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March 3, 2007

होरी खेरत नखरारी नार



–हरिहर झा

पिचकारी खेले ससुरी ऐसे

रंग फेंक कर के मचलती कैसे

बौछार तीर की निकलती ज्वाला

चमकार बिजली की झूमती बाला


लुभायमान लगती रंग से भरी वो

लम्बी छरहरी लगती परी वो

हुडदंग के बीच बेखबर हो घूमती

आंचल में रंग लिये मस्ती से झूमती


जग किसके रंग से रंगमय हो रहा

छलकता तारुण्य नयन से बह रहा

नादानी देख कर उसे न डांटना

पीते ही स्नेह वह चाहती बांटना


कलाई से पकड़ कोई मसखरी करता

तन भीगा मन कैसी ख्वाहिश से भरता

कोई भी मनचला मन में न डरता

कस कर हथेली से आलिंगन भरता


नखरारी नार की अल्हड़ता कैसी

सबके आगोश में बेशरम वैसी

ख्याल बुरा लाये तो देगी वो गारी

वो है तुम्हारी प्यारी पिचकारी

ooo.......

चित्र - डॉ भावसार की कलाकृति

2 टिप्पणियाँ.:

miredmirage said...

बहुत बढ़िया !
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

होली की बहुत शुभकामनायें और मुबारकबाद!!

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