राजश्री का पौराणिक उपन्यास : क्षितिज की संतान
उपन्यास
क्षितिज की संतान
- राजश्री
आमुख:
क्षितिज की संतान के दो प्रमुख नायक हैं – वैदिक व पौराणिक युगीन महाअसुर वरूण व महारुद्र शिव. इस कथा के ये दो महानायक भारतीय संस्कृति के इतिहास से संबंध रखते हैं. उनके आचरण से मिलने वाली शिक्षा हर युग में युगपरक है. वह कभी अतीत नहीं है. आज विश्व पुनः उसी अवस्था में है जहाँ महारुद्र शिव का हलाहल पान भी विध्वंस को रोक नहीं सका था. जम्बूद्वीप के सर्वश्रेष्ठ वर्ष भारत की पृष्ठभूमि पर लिखी कथा विश्व के किसी भी वर्ष के लिए सत्य है क्योंकि इस कथा से ज्ञात होता है – विचारों की सरलता में विषमता व जटिलता का समावेश सभ्यता के साथ होता जाता है यदि मानव मौलिक सरलता को खोता जाता है तो परिणाम विध्वंस है. सीधी रेखाओं से किस प्रकार न सुलझने वाली गांठ बन जाती है? ऐसी गांठ जो मानव को पग पग पर मानव जीवन को अपने में बांधती है.
जिस संस्कृति के विस्तार का स्वप्न इन युगपुरुषों ने देखा वह आज हमारा दायित्व है. हम संस्कृति के मानवीय भाव व प्रकृति को समझें. इस कथा का प्रारंभ प्रकृति करती है जो मानव को यह समझाना चाहती है कि विध्वंस व विसर्जन में भेद है. समय, प्रकृति के साथ मानव मस्तिष्क की विभिन्न अवस्था कद्रू के स्वप्न, वराह की रेखाएं तथा बाबा देवल की कथाओं के माध्यम से कहता है. कद्रू अचेतन, वराह चेतन व बाबा देवल लोक-मानस में चेतन-अचेतन से बनने वाली कहानी का प्रतीक है. इनके माध्यम से विचारों की दिशा व विषमता ज्ञात होती है.
क्षितिज की संतान
कण कण देह माटी मेरी हो सके स्वर्ण रेणु
जड़चेतना को प्रज्ञालहरों का खेल खिलाती हूं मैं
समर्पित है पूज्य डा.पापा मम्मी, और गुरूजनों को
प्रस्तावना
मानव की यात्रा युगों से जारी है। कभी जीवन की आवश्यकताओं के लिये, कभी ज्ञान के लिये, कभी कुछ जानने के लिये। मानव ने अपनी यात्राओं में कुछ खोया है, कुछ पाया है। मेरी यात्रा भी एक ऐसी ही यात्रा है, जिसमे मैंने संस्कृति को समझने का प्रयत्न किया है।
बचपन में जब भी शिव की कहानी सुनती हमेशा आश्चर्य करती थी, कि उन्हें देव और असुर दोनों पूजते हैं। उन्होंने विश्व को बचाने के लिये हलाहलपान किया। मेरा सोचने का दृष्टिकोण सदैव ही तर्क से प्रभावित रहा। जैन व बौद्ध दर्शन मूलत: तर्क पर आधारित है। मैं सदैव उसी दर्शन से प्रभावित रही हूं।
शिव को मैं तर्कों के आधार पर समझने का प्रयास करती थी। मैं प्रतिदिन दौड़ने के लिये आलिराजपुर के शिवमंदिर में जाया करती थी। उन दिनों मुझे अपना ‘स्टेमिना’ बढ़ाने की धुन सवार थी। हर सवेरे पांच बजे से मेरा दौड़ना शुरू होता था। आलिराजपुर एक आदिवासी इलाका है। अत: कई परिजन मुझे रोकते भी थे, किन्तु सदैव की भांति मेरे तर्कों के सामने चुप हो जाते। एक दिन जब मैं शिव मंदिर के मैदान की परिक्रमा समाप्त करके, मंदिर के प्रांगण में लगे पारिजात के नीचे बैठी थी, वहां पर मुझे एक पेंडल मिला जो किसी की चेन से गिर गया था। उसमें शिव का चित्र था। पेंडल देख कर मुझे लगा कि यह किसी आदिवासी के गले से ही गिरा है। क्योंकि मंदिर एकदम वीराने में था, तथा वहां अधिकतर आदिवासी ही आते थे। उस दिन मैं उस पेंडल को लेकर सोचतेसोचते घर आई। मुझे एक तीव्र इच्छा होने लगी कि मैं देवअसुर और विषपान का रहस्य जानना चाहती हूं। रहस्य को जानने की मेरी इच्छा का ही परिणाम ‘क्षितिज की संतान’ है।
मेरी इस यात्रा में मैंने अपनी संस्कृति के बारे में बहुत सीखा। इस यात्रा में मेरे कारवां में कई लोग आये, जिनसे मैंने जाना। मैं सभी की हृदय से आभारी हूं वे जो साथ न चले, पर कुछ दे कर चले गये, तथा वे जो सदा साथ रहे। मैं डा..पापा के प्रति सदैव ऋणी और कृतज्ञ हूं जिन्होंने मुझे ‘सीखना’ सिखाया।
