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July 6, 2008

महेन्द्र भटनागर का कविता संग्रह – नई चेतना (6)

mahendra bhatnagar1

 

(पिछले अंक से जारी…)

 

(20) दूर खेतों पार

शीत की काली भयावह रात !

दूर खेतों पार जर्जर ढूह

जीवन स्तब्ध,

धुंध भीषण, काँपती प्रति रूह;

जन-मन दग्ध,

मूक प्राणों के दमन की बात !

मर्म पर अंतिम विनाशक चोट

घायल त्रस्त,

ले तिरस्कृत प्राण, रज में लोट

पीड़ा ग्रस्त

बद्ध, शोषित, रक्त से तन स्नात !

एक रोदन का करुणतम शोर

गौरव नष्ट,

छा रहा वैषम्य-विष चहुँ ओर

संस्कृति भ्रष्ट,

साँस प्रति कंपन सिहरता गात !

नाशकारी गाज सिर पर टूट

मानव दीन,

सभ्यता का अर्थ हिंसा लूट

ममता हीन,

खो गया तम के विजन में प्रात !

1951

(21) युग और कवि

नाश का क्रन्दन भरा,

यह हार का

दारिद्रय का

दुर्भिक्ष का

अवरुद्ध पथ का

युद्ध का

मिटता हुआ,

बंधुत्व से हटता हुआ

इतिहास है, इतिहास है !

संस्कृति, कला औ' सभ्यता का

सामने मानों खड़ा उपहास है !

जब आज दानव कर रहा

शोषण भयंकर

रूप मानव का बनाये,

और उठती जा रही हैं

स्नेह, ममता की

मनुज-उर-भावनाएँ,

बढ़ रही हैं तीव्र गति से

श्वास पर हर

चिर बुभुक्षित मानवों के

दग्ध-जीवन की

विषैली गैस-सी घातक कराहें !

ध्वंस का

निर्मम मरण का,

घोर काला

यातना का

चित्र यह म्रियमाण है !

उजड़ा हुआ है अन्दमन-सा !

सिहरता तीखा मरण का गान है !

आदर्श सारे गिर रहे;

मानव बुझा कर

ज्ञान का दीपक

निविड़तम-बद्ध दुनिया

देखना बस चाहता है;

क्योंकि उसके पाप अगणित

कौन है जो देख पाएगा ?

धरा पर

'शांति, सुख, नवयुग-व्यवस्था' के लिए

वह लूट लेगा

विश्व का सर्वस्व !

लोभी ! लड़ रहा है,

कर रहा है ध्वस्त

कितने लहलहाते खेत,

मधु जीवन !

रही है मिट मनुजता ही स्वयं

मानों कि की

'हाराकिरी' भगवान ने !

है मंद जीवन-दीप की

आभा सुनहली।

युग हुआ शापित कलंकित ;

किन्तु तुम होना न किंचित

धैर्य विगलित, चरण विजड़ित !

कवि उठो !

रचना करो,

तुम एक ऐसे विश्व की

जिसमें कि सुख-दुख बँट सकें,

निर्बन्ध जीवन की

लहरियाँ बह चलें,

निर्द्वन्द्व वासर

स्नेह से परिपूर्ण रातें कट सकें,

सब की,

श्रमात्मा की, गरीबों की

न हो व्यवधान कोई भी !

नये युग का नया संदेश दो !

हर आदमी को आदमी का वेश दो !

1947

(22) विश्वास

बढ़ो विश्वास ले, अवरोध पथ का दूर होएगा !

तुम्हारी ज़िन्दगी की आग बन अंगार चमकेगी,

अंधेरी सब दिशाएँ रोशनी में डूब दमकेंगी,

तुम्हारे दुश्मनों का गर्व चकनाचूर होएगा !

सतत गाते रहो वह गीत जिसमें हो भरी आशा,

बताए लक्ष्य की दृढ़ता तुम्हारी आँख की भाषा,

विरोधी हार कर फिर तो, तुम्हारे पैर धोएगा !

