March 13, 2008

मोती लाल का काव्य संग्रह : खाई के परे

काव्य संग्रह

खाई के परे

-मोती लाल


भूमिका

साहित्यक विमर्श और उनके दर्शन में यह नहीं होता कि सृजन की नवसंस्कृति का अर्थ समकालीन सापेक्षता से संबंधित परिघटनाओं को खंगालना भर हो । यहां उनके साथ जहां जीना है वहीं चीजों के नये अर्थ में उनके होने न होने के बीच जो संवेदनाएं हमारे बीच तैरती ही नहीं बल्कि कुरेदती भी है, वहीं खोजना होता है, चुक गये अर्थों में कविताओं की तह तक, जो मेरे ''खाई के परे'' में पूरे शिद्दत व सार्थक अर्थ लेते हुए आकार लेते हैं और उर्जा के नये क्षितिज की ओर अग्रसर होते हैं ।

मैं यह नहीं कह सकता कि कविता के मापदंड और परिस्थितियों की जकडबंदी की वकालत यहां कितने ऊंचे परिप्रेक्ष्य में हो सका है, पर यहां जो कुछ भी है, वे आज के कटु समय के बीच से उपजी वे संवेदनाएं हैं, जिन्हें हम ना नजरअंदाज कर सकते हैं और ना ही बारूद के ढेर पर बैठा ही सकते हैं ।

जाहिर है द्वन्द्व के बीच चलता तूलिका किसी न किसी रूप में चेतन-अचेतन, इच्छा-उपेक्षा के भेद को तोड़ती कोई दृश्य तो बनाएगा ही, यही अंतर्धारा उन दृश्यों के भीतर चुपचाप बह नहीं निकलता बल्कि टकराता है उन सभी कोणों से और उफान बनकर कुछ आभास देता है कि हां इसके परे भी कुछ है ।

अब यह जैसा है, आपके समक्ष है और शायद इन कविताओं से कुछ उर्जा निकलता हो तो मैं समझूंगा कि सार्थक कुछ तो हुआ है । अपनी राय, आलोचना व सलाह से अवगत कराने की कृपा अवश्य करें ।


मोती लाल

संपर्क: कार्यालय- विद्युत लोको शड, बन्डामुण्डा
राउरकेला - 770 032-उड़ीसा
निवास- ड़ोंगाकांटा, प्रखण्ड कार्यालय के पीछे
मनोहरपुर - 833 104-झारखण्ड
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बस्ती

यहाँ भूख जगती है
चमड़े को छूने से
और मन बहकता है
गर्म सांसों की महक से
उधर महज चिकनी जांघों को छूने पर
दूध उतर आता है
उनकी आंखों में

यहाँ फूल झड़ जाता है
उनके देखने भर से
और तन फैल जाता है
पसरते डैनों को देखकर
उधर गंध की बारीक डोरी
तब बंध जाती है
उनकी नाकों में कहीं

यहाँ नींद उचट जाती है
सपनों से तंग आकर
और आंच खत्म होती है
पेट के आंच में ही कहीं
उधर बजबजाते कीड़े रेंग जाते हैं
उनके हर सपनों में
यहाँ भूख, फूल या नींद
तुम्हारे कसते स्तनों से कहीं ज्यादा
बेपरदा होकर झूलने को तैयार हैं
इन दरवाजे विहीन घरों में

काश कि कोई होता यहाँ
तुम्हारी बिरादरी का
और देखता
झड़ते स्तनों से
खून की सिर्फ दो बूंदें ही
कैसे सुला पाती है
हमारे घरों में बच्चों को ।

 

 

 

मंगलसूत्र

जब बिक गई थी
तुम्हारी हाथों की
सारी चूड़ियां
कानों के झुमके
नाक की नथनी
पांव के पाजेब
मन का शीशा
पता नहीं तब
टूटा था या नहीं
तुम्हारे भीतर भी कुछ

जब बिक गये थे
तुम्हारी रसोई के
सारे बर्तन
चूल्हे की राख के साथ-साथ
रजनीगंधा का गमला भी
पता नहीं क्यों
तुम्हारे होंठों ने पी लिया
आंसुओं को
या सूख गया
बेजान आंखों में ही कहीं

