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September 19, 2008

डॉ.श्रीकृष्ण राऊत की चंद ग़ज़लें

चंद ग़ज़लें

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- डॉ.श्रीकृष्ण राऊत

shrikshrina raut

1.
मुबारक हो।


सूखी घास के ढेर को शरारा मुबारक हो,
अंधो को रोशनी का नजा़रा मुबारक हो।
किसने उँडेल दी है कालिख आसमाँ पर,
गर्दिश मे डुबता वो सितारा मुबारक हो।
पाँव निकल पडे तो रास्ते अपाहिज हो गये,
लो बैसाखियो का सहारा मुबारक हो।
फूलो के सर क़लम कर दिये पत्तो की धार ने,
अहल-ए-चमन को लहू का फुहारा मुबारक हो।
दो गज़ ज़मीन नसीब हो गयी यही बहुत है,
सिकंदरो को अब जहान सारा मुबारक हो।

2.
ग़ज़ल

हर मुश्किल का हल हो जैसे
आज नही तो कल हो जैसे
आबाद हो गयी दिल की दिल्ली
घर छोटासा, महल हो जैसे
महकी महकी बाते उसकी
पके आम के फल हो जैसे
सूना सूना लगे भीड मे
शहर नही जंगल हो जैसे
यही ठहरती सुई घडी की
तेरी याद का पल हो जैसे
मेरे ऐब भी प्यारे तुझको
तू माँ का आँचल हो जैसे

3.
ग़ज़ल

गली प्रेम की छूटी हम से, कहने को है बात ज़रासी
क़िस्मत अपनी रूठी हमसे, कहने को है बात ज़रासी
धीमे धीमे रही सुलगती दिल मे बस्ती अरमानो की
चिंगारी सी फूटी हम से, कहने को है बात ज़रासी
कहो आप ही कैसे निकले आख़िर सच्चे बयान अपने
क़समे ले ली झूठी हमसे, कहने को है बात ज़रासी
सरपर चढ़कर धूप नाचती,भाप बनाती ख़याल सारे
एक सुराही टूटी हम से कहने को है बात ज़रासी

4.
ग़ज़ल

है व‍क्‍़त अभी भी संभल जा
इस दलदल से बचके निकल जा
नही निवाला मिलनेवाला
पानी के दो घूँट निगल जा
कहता है ये बदला मौसम
कल की मैली शकल बदल जा
किसी कुँवारे ख़याल की तरह
आकर दिल मे खूब मचल जा
उम्रभर न उलझ खिलौनो से
घडी दो घडी यूंही बहल जा
रूई जैसा दबता क्या है
दबे गेंद सा जरा उछल जा

5.
ज़रा सोचो

कभी ये दिन भी आयेगा ज़रा सोचो
कली को फूल खायेगा ज़रा सोचो
सभी को रौंदते निकला बेरहमी से
कहाँ पर रथ ये जायेगा ज़रा सोचो
मिलेंगे ना तुम्हे माने किताबो मे
तजुर्बा साथ लायेगा ज़रा सोचो
बचाओ रोशनी थोडी वफा़ओ की
घना अंधेर छायेगा ज़रा सोचो
नही है याद दिल्ल्ली को सम्राटो की
वो किसको याद आयेगा ज़रा सोचो
अगर तुम भी रहे मश्ग़ूल सियासत मे
ग़ज़ल को कौन चाहेगा ज़रा सोचो

6.
ग़ज़ल

ना अता,ना पता
आदमी लापता
गुम हुई कब नदी
ऐ किनारे बता
हाल क्या गाँव का
क्या शहर जानता
खो चले स्कूल मे
बच्चे अपना पता
कर ज़रा सामना
दूर क्यों भागता

7.
रोटी के अजगर ने

रोटी के अजगर ने निगली हयात आधी
चबाली उसूलो ने बाकी हयात आधी
आज बाप को लटके देखा बेटी ने जब
दिल के दिल मे गयी लौटके बरात आधी
उसे मनाते पलके बोझल हुई चाँद की
करवट बदले रही जागती जो रात आधी
जुल्फे,रिश्ते,धरम,किताबे नाम कैद के
रिहा हुये तो हरदम पायी निज़ात आधी
भरी जवानी मे ये पड़ते कागज़ पीले
पढ़ते रहती टूटी फूटी दवात आधी
लगे अभी से रोने आँसू आप खून के
अभी सुनाई मैने तो वारदात आधी

------

5 प्रतिक्रियाएँ.:

रंजन राजन said...

रचनाकार ब्लाग नहीं साहित्य लाइब्रेरी है।
डा.राऊत की ताजा रचना के लिए रतलामी जी का धन्यवाद।
-
गली प्रेम की छूटी हम से, कहने को है बात ज़रासी
क़िस्मत अपनी रूठी हमसे, कहने को है बात ज़रासी
धीमे धीमे रही सुलगती दिल मे बस्ती अरमानो की
चिंगारी सी फूटी हम से, कहने को है बात ज़रासी
.............सचमुच उम्दा..........

MANVINDER BHIMBER said...

सूखी घास के ढेर को शरारा मुबारक हो,
अंधो को रोशनी का नजा़रा मुबारक हो।
किसने उँडेल दी है कालिख आसमाँ पर,
गर्दिश मे डुबता वो सितारा मुबारक हो।

MANVINDER BHIMBER said...

सूखी घास के ढेर को शरारा मुबारक हो,
अंधो को रोशनी का नजा़रा मुबारक हो।
किसने उँडेल दी है कालिख आसमाँ पर,
गर्दिश मे डुबता वो सितारा मुबारक हो।
bahur sunder ....dil ko chune waali gajalon ki prastuti ke liye badaaee

Dr. Amar Jyoti said...

गुम हुई कब नदी
ए किनारे बता।

बहुत ही सुंदर ग़ज़लें हैं।
उपलब्ध कराने के लिये आभार।

डॉ.श्रीकृष्ण राऊत said...

* MANVINDER BHIMBER

* रंजन राजन

* Dr.Amar Jyoti

* आप सबको बहुत बहुत धन्यवाद।

* डा.श्रीकृष्ण राऊत

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