मुसीबत की शिलाएँ सब चटककर टूट जाएँगी,

गरजती आँधियाँ दुख की विनत हो धूल खाएँगी,

तुम्हारे प्रेरणा-जल से मनुज सुख-बीज बोएगा !

1951

(23) आश्वस्त

ज़िन्दगी के दीप जिसने हैं बुझाये,

और भू के गर्भ से

उगते हुए पौधे मिटाये,

शस्य-श्यामल भूमि को बंजर किया जिसने,

नवल युग के हृदय पर मार

पैना गर्म यह खंजर दिया जिसने

उसी से कर रही है लेखनी मेरी बग़ावत !

रुक नहीं सकती

कि जब तक गिर न जाएगा धरा पर

आततायी मत्त गर्वोन्नत,

रुक नहीं सकता कभी स्वर

जब मुखर होकर

गले से हो गया बाहर,

रुक नहीं सकता कभी तूफ़ान

जिसने व्योम में हैं फड़फड़ाए पर,

रुक नहीं सकता कभी दरिया

कि जिसने खोल आँखें

ख़ूब ली पहचान बहने की डगर !

वह तो फैल उमड़ेगा,

कि चढ़कर पर्वतों की छातियों पर

कूद उछलेगा !

सभी पथ में अड़ी भीतें

गरज उन्मुक्त तोड़ेगा !

मुझे विश्वास है साथी

तुम्हारे हाथ

इतने शक्तिशाली हैं

कि प्रतिद्वन्द्वी पराजित हो

अवनि पर लोट जाएगा,

तुम्हारी आँख में

उतरी बड़ी गहरी चमकती तीव्र

लाली है

कि जिससे आज मैं आश्वस्त हूँ !

युग का अंधेरा छिन्न होएगा,

सभी फिर से बुझे दीपक

नयी युग-चेतना के स्नेह को पाकर

लहर कर जल उठेंगे !

सृष्टि नूतन कोपलों से भर

सुखी हो लहलहाएगी !

कि मेरी मोरनी-सी विश्व की जनता

नये स्वर-गीत गाएगी !

व खेतों में निडर हो

नाचकर पायल बजाएगी !

1952

(24) दीपक जलाओ

आज मेरे स्नेह से दीपक जलाओ !

विश्व कुहराच्छन्न, धूमिल सब दिशाएँ,

चल रही हैं घोर प्रतिद्वन्द्वी हवाएँ,

त्राण मेरे अंक में, आकर समाओ !

आज नूतन फूटती आओ जवानी,

मुक्त स्वर में गूँज लो अवरुद्ध वाणी,

यह नवल संदेश युग का, कवि, सुनाओ !

गिर रही हैं जीर्ण दीवारें सहज में,

टूटती हैं शीर्ण मीनारें सहज में,

हो नया निर्माण, जर्जरता हटाओ !

आज मेरी बाहुओं का बल तुम्हारा,

आज मेरा शीश - प्रण अविचल तुम्हारा,

त्रस्त, घायल, सुप्त दुनिया को जगाओ !

1950

(25) आभास होता है

आभास होता है

कि सदियों बद्ध बंधन

आज खुलकर ही रहेंगे !

इन धुएँ के बादलों से

आग की लपटें लरज कर

व्योम को

निज बाहुओं में घेर लेंगी !

शक्तिमत्त-मद

विषैला-नद जलेगा,

हर उपेक्षित भीम गरजेगा

तुमुल संगर धरा पर !

गढ़ दमन के

राह के फैले हुए आटे सदृश

संघर्ष की भीषण हहरती

आँधियों के बीच

उड़ मिट जाएँगे !

विश्वास होता है

कि दौड़ा आ रहा

उन्मुक्त युग-खग,

सब पुरातन जाल जर्जर तोड़कर !

अब तो जलेगा

सत्य का अंगार !

जिसके ही लिए

यह आज तक अविश्रांत

लालायित रहा है

पीड़ितों भूले हुओं का

जागता संसार !

मोचन शोक,

दुख हत तेज,

गिर रही है भंगिमा

माया विभेदन,

दीखती अभिनव-किरण

1950

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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