जब बिक गये थे
तुम्हारे घर के
सारे कपड़े
और नहीं बची थी
कोई एक पक्की ईंट भी
पता नहीं क्यों
नल का पानी
तुम्हारे खून में उतर आया
या पहुंच गई तुम
इन सबसे परे
संवेदनाविहीन क्षितिज पर

अब जब बची है
सिर्फ एक मंगलसूत्र
और वह
छिन लेना चाहता है इसे भी
दो घूंट शराब के लिए
पता नहीं क्यों
जिसे होना चाहिए
तुम्हारे भीतर
वह नजर नहीं आता है
और लाल-तिरछी रेखाएँ
तुम्हारे चेहरे पर जम जाती है
और कहीं नजर नहीं आता है
उसका या तुम्हारा
पता नहीं किसका मंगलसूत्र ।

 

 

 


वजूद

तुम क्षितिज पर
सुबह की सूरज सी हो
तुम हो चिड़ियों जैसी
फुदकती रहती हो
अपने आंगन में
चांद की शीतलता भी तुममें हैं
और फूलों सी मुस्कान भी

तुम हो सकती हो
गंगा
यमुना
सरस्वती
या फिर
लक्ष्मी
पार्वती
मरियम
पर तुम नहीं हो सकती
इनमें से कोई एक आस्था

जब भी
तुम्हारा परिचय दिया गया
तुम्हारी देहयष्टि को सराहा गया
कि फूल सी तुम कोमल हो
कमल सा नयन है
चाल हिरणी सी है
पर नहीं देखा गया
कभी तुम्हारे भीतर के भावों को
और झोंक दिया गया तुम्हें
रसोई की आंच पर
दहेज की बलि वेदी पर
बताया गया
कि असल में तुम लड़की हो
एक गीली लकड़ी की तरह

इन सबसे परे
तुम्हें बताना चाहिए
कि तुम इन्दिरा हो
मदर टेरेसा हो
मेधा पाटकर हो
या फिर तुम
महादेवी हो
अमृता हो
और हो आंग सान सूची भी

तुम्हें नहीं बनना है
चूल्हे की आंच
या दहेज की जांच
बनानी है एक रेखा
जो तुम्हारी देहरी से
क्षितिज की ओर जाती हो
और पहुंचती हो
तुम्हारे अपने सूरज के पास ।

 

 

 


चिंताएँ

मेरी चिंता है कि
कैसे आज की रोटी कमाऊं
और सुला सकूं बच्चों को

उनकी चिंता है कि
कैसे छठी मंजिल शीशों का हो
और ड्राइंगरूम में हो
हुसैन की सर्वोत्तम कलाकृति

तुम्हारी चिंता है कि
कैसे इस बार भी
मिल जाए कुर्सी
और खुल जाए
विदेशी बैंक में एक खाता

चिंताएं अनंत है
किसी के लिए
प्रेम एक चिंता है
तो दहेज दूसरी चिंता
नौकरी एक चिंता है
तो स्टेटस दूसरी चिंता


पर चिंताओं के इस बैंक में
एक अच्छी चिंता भी है
जैसे पर्यावरण
एक अच्छी सी रचना
परमाणु निशस्त्रीकरण
शांति वार्ता
और मानवाधिकार हनन की चिंता
जब कोई आंच
उठती है आकाश की ओर
और नहीं मिलता है उसे
तवे पर रोटी
तब वह पेट में समा जाती है
और जलाती है
सभी चिंताओं को

सूखी टहनी पर
जो चील बैठा है
उसकी नजरें टटोलती है
मुर्गी के बच्चों को
और उड़ाना चाहता है
उन मासूम बच्चों को

 


चिंताओं की पंक्ति
यहीं नहीं खत्म हो जाती
एक तिरछी रेखा
रसोई से उठकर
मंगल तक पहुंचती है

जो हो
समस्त चिंताओं के बीच
एक असली चिंता
हमेशा से हाशिये पर
चली जाती है
आम आदमी की चिंता
जिसे चील उड़ा ले जाता है ।

 

 

कुछ नहीं होता

एक सा कभी कुछ नहीं होता
न जन्म, न मृत्यु

दो लाल गुलाब
सुर्ख खून सा
जो मेरे गमले में हँस रहे हैं
मैंने देखा
वे एक सा नहीं हैं

