Online TransLiteration powered by Girgit.Chitthajagat.in, of http://rachanakar.blogspot.com/ Disclaimer
You may also see this page in Bangla, Devanagari, Gujarati, Gurmukhi, Kannada, Malayalam, Oriya, Roman(eng), Tamil, Telugu

आलेख | उपन्यास | कविताएँ | कहानियाँ | कहानी-संग्रह | ग़ज़लें | चुटकुले | बाल-कथाएँ | लघुकथाएँ | व्यंग्य | संस्मरण | समीक्षाएं | हिन्दी ई बुक रचनाकार को सहयोग दें

********

Google
 

December 4, 2008

सीताराम गुप्ता का आलेख : धर्म और आध्‍यात्‍मिकता नहीं, मुक्‍त करता है हास्‍य

sitaram gupta

उर्दू शायर ‘ज़फ़र' गोरखपुरी का एक दोहा है ः

हद से अधिक संजीदगी, सच पूछो तो रोग,

आगा-पीछा सोचते, बूढ़े हो गए लोग।

कुछ लोग सदैव गंभीर बने रहते हैं। अवसादग्रस्‍त लटके हुए चेहरे लिए घूमते रहते हैं। उनकी त्‍वचा से, उनके चेहरों से उनकी उम्र का पता ही नहीं चलता। चालीस की अवस्‍था में साठ के प्रतीत होते है। जो लोग जितने गंभीर बने रहते हैं उतनी ही ज़्‍यादा उम्र के दिखते हैं और उसी के अनुसार उनका उत्‍साह भी मंद पड़ता जाता है। इस प्रकार हँसी का संबंध न केवल आरोग्‍य और दीर्घायु से है अपितु बुढ़ापा रोकने में भी हास्‍य की भूमिका अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है। वस्‍तुतः हास्‍य ही एकमात्र ओषधि है जो बाह्म रूप से आपके चेहरे की झुर्रियों को रोकने में सक्षम है तथा आंतरिक रूप से आपको उत्‍साहपूर्ण बनाए रखने में क्‍योंकि हास्‍य व्‍यायाम के साथ-साथ एक उत्तम टॉनिक भी है। अतः हँसते रहिए और बुढ़ापे को सदा के लिए अलविदा कह दीजिए।

हास्‍य द्वारा हमारे शरीर की जीव-रासायनिक संरचना में परिवर्तन आता है। हँसने से तनाव उत्‍पन्‍न करने वाले हार्मोन के स्‍तर में कमी आती है जिससे शरीर तनावमुक्‍त हो जाता है और तनाव मुक्‍ति का अर्थ है अच्‍छा स्‍वास्‍थ्‍य। इसके अतिरिक्‍त हँसने से शरीर में एंडोर्फिन नामक हार्मोन की मात्रा में वृद्धि होती है जो शरीर के लिए स्‍वाभाविक रूप से दर्द निवारक और रोग अवरोधक का काम करता है। एक रिसर्च के अनुसार हँसने और ख्‍़ाुश रहने से टी. लिंफोसाइट्‌स अधिक क्रियाशील हो जाते हैं जिनसे उन प्राकृतिक सेलों के निर्माण में वृद्धि होती है जिन्‍हें किलर सेल कहते हैं। ये किलर सेल कैंसर जैसे घातक रोग पैदा करने वाले भयानक सेलों को विनष्‍ट करने में सक्षम होते हैं। इस प्रकार हँसने-हँसाने से भयानक रोगों से छुटकारा पाने में भी सहायता मिलती है। कहने का तात्‍पर्य ये है कि हँसने से शरीर के लिए उपयोगी हार्मोन का उत्‍सर्जन प्रारंभ हो जाता है जो हमारे अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए ज़्‍ारूरी है इस प्रकार हँसना अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य का प्रतीक और पर्याय है।