मेरे सीखने में जो कमियाँ है, वे सब मेरी अपनी है। मैं सभी सुझावों व आलोचनाओं का स्वागत करती हूं, क्योंकि मेरी यात्रा जारी है।
-राजश्री
1
सीधी रेखाओं से शुरू होकर न सुलझने वाली गांठ की कहानी
विश्व में कई लोग जानना चाहते हैं। पशु से पशुपति की कहानी तुम भी जानना चाहते होंगे मेरा सखा समय भी इस कहानी को सुनाने के लिये मेरे साथ है। जबजब तुम इस कहानी में खो जाओगे, हम दोनों में से कोई एक तुम्हें रास्ता बतायेगा। तुम्हें पहले यह जानना होगा कि सीधी रेखाएं कैसे बनी? तभी तुम न सुलझने वाली गांठ की कहानी का रहस्य जान सकोगे। मैं यह कहानी तुम्हें क्यों सुना रही हूं, यह भी तुम कहानी पढ़तेपढ़ते जान जाओगे। सीधी रेखाओं से न सुलझने वाली गांठ तक की कहानी जानने के लिये तुम्हें धैर्य रखना होगा।
कहानी का रंगमंच जम्बूद्वीप है। जम्बूद्वीप का आकार कमल के पत्ते के समान था। जम्बू द्वीप के मध्य में सुमेरू पर्वत की स्थिति थी। सुमेरू पर्वत के दक्षिण में हिमवान, उत्तर में नील, श्वेत व श्रृंगवान पर्वत थे। पश्चिम में सुपार्श्व, पूर्व में मंदराचल गंधमादन था। सुमेरू पर्वत व सुपार्श्व पर्वत के बीच उत्तर कुरू की स्थिति थी। सुपार्श्व पर्वत श्रृखंला के गंधमादन पर्वत पर जामुन के वृक्षों का विशाल जंगल होने के कारण, इस द्वीप का नाम जम्बू अथवा जम्मूद्वीप हुआ। माल्यवाल व गंधमादन पर्वत माला उत्तर दक्षिण की तरफ फैली हुई थी। सुमेरू पर्वत से चार नदियाँ निकलती थी, जो भिन्नभिन्न दिशाओं में जाती थी । मंदरांचल पर्वत से जुड़े क्षेत्र का नाम भद्राश्व व गंधमादन से जुड़े क्षेत्र का नाम केतूमाल था।
जम्बू द्वीप में मेरू पर्वत के आसपास भिन्न वर्षों में स्वयं को धरती आकाश की संतान मानने वाली कई जातियाँ रहती थी। ये जातियाँ चारों दिशाओं में फैलती गई। धरती आकाश का रूप बदलता गया। कुछ जातियाँ स्वयं की उत्पत्ति तरबूज से, कुछ सूर्य से, कुछ भिन्नभिन्न मातृदेवियों या पशुओं से मानने लगी। प्रागैतिहासिक मानव ने सूर्य के भी विभिन्न रूपों की कल्पना की। जैसे सूर्य गरूड़ की भांति उड़कर आसमान की सीमाएं नापता है। सूर्य कपि की भांति उछलता है। धरती को सर्प का आधार है। सूर्य सर्प की भांति अंतरिक्ष के जल में तैरता है।
ब्रह्मांड में समय और दिशा के किसी अगम्य बिन्दु पर कब यह कहानी प्रारम्भ होती है, यह ढूंढना बहुत मुश्किल है। समय के निर्बाध चक्र में इतिहास जब तक लिखा हुआ न हो, उसका प्रमाण सारी ध्वनियाँ मौन है। नि:शब्द। किसी न किसी बिन्दु पर यह कहानी प्रारम्भ अवश्य हुई होगी, अन्यथा यह घटनाएं, जो विकास का एक कदम है नहीं घटी होतीं। इसके प्रत्यक्षदर्शी ये धरती आसमान और प्राणी है जो इस कहानी का अभिन्न अंग है। समय की गहराई समुद्र से भी गहरी व भिन्न है, यदि वहां कुछ निशब्द खो गया तो बस खो गया। समुद्र की गहराई अपरिमित नहीं, उसके पास चार दिशाओं का बंधन भी है। समय चार दिशाओं से परे हैं। उसकी एक दिशा और है, जो तुम नहीं जानते हों वह अगम्य है। मेरी सृष्टि समय के साथ चलने वाला एक संचलन है। समय के साथ मेरी सृष्टि में हेमंत वसंत आते हैं। जब जीवन सुप्त है, तब भी समय जारी है। प्रज्ञा के अभाव में मानव जीवन को ही समय का प्रवाह मान लेता है।