आज की रात
पिछली रात जैसी भी नहीं है
गुजरा हुआ दिन
आज के दिन सा भी नहीं है

मैंने यह भी देखा
मेरे व पिताजी का खून
एक सा नहीं है

डरते-डरते ही मैंने
चढ़ायी थी आंच पर
जिंदगी में पहली बार
चाय की केतली
और देखा था
भाप बनते हुए पानी को
दूध तो कब का
उतर चुका था
सेठ की तिजोरी में
बिल्कुल आधी रात में
पहली बार डरा था मैं
चमगादड़ों के चीत्कार से
घटाटोप अंधेरे में
एकदम से नहीं सुझा
और चाय उफनकर जल चुकी थी

इस दुनिया के चमकते रोशनी में
जब पहली बार
आंखें खुली थी
तभी जाना था
रोशनी की दुनिया को
और आंखें चौंधिया गई थी
नहीं समेट पाया था मैं अपने आपको
और उन रोशनियों को भी

आजतक मेरी आंखों में
चुभता है रोशनी की चमक
लाख कोशिशों के बावजूद
अपने को नहीं ढाल पा रहाहै
इस दुनिया की चमकती रोशनी में

हाँ सभी रोशनी
एक सा कभी नहीं होती ।

 

 

 


उजाला

मुझे अच्छा लगता है
कटे-फटे चांद के बजाए
भरा-पूरा चांद

मुझे अच्छा लगता है
शांत नदी की बजाए
संगीत छेड़ती नदी

मुझे अच्छा लगता है
गर्मी से झुलसे फूलों के बजाए
सर्दी से जूझते फूल

मुझे अच्छा लगता है
कविता सुनाने की बजाए
कविता बुनना

मुझे अच्छा लगता है
सुबह में मंदिर की घंटी
मस्जिद का अजान
चिड़ियों का कलरव
सूर्य का उगना

मुझे अच्छा लगता है
हरा रंग
जैसे हंसता हुआ पेड़
लाल रंग
जैसे सिमटी हुई गोधूलि की बेला
पवित्र आदमी
जैसे महान सुक़रात की मुस्कान
निश्छल सेवा
जैसे मदर टेरेसा का समर्पण

मुझे अच्छा लगता है
समस्त जीव
समस्त संभावनाएं
जो दे सके
मानव को उनका अर्थ
सारे तर्कों को ताक पर रखकर
और जल सके वे दीप
सारे अंधकार को मिटाकर ।

 

टेढ़े समय में

मैं चाहता हूं
सबकुछ भूल जाऊं
चाहे चिड़ियों का संगीत हो
या नदियों का
चाहे माँ की लोरी हो
या फिर पिता की संवेदना
इस टेढ़े समय में

यों न भूलने वालों में
कुछ ऐसे भी चेहरे हैं
जो बरबस खिंचता है मन को
और आईने में दिख जाता है
उनकी चमकती आंखें
नीला आकाश सा फैली बाँहें
गर्म सांसों की धड़कन
जो बहते हैं
नदी की तरह
महकते हैं
फूलों की तरह
चमकते हैं
सूरज की तरह
बहुत मुश्किल होता है
सबकुछ भूल जाना
भले ही समय टेढ़ा जा जाए

मैं चाहता हूं
कुछ बुन लूं
समय के धागों से
अपने बच्चों के लिए कमीज
बिटिया के लिए फीस
या फिर माँ के लिए अदद साड़ी
समय के गुणा-भाग में
बिल्कुल नहीं बचता है
किसी के लिए कोई चीजें

गये दो दशकों से
मेरे फटे चप्पलों ने
आजतक नहीं बुन सका है
कोई अच्छा समय
और मैंने आजतक
फूलों की ख़ुशबुओं से
बचाए रखा है अपने परिजनों को

यों भूलने की तारीख़ें
सदा बोंसाई में ढलते रहे हैं
और उन धुंओं के बीच
कमरे का छप्पर
बिल्कुल नहीं दिखता
ना ही नजर आता
मेरे लिए कोई आकाश
मुन्ने के लिए खिलौना
और उनके लिए चूड़ियाँ

