महेन्द्र भटनागर का कविता संग्रह – नई चेतना (5)
(पिछले अंक से जारी…)
(16) नयी दिशा
चारों ओर है गतिरोध !
पथ अवरुद्ध,
खंडित मान्यताएँ हीन,
जर्जर रूढ़ियों की सामने प्राचीन
फैली 'चीन की दीवार' !
कैसे चढ़ सकोगे
और कैसे कर सकोगे पार ?
बोलो !
ये पुरातन नीतियाँ, विश्वास,
मृत औ' संकुचित दर्शन पुराना ले,
पुरानी धारणाओं से,
पुरानी कल्पनाओं से
कभी क्या जीत पाओगे ?
कभी अपने बनाये लक्ष्य को
साकार कर क्या देख पाओगे ?
बदलते विश्व के सम्मुख,
कि अनुसंधान
जब विज्ञान के बढ़ते चले जाते,
नये साधन, कलें नूतन
व आविष्कार बढ़ प्रतिपल
चुनौती आज
गर्वोन्नत 'जगत की छत' खड़े पामीर को देते,
उठे एवरेस्ट,
गहन प्रशान्त-सागर को,
अनेकों ग्रह-सितारों को,
चमकते दूर चंदा को,
नये उन्नत विचारों के सहारे
जो सतत अधिकार में अपने
सदा करते बढ़े जाते !
हुए पूरे
न होनी आज चाहों के सभी सपने !
ज़रा उठ खोल तो आँखें
नयी फैली दमकती रोशनी के सामने !
लो फिर करो उपयोग,
तुम हर वस्तु का उपभोग !
मनुज हो तुम
लिए बल-बुद्धि का भंडार,
मनुजता के सभी अधिकार,
प्रगति का है तुम्हें वरदान,
दुर्दम शक्ति का अभिमान,
तुम्हारा ध्येय है
तोड़ो पुरानी ज़िन्दगी के तार,
जिनमें बज न सकती अब मधुर झंकार !
कहाँ तक कर सकोगे शोध ?
है सब व्यर्थ सारा क्रोध !
जब सब डगमगायी हैं दीवारें
नींव से -
गिर कर रहेंगी ही,
कि जब ये आँधियाँ चल दीं क्षितिज से
शीघ्र आ घिर कर रहेंगी ही !
तुम्हें तो छोड़ना है
आज यह अपनत्व की
हर वासना का रूप,
कर दो बन्द
तम से ग्रस्त अवनति कूप !
असफल मोह से कर द्रोह,
मिथ्या स्वप्न की माया,
खड़ी बन शून्य की
निस्सार धुँधली क्षीण-सी छाया
कि जिसमें है न कोई आज आकर्षण !
निरर्थक क्या ?
अरे घातक !
सजग हो जा
नहीं तो नाश निश्चित है,
खड़ा हो जा
सुदृढ़ चट्टान-सा बनकर
नहीं तो धर्म तेरा रे कलंकित है,
कि बढ़कर रोक ले तूफ़ान
वरना आज
पौरुष धैर्य विगलित है !
न हो भयभीत
तेरे सामने हुंकारता है बढ़
ज़माना नव्य,
भावी विश्व की ले कल्पना दृढ़ भव्य !
जनता की प्रखर आवाज़
गूँजी आज,
जो किंचित नहीं अब चाहती है
'ताजवालों' का कहीं भी राज !
पीड़ित, त्रस्त, शोषित, सर्वहारा की
उमड़ती बाढ़-सी धारा,
लगाकर यह गगन-भेदी सबल नारा -
नयी दुनिया बनानी है !
न होगा चिन्ह जिसमें एक भी
मृत घृणित पूँजीवाद का,
बरबाद होगा विश्व से
हर रूप तानाशाह का,
केवल जगत् नव-साम्य-पथ पर
ले सकेगा साँस,
सुख की साँस !
जिसमें आस
नूतन ज़िन्दगी की ही भरी होगी,
कि जिसकी राह पर चलकर
धरा सूखी हरी होगी !
मिटा देगा उसी पथ का बटोही
दु:ख के पर्वत,
विषमता की गहनतम खाइयाँ
सब पाट देगा
कर्म का उत्साह,
नूतन चेतना की प्रेरणा से
ये पुराने सब
क़िले, दीवार, दर्रे टूट जाएँगे !
1949
(17) परम्परा
परम्परा, परम्परा, परम्परा !
जकड़ लिया
मिटा दिया
निशान धूल झोंक कर
युगों चला लिया,
गुलाम हो गये
बना स्वयं अनेक रीतियाँ
प्रथा बनाम रूढ़ियाँ !
नवीन स्वर नहीं सुना ?
नया स्वरूप भी नहीं दिखा ?
बदल गया जहान
सत्य आ गया खरा !
कहाँ गयी
परम्परा, परम्परा, परम्परा ?
अंध मान्यता,
कठोर मान्यता,
असार मान्यता !
अरे बता -
कि धर्म ... धर्म ... धर्म ... की पुकार
मच रही,
यहाँ वहाँ सभी जगह
कि मार-धाड़,
हो गया मनुज गँवार,
कौन-सा अमूल्य धर्म वह सुना रहा ?
क़ुरान ?
वेद ? उपनिषद ? पुराण ?
बाइबिल ?
सभी बदल चुके !
नवीन ग्रन्थ और एक 'ईश' चाहिए,
कि जो युगीन जोड़ दे
नया, नया, नया !
व लहलहा उठे
मनुज-महान-धर्म की
सड़ी-गली लता !
सुधार मान्यता,
नवीन मान्यता,
सशक्त मान्यता !
न व्यर्थ मोह में पड़ो
न कुछ यहाँ धरा !
बदल परम्परा, परम्परा, परम्परा !
1948
(18) गन्तव्य
यह जीवन का गन्तव्य नहीं !
निष्फल क्षय-ग्रस्त कराहों का,
इन सूनी-सूनी राहों का,
असफल जीवन की आहों का,
स्वप्न-निमीलित, मोह-ग्रसित यह
जाग्रत-उर का मन्तव्य नहीं !
वैयक्तिक स्वार्थों पर निर्मित ,
आत्म-तुष्टि के साधन सीमित,
पथ पार्थिव सुख पर कर लक्षित,
जन-मन-रागों से दूर कहीं
मानवता का भवितव्य नहीं !
बीते युग पर पछताने का,
या याद पुरानी गाने का,
है ध्येय न आज ज़माने का,
युग की वाणी से रही विमुख
एकांत-कला क्या भव्य कहीं ?
1952
(19) क्या हुआ?
वही शिथिल, अस्वस्थ, रुग्ण है शरीर,
क्या हुआ पहन लिया नवीन चीर ?
वही थके चरण,
वही दबे नयन,
कि क्या हुआ क्षणिक सुरा
उतर गयी गले ?
निमिष नज़र के सामने
अगर यह छा गया चमन !
सपन बहार आ गयी !
समीर है वही गरम-गरम,
मरण-वरण बुख़ार
वही गिर रही
उसी प्रकार
शीश से मनुष्य के
अशेष रक्त-धार !
झनझना रहे
हृदय के तार-तार !
1951
(अगले अंक में जारी….)











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