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May 8, 2008

अनुज नरवाल रोहतकी की ग़ज़लें : चुनरी बनाकर मुझको सीने से लगा लीजे



ग़ज़लें

- डॉ. अनुज नरवाल रोहतकी


1
मुहब्बत की थी तो निभाई तो होती

कोई प्यार की ज्योति जलाई तो होती


भूले से गर खता हो गई थी हमसे

कभी आकर तुमने बताई तो होती


औरों को वफा की सीख देने वाले

ये सीख खुद तूने अपनाई तो होती


वफा का बेवफाई से क्यूं दिया सिला

कमियाँ क्या थी गिनाईं तो होती


'अनुज' मुझ पे लिख डाली किताब तूने

कोई ग़ज़ल खुद पे बनाई तो होती

--------.



2

आदत हो गई है सबकी, जुबान से फिरना आजकल

हो गया है इक शौक, मुहब्बत करना आजकल


दिल हर रोज जाने कितने चेहरों पे मरता है

हो गया है किस कदर आसान मरना आजकल


जिस्म तक ही महदूद क्यों हो गई हर नज़र

क्यों नहीं चाहता कोई दिल में उतरना आजकल


मशहूर होने के लिए ये कैसा दीवानापन है

करते हैं पसन्द नज़रों से भी गिरना आजकल


आँख बंद करके यकीं कर लेते हो सब पर तुम

है बेवकूफी 'अनुज' ऐसा कुछ करना आजकल

--------.



3

आँखों में बसा लीजे

पलकों पे बिठा लीजे


सुर्खी बनाकर मुझको

होठों पे लगा लीजे


फूल बनाकर मुझको

बालों में सजा लीजे


चुनरी बनाकर मुझको

सीने से लगा लीजे


कँगना बनाकर मुझको

हाथों में सजा लीजे


बिंदिया बनाकर मुझको

माथे पर लगा लीजे


सिंदूर बनाकर मुझको

मांग में सजा लीजे


कुछ भी बना लीजे पर

मुझको अपना बना लीजे।

------
संपर्क:


डॉ. अनुज नरवाल रोहतकी
454/33 नया पड़ाव, खाट मंडी, रोहतक - हरियाणा

-भारत

ई-संपर्क:
dr.anujnarwalrohtaki@gmail.com-

1 टिप्पणियाँ.:

दीपक said...

बहूत अच्छी रचना है !!
अच्छा लगा पढकर "

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