मैंने देखा
भूलने का समय
अभी नहीं आया है
नहीं सूखी है
अभी स्याही
और बची है आंच
इन सारे टेढ़े समय के बीच भी ।

 

 


उनसे प्रेम

एक दिन मेरा प्रेम
घुप्प अंधेरे से निकलकर
उनके आंगन में जा बैठा
और देर तक सेंकता रहा
धूप की किरणें

जिस दिन
तुम्हारी आंखों में कुछ गड़ा था
और तुम्हारा हाथ
गोबर से सना था
मैं विहंसता रहा
तुम्हारी विवशता को देख

उस दिन
मेरी आंखों में चढ़ा था
एक उन्मादी ज्वर
सागर सा ज्वार
और एकदम उगा था
एक नन्हा सा पौधा
मेरे ह्रदय में ही कहीं

 

नहीं ठीक-ठीक
यह याद नहीं
मैं कहां था उस वक्त
जब लहरायी थी
तुम्हारी फाल्गुनी दुपट्टा
और अंगड़ाई के द्वार पर
थाप के कितने रिदम पड़े थे
लाल-लाल श्यामल का फूल
कहीं गिरा था तुम्हारे पास
उड़ रही थी उन हवाओं में ही कहीं
महुआ की तेज गंध
एक पल को लगा
घड़े का ठंडा पानी
तुम उंडेले बैठी हो
अपनी चिकनी जांघों में
और बिना पतवार के नाव
तुम्हारे सुडौल स्तनों के बीच
हिचकोले खा रहा हो

बहुत संभव था फिसल जाना
तुम्हारी पुष्ट बांहों में कहीं
कि मैं लिपट पड़ा था
ठीक लताओं की तरह ।


विवशता

बंद कमरे में
हवा के दीवारों के बीच
कहीं कोई छेद नहीं है
जो उतरता हो
मेरे टूटे मन में

एक चिड़िया
जो चोंच मारती है
शीशों की खिड़की पर
हर रोज ठीक सुबह सात बजे
जब सुना जाता है समाचार
चाय के प्याले के साथ
तब वाचिका के मुस्कान को
वो नन्हीं चिड़िया नहीं देख पाती
यदि देख पाती तो
अपना चोंच क्यों घायल करती
तब नहीं बैठ जाती
मुंडेर पे ही कहीं
और गुंथती उस मुस्कान की लड़ी

ठीक उसी समय
कुछ मेघ
उतर आते हैं
मेरे इसी कमरे में
नहीं खबर सुनने नहीं
बस कुछ बोने के लिए
मेरे टूटे मन में
बांध दरक जाते हैं
फूल की खुश्बूएं
उड़ जाती हैं
उतर आते हैं
चिल्लाहटों की पूरी दुनिया
इस छोटे से कमरे में

घर की खिड़की के पीछे से
बस, कार, ट्रेन
और आदमियों की दौड़
आंधी की तरह
डोलते दिखते हैं
तब मन बिल्कुल नहीं चाहता
भागने को
उनके पीछे
और हर रोज
ठीक इसी समय
पत्नी टिफिन पकड़ा देती है
और बेटी की फीस
मुझे बस में ठेल देती है ।
देहरी के पीछे

वह कविताएं नहीं लिखती
मुझे लगता है कि वह
कभी भी कविताएं नहीं लिख सकेगी
और यही बातें कविता सी तैरती है
मेरी आंखों में

वह बुनती है
बांस से टोकरी
पत्तों से दोना
और बांटती है रस्सी

वह बिनती है
चावल से कंकड़
जंगल से लकड़ियां
और फिंचती है कपड़े

वह जाती है खेत
गोबर से लीपती है आंगन
दो कोस से लाती है पानी

उसका सूरज कभी अस्त नहीं होता
और वह अंधेरे में
शरबत बनकर बिछ जाती है खटिया पर

वह होने को हो सकती है
एक मुकम्मल किताब
पर उनके अक्षरों को
चूल्हे की आंच ने गला दिया है
और बना डाला है उसे
नारी से मोम
जो पिघल जाता है
घर की रसोई में ही कहीं
सपने बुनने की चाहत लिए

वह भी चाहती है
देखें चांदनी रात में
फसलों को झूमते हुए
गाते हुए चिड़ियों को सुने
और गुनगुना ले अपने लिए कोई गीत
जो वह गाती थी
अल्हड़ बचपन में

