कितना भावातिरेक

लोकार्पण चौदह सौ पचास मेगावाट

पावर हाऊस का

एक सौ बाईस मीटर

ऊँचे बाँध का

बहुत कुछ है प्रदोलित

और कंपित

इतिहास में झाँकता, नरोडा,

भुज, गोधरा, बड़ौदा, जूनागढ़

निर्मल, निरामय इश्तहारों के भीतर।

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१९ रामकुमार एस्टेट, मकरपुरा रोड

बडौदा ३९००१३ (गुजरात)

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(चित्र - कृष्णकुमारअजनबी की कलाकृति)

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