Online TransLiteration powered by Girgit.Chitthajagat.in, of http://rachanakar.blogspot.com/ Disclaimer
You may also see this page in Bangla, Devanagari, Gujarati, Gurmukhi, Kannada, Malayalam, Oriya, Roman(eng), Tamil, Telugu

आलेख | उपन्यास | कविताएँ | कहानियाँ | कहानी-संग्रह | ग़ज़लें | चुटकुले | बाल-कथाएँ | लघुकथाएँ | व्यंग्य | संस्मरण | समीक्षाएं | हिन्दी ई बुक रचनाकार को सहयोग दें

********

Google
 

July 6, 2008

महेन्द्र भटनागर का कविता संग्रह – नई चेतना (5)

mahendra bhatnagar1

 

(पिछले अंक से जारी…)

 

(16) नयी दिशा

चारों ओर है गतिरोध !

पथ अवरुद्ध,

खंडित मान्यताएँ हीन,

जर्जर रूढ़ियों की सामने प्राचीन

फैली 'चीन की दीवार' !

कैसे चढ़ सकोगे

और कैसे कर सकोगे पार ?

बोलो !

ये पुरातन नीतियाँ, विश्वास,

मृत औ' संकुचित दर्शन पुराना ले,

पुरानी धारणाओं से,

पुरानी कल्पनाओं से

कभी क्या जीत पाओगे ?

कभी अपने बनाये लक्ष्य को

साकार कर क्या देख पाओगे ?

बदलते विश्व के सम्मुख,

कि अनुसंधान

जब विज्ञान के बढ़ते चले जाते,

नये साधन, कलें नूतन

व आविष्कार बढ़ प्रतिपल

चुनौती आज

गर्वोन्नत 'जगत की छत' खड़े पामीर को देते,

उठे एवरेस्ट,

गहन प्रशान्त-सागर को,

अनेकों ग्रह-सितारों को,

चमकते दूर चंदा को,

नये उन्नत विचारों के सहारे

जो सतत अधिकार में अपने

सदा करते बढ़े जाते !

हुए पूरे

न होनी आज चाहों के सभी सपने !

ज़रा उठ खोल तो आँखें

नयी फैली दमकती रोशनी के सामने !

लो फिर करो उपयोग,

तुम हर वस्तु का उपभोग !

मनुज हो तुम

लिए बल-बुद्धि का भंडार,

मनुजता के सभी अधिकार,

प्रगति का है तुम्हें वरदान,

दुर्दम शक्ति का अभिमान,

तुम्हारा ध्येय है

तोड़ो पुरानी ज़िन्दगी के तार,

जिनमें बज न सकती अब मधुर झंकार !

कहाँ तक कर सकोगे शोध ?

है सब व्यर्थ सारा क्रोध !

जब सब डगमगायी हैं दीवारें

नींव से -

गिर कर रहेंगी ही,

कि जब ये आँधियाँ चल दीं क्षितिज से

शीघ्र आ घिर कर रहेंगी ही !

तुम्हें तो छोड़ना है

आज यह अपनत्व की

हर वासना का रूप,

कर दो बन्द

तम से ग्रस्त अवनति कूप !

असफल मोह से कर द्रोह,

मिथ्या स्वप्न की माया,

खड़ी बन शून्य की

निस्सार धुँधली क्षीण-सी छाया

कि जिसमें है न कोई आज आकर्षण !

निरर्थक क्या ?

अरे घातक !

सजग हो जा

नहीं तो नाश निश्चित है,

खड़ा हो जा

सुदृढ़ चट्टान-सा बनकर

नहीं तो धर्म तेरा रे कलंकित है,

कि बढ़कर रोक ले तूफ़ान

वरना आज

पौरुष धैर्य विगलित है !

न हो भयभीत

तेरे सामने हुंकारता है बढ़

ज़माना नव्य,

भावी विश्व की ले कल्पना दृढ़ भव्य !

जनता की प्रखर आवाज़

गूँजी आज,

जो किंचित नहीं अब चाहती है

'ताजवालों' का कहीं भी राज !

पीड़ित, त्रस्त, शोषित, सर्वहारा की

उमड़ती बाढ़-सी धारा,

लगाकर यह गगन-भेदी सबल नारा -

नयी दुनिया बनानी है !

न होगा चिन्ह जिसमें एक भी

मृत घृणित पूँजीवाद का,

बरबाद होगा विश्व से

हर रूप तानाशाह का,

केवल जगत् नव-साम्य-पथ पर

ले सकेगा साँस,

सुख की साँस !