मैं चाहता हूं
वह लिखे अपनी कविताएं
अपने सूरज के बारे में
जो कभी भी नहीं चमका है
उसकी देहरी में कहीं ।
मेरी नींद

मुझे नींद की जरूरत थी
और वह कहीं दिख नहीं रही थी
पर मैं कैसे भूल सकता हूं
पिछली बार वह
उतरी तो थी मेरी ही आंखों में

उसे ढूंढने की प्रक्रिया में
मैं था उस फुटपाथ पर
जहाँ जांघ उघाड़े एक औरत
अपने बच्चे को चिमटी
बेखबर सो रही थी फटी गुदड़ी में
और उधर वह लंगड़ा
मच्छरों के भिनभिनाहट पर भी
कितने मजे से नींद के आगोश में था

रात के इस तीसरे पहर में
सारा शहर सोया पड़ा था
और मैं अकेला जग रहा था
ठीक रेलवे स्टेशन की तरह

मैंने देखा आकाश को
देखा कुछ तारे लुप्त थे
जो पहले पहर में
मेरे साथ-साथ चले थे
नींद को खोजने
शायद वो पा गये होगे
मेरी उसी नींद को
इसलिए वो भी लुप्त हो गये हैं
मेरी नजरों से ।

 

 

 

गांधी के देश में खौफ

अभी मैं क्या कर रही थी
ओह, कुछ याद क्यों नहीं आ रहा
यही होता है
हमेशा यही होता हैं यहां
जब भी कुछ काम करती है
दूसरे ही पल भूल जाती है
कि मैं क्या कर रही थी

नहीं, टूटा नहीं है
कुछ भी मेरे भीतर
हाँ, याद आया
कल शाम आईना दरक गया था
जब मैं बैठी थी
अपने बालों को गूंथने के लिए
उसी रात मैंने देखी थी
एक काली हब्शी बिल्ली
चूहे को झपटते हुए

हाँ, शायद परसों सुबह
जब ओस से भीगे घास में
खुले पांव चली थी
रात की बारिश ने
सुबह को धोकर चमका दिया था
मैं चूजों को मुर्गदाना खिला रही थी
तभी निर्मोही चील ने
एक चूजा उड़ा लिया था
और मुर्गी चिचियाती दौड़ी थी
आज दोपहर की बात है शायद
लू की मार से सभी
घर में दुबके बैठे थे
शायद युग चल रहा था टीवी पर
पहले छत हिली थी
फिर दीवारें
कुछ समझूं
तभी धमाका हुआ
और सुनी थी मैंने एक चीत्कार
शायद मेरे गली के उस कोने से
मैं, चाहती थी झांकूं गली में
मुझे नहीं खोलने दिया गया दरवाजा

शाम को
मैं नहीं देख पायी लालिमा
बिजली गुल थी
डिबरी के मद्धिम रोशनी में
मैंने सुना
उसे मार दिया गया
बड़ी बेदर्दी से
पहले गर्भ को चीर डाला
फिर लहू से लथपथ
भ्रूण को निकाला गया
और एक-एक कर अंगों को उफ.....

रात खुली आंखों से गुजरी
बार-बार मेरे सामने
हब्शी काली बिल्ली
और काली चील
मंडराते रहे थे

सुबह चूल्हे में
मैं लकड़ी ठूंस रही थी
तभी चुभा था
उस आईने का टुकड़ा पांव में
और मैं भूल गई
कि अभी मैं क्या कर रही थी ।

 

 
अंतहीन

अंतहीन के अंत में
कुछ उलझ गया है
मेरी डोरी के वे तमाम लच्छे
पर कोई नहीं है
न इस पार
न उस पार

बीच में
जो नदी बह रही है
धागों के समुद्र में
नहीं मिलती है
और नहीं सी पाती है
दरजिन चिड़िया
मेरे लिए कोई घोंसला

