सुधा भार्गव की दो लघुकथाएँ
१--काठी
"रेनू ,हम तो तुम्हे देखने के लिए तरस गए .आस्ट्रेलिया में तुमने पांच माह तो बिता दिए होंगे !तुम्हारा मन कैसे लग गया .मैं हर साल कैलीफोर्निया जाती तो हूँ पर दो माह में ही उकता जाती हूँ !."शन्नो ने चुटकी ली !.
"मेरी बहू बातें बनाने में बहुत माहिर है और मेरे स्वास्थ्य की कामना करती रहती है .तभी वहां टिक पाई हूँ !.
"तब तो वह बहुत अच्छी है !!."
"है भी और नहीं भी !."
"पहेलियाँ न बुझाओ !."
"अच्छी है क्योंकि वह् बहुत अच्छी है .अच्छी नहीं भी है ,क्यों कि मेरी सेहत की दुआ मेरे लिए नहीं अपने लिए करती है ".
"तुम्हारी बातें इतनी उलझनभरी हैं कि उनकी तह तक मैं नहीं पहुँच पाती ".
"साधारण सी बात है .जितनी मैं तंदरुस्त रहूँगी उतनी ही बहू की सेवा कर सकूंगी .!!महाराजिन ,जमादारिन ,आया ,अम्मा ,दादी माँ आदि की भूमिका एक साथ निभाने के लिए मजबूत काठी की जरुरत होती है !.
२ जलजला
"नानी ----नानी !जलपरी की कहानी सुनाओ!"
"अरे बेटा ,अब जलपरी कहाँ रहीं !परी तो उड़ गई !केवल जल ही रह गया ,वह भी जला हुआ !"
"अच्छा !जलजला की कहानी ही सुना दो !"
कहानी शुरू हुई --
सु नो लाडले ,एक लड़का था !चलते -चलते थक गया !सोचने लगा -चुल्लू भर पानी मिल जाये तो अपनी प्यास बुझा लूँ !
रास्ते में एक नदी मिली !उसे देखकर उसकी हिरदय बल्लरी उछालने लगी !पीछे से आवाज आई --ज्यादा उचल मत !यहाँ का पानी तेरे लिए नहीं ,जल बोर्ड के लिए है !टनों पानी टैंकों में भरकर जाएगा !
"इतना पानी-- ! उसका क्या होगा ?"
"उसको गंगा की तरह पवित्र करके बेचा जायेगा !"
"फिर मैं पानी कहाँ पीऊ ?"
आगे बढ़ --!
थोड़ी दूर जाकर उसने बहते झरने से ओके लगाकर पानी पीना चाहा !भरपूर हाथ का मुक्का उसकी कमर पर पड़ा "
"अबे यहाँ का पानी तू कैसे पी सकता है !यहाँ हम जैसे भद्र लोगों के लिए है !"
"यहाँ तो बहुत पानी है !इसका क्या करोगे ?"
इसे पाइप के सहारे घर की टंकियों में भरेंगे !फिर एक्वागार्ड से शुद्ध करके थोडा पीयेंगे ,थोडा जमा करेंगे !"
"फिर मैं कहाँ पीऊ ?"
आगे बढ़ ---
कुछ मिनट रास्ता पार करने के बाद उसे मटमैला सा पानी दिखाई दिया !झूमता बोला -"यही मेरे हिस्से का पानी होगा !सबसे अलग -थलग !जैसा मैं वैसा यह !कुछ कला ---कुछ पीला !
परन्तु यह क्या !वहां तोतींन चार लड़के पहले से ही झगड़ रहे थे !एक कहता --पहले मैं कनस्तर भरूँगा !दूसरा कहता --पहले मैं बोतल भरूँगा "इसी गुत्थम -गोत्था में किसी का सिर फुटा ,किसी की कोहनी !
दूर से आते लड़के ने मौके का फायदा उठाया और पेट भरकर पानी पी गया ! बेस्वाद है या बदबूदार !यह सोचने का उसे समय कहाँ !बस पानी --पा --नी पानी ही तो पीया था !
पानी पीते ही पेट में कुछ -कुछ होने लगा !देखते ही देखते जलजला आ गया !जो पानी अंदर गया था वह ज्यों का त्यों बाहर आ गया --साथ में ढेर सारा खून ! चुल्लू पानी पीया , -मुट्ठी खून निकला !पहले पानी का रंग मटमैला था ,सिर्फ मटमैला ! अब तो लाल भी हो गया !लड़ाकू बच्चे लड़ते -लड़ते ही ढेर हो गए और जिसे पानी मिला ,वह
पानी पीकर ढेर हो गया !
लो ,जल की कहानी पुरी हुई
जो सुने वह छतपटाये
जो न सुने वह पछताए !
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परिचय --सुधा भार्गव
जन्मस्थल --अनुपशहर ,जिला --बुलंदशहर--भारत
शिक्षा --बी ,ए.बी टी ,रेकी हीलर
शिक्षण --बिरला हाई स्कूल कलकत्ता में २२ वर्षों तक हिन्दी भाषा का शैक्षिक कार्य |अ
साहित्य सृजन ---
विभिन्न विधाओं पर रचना संसार
साहित्य संबन्धी संकलनों में तथा पत्रिकाओं में रचना प्रकाशन
प्रकाशित पुस्तकें
रोशनी की तलाश में --काव्य संग्रह
बालकथा पुस्तकें---
१ अंगूठा चूस
२ अहंकारी राजा
३ जितनी चादर उतने पैर ---सम्मानित
आकाश वाणी दिल्ली से कहानी कविताओ. का प्रसारण
सम्मानित कृति--रोशनी की तलाश में
सम्मान --डा .कमला रत्नम सम्मान
पुरस्कार --राष्ट्र निर्माता पुरस्कार (प. बंगाल -१९९६)
अभिरुचि --देश विदेश भ्रमण ,पेंटिंग .योगा
वर्तमान लेखन का स्वरूप
संस्मरण --कनाडा के १५१ दिन ..,बाल साहित्य
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संपर्क --जे =७०३ स्प्रिंग फील्डस
#१७/२० अम्बालिपुरा विलेज
बेलंदुरगेट
सरजापुरा रोड
बैंगलोर -५६०१०२
कर्नाटक (भारत











3 प्रतिक्रियाएँ.:
काठी कथा तो एक दम आज के हालात पर फिट बैठती है और जलजला शायद निकट भविश्य की चेतावनी दे रहा है इन सुन्दर कथाओं के लिये उशा जे को बधाई और इन से परिचित करवाने के लिये आपका धन्यवाद््
कमाल की कहांनियाँ हैं ।
aapko yahan dekh kar bahut achchha lagaa, badhai.
laghukathayen pasand aain.
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