राजेन्द्र अविरल की होली पर दो कविताएं
कविता
-राजेन्द्र अविरल
होली मन की उमंग
होली के संग
लो मची है हु़ड़दंग
पी के चले अब भंग
छाई मृदुल तरंग
सब रंग ही रंग
भीगा सारा अंग -अंग
पिया नाचे संग -संग
डोला मन का मतंग
हो रहे है सब दंग
छोड़ो अब सारी जंग
उठी जीवन तरंग
उड़ी फिर से पतंग
होली मन की उमंग
होली मन की उमंग...
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आओ होली मनाएं...
होली के बहाने
देश में अब आए दिन मन रही है होली
जल रहा, किसी का घर
तो क हीं चल रही बंदूक से गोली
दीवाली भी यदाकदा मन जाती मेरे देश में
धमाकों के शोर में, सब कुछ दब सा जाता है
सनसनी तो आए दिन फैलती ही रहती है
जिस्म मे मेरे ,दहशत की
रंगों की जगह खून भी बहता रहता है
मेरे देश वासियों के जिस्म से
होली के बहाने आओ आज,
फिर से गले लग जाएं.
गोली के बहाने छोड़ ,
ह्म फिर से दीवाने बन जाएं.
माना कि दीवारें मिट्टी की
खींची है जमीं के टु़कड़े पर
दिल की दीवारें ,आज मिटाएं
आओ, गले मिलें ,फिर..होली मनाएं...









3 टिप्पणियाँ.:
राजेंद्र अविरल जी आपकी पहली कविता की छंद बद्धता वास्तव में बहुत ही अच्छा लगा तथा दूसरी कविता तो पूर्ण रूप से ह्रदय को छूती हुयी प्रतीत हुयी । सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकार हो ।
राजेंद्र अविरल जी आपकी पहली कविता की छंद बद्धता वास्तव में बहुत ही अच्छा लगा तथा दूसरी कविता तो पूर्ण रूप से ह्रदय को छूती हुयी प्रतीत हुयी । सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकार हो ।
बहुत बढिया है कविता , बधाई स्वीकारें !