समय के अंतराल से
पृथ्वी के क्षितिज पर
एक दहकता फूल
उस अंतहीन बेला में खिला था
जब बच्चा बोलना सीखा ही था
और सूख गया था सारा दूध
माँ के आंचल में ही कहीं
पेड़ की फुनगी पर
मेरी नजरें जा पहुंची
तब भी नहीं दिखा
दहकता सा सूरज
और ओस से भीगा पांव
लौट आया था
अपने ही दहलीज पर
उस अंतहीन का पता पूछने ।

 

 

ठीक समय

जब ठीक होगा समय
कुहरे छंट जाएंगे
शीतल ब्यार बहने लगेगी
फसलें झूमने लगेंगे
गायें रंभाने लगेगी
और आंगन में गूंजने लगेगी
गांव-वधू के गीतों की लहरी

जब ठीक होगा समय
हम ठीक रहेंगे
और रहेगी हमारी आस्थाएं
मिट्टी के संग
हम बांच पायेंगे
सबकी संवेदनाएं
एक दूसरे के संग
हम ढो पायेंगे
दुःखों का पहाड़ भी
हर मुस्कान के संग
और ले जाएंगे कदम
वन की ओर
जहाँ नाच पाएंगे
मयूर के संग
जब होगा ठीक समय
बची रहेगी स्मृतियां
बची रहेगी कविताएं
बची रहेगी नदियां
बचे रहेंगे पेड़
और बची रहेगी मानवता
जब सिर पर आती डाल
और रेत का किला
दीवार घड़ी सा
टक-टक बजने लगता है
और उतर आता है कुहरा
आंगन से होता हुआ
अंतर्मन में
तब हथियार का धार
और जला हुआ खलिहान
पूरा का पूरा पेड़ बनकर
जकड़ लेता है समय को

धानी रंग सा
जुगनुओं की चमक
श्रृंगार नहीं बन पाती है
और उमंग के अफलातून में
हम नहीं कटा पाते हैं टिकट
धूप भी नहीं छंटती है
और पगडंड़ी लापता हो जाती है
उन समय के बीच
जहाँ स्मृतियों का समुद्र
आंगन में उफन आता है
और नहीं मिल पाता है
बच्चे को रोटी

ठीक होने का
ठीक समय
अभी नहीं उतरा है
हमारे शहरों में
जंगल की हवा ने
जकड़ रखा है
हमारे समय के समय को ।

 

 
प्रहार

स्मृति-शेष के सीलन पर
हम चूर-चूर हो जाएंगे
और चांद-तारों के पार
अंतरिक्ष में हम
बसा लेंगे बस्तियां

सफेद हंस सी आंखें
निस्तेज नहीं होगी
और रूई के बोरों सा
हलकी होने से रही भाषा
हम चीर लेंगे धूमकेतु की धार को
और बचा लेंगे
अपने हिस्से का सूरज

कौंधती चीख
जब कभी भी
फूटने ही वाली होती है कंठ से
महाशून्य के तलुए
चौखट पर जाम नहीं हो जाते
क्षितिज की ओट में
उम्र का परीक्षण कर
जब हम थके-मांदे
इतिहास के पन्ने खोलते हैं
हजार बल्ब की सी आंखें
कैलेण्डर की तारीखों में बदल जाते हैं

चुप्पी साधे
मोक्ष की साधना में हम
पत्थर बनने से रहे
अंतर्मन को बुहार कर हम
जरूर पका लेंगे रोटी
और नुकीली चीख की तरह
बचा लेंगे दादी की कहानियां

खो जाने की बारी
उसके पंजे में नहीं जाएगी
मांदों में तब्दील होने वाला घर
हम छोड़ चुके हैं छठी सदी में ही

अभी करूणा की जमीन
पुखता हो रही है
हम साफ कर रहे हैं जंगली घास
और गर्म कर रहे हैं हथेली
ताकि जब कभी बछड़ा
भूल चुका होगा अपना चारागाह
और नेपथ्य की घंटी
जब उन्हें सुनाई नहीं देगा
तब हमारी गर्म हथेली
बन जाएंगे हजार सूरज
हमारी भाषा
धूमकेतु सा चमकेगी
और जला डालेगी
उन हाथों को
जो तनती हो हमारी सीमाओं में ।

 

 

 

वारदात

चूल्हे में सुलगती लकड़ियां
कोई वारदात की खबर नहीं बनती हैं
और हाथ सेंकने का उपक्रम
पहुंच जाती है संसद भवन तक