शून्य में अंधकार अनंत तक फैला हुआ था। इस अंधकार में शून्य के अंदर चल रही क्रियाएं अज्ञात थी। कोई अदृश्य ऊर्जा अवश्य इस शून्य में छुपी हुई थी, जो इस अंधकार को प्रकाश की ओर ले जाने के लिये कटिबद्ध थी। दिशाओं व समय के मानकों से परे, यह चेतना अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त थी। धरा भी इस शून्यमय अंधकार का ही अणुमात्र सा अंग थी। उसी की भांति इस अंधकार में अनगिनत सूक्ष्म अणुपरमाणु दिशाविहीन चक्कर लगा रहे थे। अनंत काल से जारी इस क्रिया में एक क्षण ऐसा आया, जब सारे अणु परमाणु एक दूसरे से टकरा गये। अंधकार में हुए इस विध्वंस के परिणामस्वरूप सतरंगी प्रकाश का जन्म हुआ। इस प्रकाश में अतिशय ऊष्मा थी, जो सारे ब्रह्मांड में व्याप्त हो गई। ऊष्मा ने एक कोलाहल को जन्म दिया। हर ग्रह नक्षत्र पर पृथक पृथक ऊर्जाओं के मिश्रण से एक आकर्षण शक्ति का जन्म हुआ, इसी के फलस्वरूप सौरमंडल का जन्म हुआ। अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाने वाला एक केंद्र बिंदु हर मण्डल में था। प्रकाश जो धरा के लिये जीवन का आधार है।
जल प्रकाश को छूने की उद्याम कोशिश करता रहा। धूसर, बैगनी, नीले, लाल, पीले रंगों का नृत्य एक चक्रवात की भांति धरा पर जारी था। जल कभी एक स्थान पर सिमट जाता, कभी उद्याम आवेग के साथ बह निकलता। भूमि सिमट कर कभी एक हो जाती और कभी जल की अथाह गहराईयों के डूब जाती। जल और प्रकाश का नृत्य अप्रतिम था। कभी लगता जल स्थिर है, और अनंत रंगों में प्रकाश की किरणरूपी नर्तकियाँ अभिनव मुद्राओं में जल पथ पर गमन कर रही हो। कभी जल रंगमंच हो जाता। कभी अंतरिक्ष रंगमंच हो जाता, क्योंकि जल तरंगित होकर वतुर्लकार होते ऊपर की तरफ उठता। इस खेल के मध्य जन्म हुआ अग्नि का। त्रिविध ज्वालाओं से अग्नि का नृत्य भी अंतरिक्ष के मध्य प्रारम्भ हो गया। यह अग्नि ही जीवों की ऊर्जा है। अग्नि जीवन भी है, अग्नि मृत्यु भी है। जल, प्रकाश और अग्नि के संयोग से वायु का जन्म हुआ। वायु जीवों में प्राण का संचार है और प्राणियों में प्राण।
ऊर्जा थी। कोलाहल था। कोई लय न थी, क्योंकि जीवन न था। मैं, प्रकृति अनवरत प्रयत्नशील थी। धरा पर जीवन भिन्न भिन्न रूप से आता रहा। कभी कभी वह सिर्फ जल में बंदी था। जल से भूमि पर एक सूक्ष्म जीवन का प्रारम्भ हुआ।
2
समय के किसी अनजान बिन्दु पर’
प्राची का प्रभात हिम आच्छादित शिखरों को, अरूण आभा से आलोकित कर रहा था। अनादि काल से जारी पृथ्वी पर हो रहा कोलाहल शांत हो चुका था। मैं अनादि काल से सृष्टि के इस रूप के लिए प्रयासरत थी। मेरे अनवरत श्रम का ही प्रकट उदाहरण है, यह नद, नदियों, पर्वतों, घाटियों, समुद्रों एवं आकाश, से परिपूर्ण पल्लवित धरा रूप रमणी इस पर विचरती उसकी सन्तानें जिनमें से किसी को मैंने पंख दिये, किसी को चार पैर, किसी को जल में रहने की क्षमता। मैंने अपने सौन्दर्य बोध से हर प्राणी को अलंकृत किया। एक नन्हा सा पुष्प भी मेरी सृजन शक्ति का गीत गाता है। अभी तक की मेरी सर्वश्रेष्ठ कृति है मानव
मैं अब अपनी इस संतान को गुफा से बाहर आते देख रही हूं। मैंने, विश्व सृजना ने अपनी इस कृति को उसी क्षमता के अंश से उपकृत किया, जो मेरी अपनी है।
(क्रमशः अगले अंकों में जारी....)
उपन्यास का प्रिंट संस्करण प्राप्त करने के लिए संपर्क करें : raghyee AT gmail DOT com
(टीप : समस्त सामग्री का शुषा फ़ॉन्ट से मशीनी यूनिकोडीकरण किया गया है, अतः असंख्य अनगिनत वर्तनी त्रुटियाँ समाविष्ट हो गई हैं जिन्हें सप्रयास कम करने की यथा संभव कोशिश की गई है. सुधी पाठकों से आग्रह है कि वर्तनी की त्रुटियों को अनदेखा कर सामग्री का सार ग्रहण करें. गंभीर त्रुटियों को जरूर इंगित करें. धन्यवाद.)












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