March 25, 2008

डॉ. शरद काळे की दो कविताएं


दो कविताएं

- डॉ. शरद काळे

ओ मेरी अनुभूतियों

ओ मेरी अनुभूतियों,

समय से पहले ही प्रकाशित

हो जाने वाली पत्रिकाओं की तरह

यूँ असमय न फूटो

रहना है तो रहो

गर्भाशय में गर्भ की तरह मंद स्पंद

सड़ना है तो सड़ो

नौकरी में हुनर की तरह — अदुर्गंध

धुले हुए सूखते वस्त्रों में

जनानी अंगिया के स्पर्श मात्र से सिहरने वाले

किशोर की तरह यूँ शब्द स्पर्श से न सिहरो

सीमा पर सजग प्रहरी की तरह

करो आदेश का इंतजार

कंधों पर अपने रखे शब्द हथियार निर्विकार

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कविता लिखते हो

कविता लिखते हो, लिखो, निभा पाओगे क्या

सविता रखते हो, प्रभा सह पाओगे क्य़ा

दर्द कर्ज लेना पड़ता है कविता लिखना खेल नही,

लटका ' एयर बैग ' सफर पर निकलें ये वो रेल नही

यह ठीक, पास है टिकट, पहुँच पाओगे क्या

कई चाबियों के गुच्छे हैं, ताले फिर भी खुल न सके

डाली खेंची कई, उमर कट गई, मगर ये कट न सके

इस तरह भेद हैं कई समझ पाओगे क्या

शब्द-शब्द को लिखने में तो रक्त जलाना पड़ता है

हाड़ मांस सब जलता है तब थोड़ा अर्थ उजलता है

तुम पहले से कंकाल यज्ञ में डालोगे क्या

लोग यहाँ सब के सब कविता लिखने की तैयारी में

समय निकल जाता है उनसे बीज़ न डलता क्यारी में

छिन जाता है आखिर खेत, गँवा यूँ ही दोगे क्य़ा

कविता लिखने की तैयारी कुछ लोगों ने अभिनव की

पैसा, घुड़की, भोग हजम कर चर्बी कर दी अनुभव की

चर्बी में तुम यूँ व्यथा बदल पाओगे क्या

कविता लिखते हो लिखो, निभा पाओगे क्या

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(स्व.) डॉ शरद काळे की प्रस्तुत रचनाएं नीला अंबर कविता संग्रह से, - साभार, प्रस्तुति: आशा जोगेळकर

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