किसी भी स्थिति के विरूद्ध
गोलबंद होने की परछाईं
जब असंसदीय हो जाता है
एक कीड़ा रेंग जाता है
वारदात से कुछ पहले
ताकि सतर्क तंत्र को
ठीक से ठोक दिया जाए
और बिठा लिया जाए
जाँच कमीशन
जो फबती तो हो
कालरों के रंग के संग

अभी-अभी दबे पाँव
सड़क उतर आया है
फुटपाथों पर
और घुल गया है
खौफ का धुआं
हवा बदनाम हो गई है
और चीखों की आवाजें
बता देती है
कि वारदात तो हुई है

लिफाफे की तरह
बंद नहीं हो जाएंगे
सोमालिया या कालाहांड़ी
खुलेगी वे वारदातें भी
पोस्टकार्ड की तरह
और उनका सपना
बह जाएगा नाली में
जब नहीं बन पाएगा
यह देश एक सोमालिया

वारदातें
सिर्फ वहीं हैं
और सपने यहाँ हैं

नीले समुद्र
हरे जंगल
नीले आकाश
और हरे पर्वतों के बीच
जहाँ बसी है
हमारी अपनी मिट्टी
इतनी जल्द
नहीं बदलेगी
किसी भी वारदात में ।

 

 


करवट लेना है

मान लो क्षण भर में ही
सुहागन लाज से लिपटी शरद
घटा घनघोर बिखराकर
लोट जाती हो तुम्हारी चरणों में
और सुकोमल कल्पनाएं
गुलाबी पंखुरी सा
केसर से झड़कर
आंखों की रोशनी बन जाती हो
तब क्या शिथिल सतरंगिया आंचल
लहरा उठेगा आकाश में
और हरसिंगार सी रमती धूप
पसर जायेगी आंगन में

तुम्हारी कचनार के स्पर्श का जादू
रंगे हुए अर्थहीन में
तब्दील होने से रही
और नागफनी की गोद में
बेदाग तरूनाई
कहाँ मचल जायेगी
बरसात के दुपहर सा


अभी नशों का बादल
मदभरी अंगड़ाई नहीं ली है
चांद अभी धुला भी नहीं है
और मुक्ति पथ पर
त्याग का सम्मान
अभी कहाँ धड़का है ह्रदय में
रोशनी से भरी अनगिनत रातें
घोर कजराई में
तब भी नहीं बदलेगी
जब तुम झांक लोगी देहरी के पार
कोई समुद्र नहीं आ जायेगा आंगन में
और कोई बवण्डर
नहीं उड़ा लेगा छत को
महज व्यक्तित्व के निखार पर
बंदूक की गोली
यदि छूटती है तो
क्या तुम इंदिरा नहीं बन पाओगी
और क्या माँ टेरेसा को
अपने चौखट में कैद करना चाहती हो

अभी भी समय है
देहरी के पार झांकने का
और बुनने का सपना
जिसे तुमने
चूल्हे की आंच में झोंक दी हो ।
हम हैं उसमें

बया घोसले बना रही है
उमड़ती लहरों में कहीं
नौकाएं आगे बढ़ी जा रही है
कतार में आते बच्चे
परछाईं सा डोल रहे हैं
और लंबे पेड़ों के वन में
रात चुपके से उतर गयी है

कॉफी हाउस की भाप
मन को उद्धेलित कर रही है
और गिरजाघर की मीनारों से
जो फूल मुसकुरा रहे हैं
वे कहीं से भी
मातमी परिधान में लिपटी नहीं हैं
और तेज बारिश की तरह
धुंधलायी खिड़कियां गुम हो गई है
उसी नक्कारखाने में
जहाँ संसद बैठा ऊंघ रहा है
और जल रही है आग
जंगल के उस कोने से
हमारी रसोई तक
और जिसकी आंच से
वे दरवाजे ही गुम हो गये हैं
जिसे होना था माकूल अपनी जगह

हवा मलबे में चली गई है
और फटने को है ज्वालामुखी
इधर ऋतुएं बहुत जल्दी में
बदलने की प्रक्रिया में है
और हर प्रयत्न की सीमा
अमरबेल की तरह
अंतरिक्ष तक चली गयी हैं