जिसमें आस

नूतन ज़िन्दगी की ही भरी होगी,

कि जिसकी राह पर चलकर

धरा सूखी हरी होगी !

मिटा देगा उसी पथ का बटोही

दु:ख के पर्वत,

विषमता की गहनतम खाइयाँ

सब पाट देगा

कर्म का उत्साह,

नूतन चेतना की प्रेरणा से

ये पुराने सब

क़िले, दीवार, दर्रे टूट जाएँगे !

1949

(17) परम्परा

परम्परा, परम्परा, परम्परा !

जकड़ लिया

मिटा दिया

निशान धूल झोंक कर

युगों चला लिया,

गुलाम हो गये

बना स्वयं अनेक रीतियाँ

प्रथा बनाम रूढ़ियाँ !

नवीन स्वर नहीं सुना ?

नया स्वरूप भी नहीं दिखा ?

बदल गया जहान

सत्य आ गया खरा !

कहाँ गयी

परम्परा, परम्परा, परम्परा ?

अंध मान्यता,

कठोर मान्यता,

असार मान्यता !

अरे बता -

कि धर्म ... धर्म ... धर्म ... की पुकार

मच रही,

यहाँ वहाँ सभी जगह

कि मार-धाड़,

हो गया मनुज गँवार,

कौन-सा अमूल्य धर्म वह सुना रहा ?

क़ुरान ?

वेद ? उपनिषद ? पुराण ?

बाइबिल ?

सभी बदल चुके !

नवीन ग्रन्थ और एक 'ईश' चाहिए,

कि जो युगीन जोड़ दे

नया, नया, नया !

व लहलहा उठे

मनुज-महान-धर्म की

सड़ी-गली लता !

सुधार मान्यता,

नवीन मान्यता,

सशक्त मान्यता !

न व्यर्थ मोह में पड़ो

न कुछ यहाँ धरा !

बदल परम्परा, परम्परा, परम्परा !

1948

(18) गन्तव्य

यह जीवन का गन्तव्य नहीं !

निष्फल क्षय-ग्रस्त कराहों का,

इन सूनी-सूनी राहों का,

असफल जीवन की आहों का,

स्वप्न-निमीलित, मोह-ग्रसित यह

जाग्रत-उर का मन्तव्य नहीं !

वैयक्तिक स्वार्थों पर निर्मित ,

आत्म-तुष्टि के साधन सीमित,

पथ पार्थिव सुख पर कर लक्षित,

जन-मन-रागों से दूर कहीं

मानवता का भवितव्य नहीं !

बीते युग पर पछताने का,

या याद पुरानी गाने का,

है ध्येय न आज ज़माने का,

युग की वाणी से रही विमुख

एकांत-कला क्या भव्य कहीं ?

1952

(19) क्या हुआ?

वही शिथिल, अस्वस्थ, रुग्ण है शरीर,

क्या हुआ पहन लिया नवीन चीर ?

वही थके चरण,

वही दबे नयन,

कि क्या हुआ क्षणिक सुरा

उतर गयी गले ?

निमिष नज़र के सामने

अगर यह छा गया चमन !

सपन बहार आ गयी !

समीर है वही गरम-गरम,

मरण-वरण बुख़ार

वही गिर रही

उसी प्रकार

शीश से मनुष्य के

अशेष रक्त-धार !

झनझना रहे

हृदय के तार-तार !

1951

(अगले अंक में जारी….)

0 टिप्पणियाँ.:

प्रकाशनार्थ रचनाएं आमंत्रित हैं

रचनाकार में प्रकाशनार्थ हर विधा की रचनाओं का स्वागत है. अपनी या अपने रचनाकार मित्रों की रचनाएँ हिन्दी के किसी भी फ़ॉन्ट यथा - कृतिदेव, डेवलिस, श्रीलिपि, शुषा, वेबदुनिया, जिस्ट-आईएसएम, लीप या किसी भी अन्य फ़ॉन्ट में पेजमेकर या एमएस वर्ड फ़ाइल के रूप में अपनी रचना ई-मेल के जरिए rachanakar@gmail.com .के पते पर भेजें. विस्तृत जानकारी बाजू पट्टी में देखें. आप अपनी रचनाओं के सस्वर ऑडियो/वीडियो पाठ की सीडी भी प्रकाशनार्थ भेज सकते हैं जिन्हें कुछ इस तरह [ देखने के लिए इस कड़ी/लिंक पर क्लिक करें] प्रकाशित किया जा सकेगा. ......................