ओशो कहते हैं, ‘‘मैं नहीं चाहता कि तुम गंभीर रहो। मैं गंभीरता के कतई खिलाफ़ हूँ - यह एक आध्‍यात्‍मिक बीमारी है। हँसी आध्‍यात्‍मिक स्‍वास्‍थ्‍य है, हँसी बोझ रहित है। जब तुम हँसते हो तो अपने मन को आसानी से अलग रख सकते हो। जो व्‍यक्‍ति हँस नहीं सकता उसके लिए बुद्धत्‍व के द्वारा बंद हो जाते हैं। मेरे लिए हँसी का बहुत महत्‍व है। किसी धर्म ने इस बारे में कभी नहीं सोचा। वे हमेशा गंभीरता पर ज़्‍ाोर देते रहे और इसी कारण सारा विश्‍व मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार है।''

इस मनोवैज्ञानिक रूग्‍णता से बचना है तो हँसना सीखिए। हँसने की बात को हँसी में मत उड़ाइए। ज़्‍ारा गंभीर हो जाइए। फिर धोखा खा गए न आप! मेरा मतबल है जीवन के प्रति नहीं अपितु हँसने के प्रति गंभीर हो जाइए। जो जीवन को गंभीरता से ले रहे हैं उन्‍हें हँसने की सख्‍़त ज़रूरत है। हास्‍य ही गंभीरता को तरल बना सकता है और यह तरलता आपको तनावमुक्‍त कर स्‍वस्‍थ बना सकती है। इसलिए जीवन में ऐसे अवसर खोजिए जो आपके बार-बार मुस्‍कराने और हँसने के अवसर उपलब्‍ध कराएँ। भूतकाल की उन घटनाओं को मन में लाएँ जो हँसने का अवसर प्रदान करें।

प्रयास कीजिए कि बिना बात भी मुस्‍कराएँ। किसी को देखकर, बातचीत शुरू करने से पहले अथवा घंटी बजने पर फोन उठाने से पहले अवश्‍य मुस्‍कराएँ। ये मुस्‍कराहट आपके जीवन को रूपांतरित कर देगी। अपनी ग़लतियों और बेवकूफियों पर भी मुस्‍कराएँ। गंभीरता भी एक भाव है और प्रफुल्‍लता भी एक भाव है। जब आप गंभीरता ओढ़ सकते हैं तो प्रफुल्‍लता क्‍यों नहीं? जब आप लाल रंग की क़मीज़ पहन सकते हैं तो नीले रंग की क्‍यों नहीं पहन सकते? दृष्‍टिकोण में थोड़ा परिवर्तन करने की आवश्‍यकता है बस। गंभीरता नकारात्‍मक दृष्‍टिकोण से उत्‍पन्‍न मनोभाव है तो हास्‍य सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण से उत्‍पन्‍न अवस्‍था। सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण द्वारा गंभीरता रूपी केंचुली सदा के लिए उतार फेंकिए। बहाने बहाना छोड़िए और थोड़ा मुस्‍कराइए। इसके बाद हँसिए और शोर-शोर से ठहाके लगाइए। यही जीवन का अमूल्‍य रस है यही उत्‍साहपूर्ण जीवन जीने की कला है।

साभार ः ‘‘द स्‍पीकिंग ट्री'' नवभारत टाइम्‍स, नई दिल्‍ली, दिनाँक ः 29ः11ः2008

-----

सीताराम गुप्‍ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्‍ली-110034

0 टिप्पणियाँ.:

प्रकाशनार्थ रचनाएं आमंत्रित हैं

रचनाकार में प्रकाशनार्थ हर विधा की रचनाओं का स्वागत है. अपनी या अपने रचनाकार मित्रों की रचनाएँ हिन्दी के किसी भी फ़ॉन्ट यथा - कृतिदेव, डेवलिस, श्रीलिपि, शुषा, वेबदुनिया, जिस्ट-आईएसएम, लीप या किसी भी अन्य फ़ॉन्ट में पेजमेकर या एमएस वर्ड फ़ाइल के रूप में अपनी रचना ई-मेल के जरिए rachanakar@gmail.com .के पते पर भेजें. विस्तृत जानकारी बाजू पट्टी में देखें. आप अपनी रचनाओं के सस्वर ऑडियो/वीडियो पाठ की सीडी भी प्रकाशनार्थ भेज सकते हैं जिन्हें कुछ इस तरह [ देखने के लिए इस कड़ी/लिंक पर क्लिक करें] प्रकाशित किया जा सकेगा. ......................