March 12, 2008

डॉ. महेन्द्र भटनागर की कविता - नई नारी

कविता

 

नयी नारी

डॉ. महेंद्र भटनागर

तुम नहीं कोई

पुरुष की ज़र

-ख़रीदी चीज़ हो,

तुम नहीं

आत्मा

-विहीना सेविका

मस्तिष्क

-हीना सेविका,

गुड़िया हृदयहीना

!

नहीं हो तुम

वही युग

-युग पुरानी

पैर की जूती किसी की

,

आदमी के

कुछ मनोरंजन

-समय की

वस्तु केवल

!

तुम नहीं कमज़ोर

तुमको चाहिए ना

सेज फूलों की

!

नहीं मझधार में तुम

अब खड़ीं शोभा बढ़ातीं

दूर कूलों की

!

अब दबोगी तुम नहीं

अन्याय के सम्मुख

,

नयी ताक़त

, बड़ा साहस

ज़माने का तुम्हारे साथ है

!

अब मुक्‍त कड़ियों से

तुम्हारे हाथ हैं

!

तुम हो

न सामाजिक न वैयक्‍तिक

किसी भी क़ैदखाने में विवश

,

अब रह न पाएगा

तुम्हारे देह

-मन पर

आदमी का वश

कि जैसे वह तुम्हें रक्‍खे

रहो

,

मुख से अपने

भूल कर भी

कुछ कहो

!

जग के

करोड़ों आज युवकों की तरफ़ से

कह रहा हूँ मैं

''

तुम्हारा 'प्रभु' नहीं हूँ,

हाँ

, सखा हूँ!

और तुमको

सिर्फ़ अपने

प्यार के सुकुमार बंधन में

हमेशा

बाँध रखना चाहता हूँ

!''

ƹ ƹ

--
महेंद्रभटनागर

1 टिप्पणियाँ.:

Anonymous said...

aap ke vichar bahut achchhe hai .kavita bahut achchhi hai per aaj bhi purush nari ke tan man pe adhikar rakhta hai yadi vo kuchh boli to mahabharat karta hai

mamta

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