कल जो हवा
जंगल से होकर गुजरती थी
हमें सुकून से भर देती थी
आज वही हवा
हमें विचलित कर जाती है
हमें पेड़ों की चीखें सुनाई देती है
और सनी होती है उनमें
खून की अजीब गंध
वास्तव में
जल्दी की रैजीमेंट ने
हमारे विश्वास को हिला दिया है
और सुबकियां लेती तमाम व्यस्थाएं
अब कोई मायने नहीं रखती हैं

हमारी कोशिश है
बिखरने से बची रहे हमारी ऋतुएं
और मौजूद रहे
अणु की वह सारी शक्तियां
जिसमें है हमारा समय ।

 

 


सिंदूर के भीतर

यह तुम्हें स्वीकार नहीं
कि अकुला आये फूलों से
फौलाद की धधकती सलाखें
तुमसे एक सौदा करे
और कैक्टस के कांटों में
दोपहर बंद होकर रह जाए

अंतर का कुछ पाट
प्रश्नचिन्ह बनकर
भाग्यरेखाओं पर डोलती हैं
और काले कुत्ते का जीभ लपलपाना
चाहे अस्तित्व बिगाड़ दे
या चांदनी चटका दे
सारे सुकून को दरकिनार कर
तुम्हारे स्वीकार के अस्तित्व में
क्यों नहीं सुबह जग पाता है

यहाँ उधार की खामोशी
जिजीविषा का मूल्य नहीं बन पाता है
चूल्हे की आंच पर
और ओस की बूंदों पर
सारे ही प्रश्न
बेदखल कर दिये जाते हैं
और पसीने के रस से
आखिर कबतक रोटी खायी जा सकती है

तुम्हारा सूरज
फ्रिज में बंद है
और उजाले की धार
खिड़की से ओझल
कब स्वीकार के पन्ने
पक्षी के परों की तरह
किरणें झाड़कर
बोंसाई में बदल जाते हैं
कब जंग लगे सूरज से
एक धधकता आंचल
मूल्यों के भाव में
विश्व मंडी में चले जाते हैं
कुछ पता ही नहीं चलता
और धरी रह जाती है
तुम्हारी सारी संवेदनाएं
चूल्हे की आंच में ही कहीं ।

 

 

बची हुई पृथ्वी

प्रतीक्षा और इन्तजार से बना धीरज
वर्तमान की अंकुवाई हुई रोटी ही तो है
सिद्धांत शून्यता के घूरे को
आखिरी पायदान समझे हम
पहुंच चुके हैं सदी की आग में

कम्प्यूटरीकृत युग में
वंचितों के लिए
हम कहां से उगाये फसलें
हम तो बस कम्प्यूटर में भरते हैं मानव
सोते हैं हम अंतरिक्ष में
और बनाते हैं रंगों के सपने
दृश्यों के भीतर में कहीं
कि जागा हुआ आदमी
वंचितों की बस्ती में
कोई पत्ता न खड़का दे
और बुन न ले पत्थरों में मानवीय रिश्ता

विश्व बाजार
मेरे घर में घुस आया है
कविताएं अब नहीं बची है
पढने की चीजें
इंटरनेट ने सारी उर्जा
सोख ली है कविताओं की

हमारी कविताओं में अब
बादल, हवा, पेड़, नदियाँ, आंगन व रिश्ते
सिरे से गायब हैं
और परमाणु, कम्प्यूटर
भरी जा रही है
और बन गयी हैं कविताएं
अंतरिक्ष का मीर

रोटी के दृश्य के भीतर
पेड़ नहीं लहलहाता है
और चिड़ियों का संगीत
सूर्य ने लील लिया है

संवेदनाओं का वसंत
क्या आपने कहीं सुना है
और भावनात्मक आत्मीयता
कहीं आपने देखा है

मेरे संग्रहालय से
ये चीजें गायब हो गई है
मुझे लगता है
ये किसी सिरफिरे मानव की
कारस्तानी हो सकती है
हो सके तो मुझे
उस मानव से मिलाना
रोबटों के इस युग में
जरूरी है उस मानव से मिलना ।

 

 

 

बचाए रखने की मजबूरी

हम उस समय में हैं
जब हथियार हमारी जरूरतें हैं
और सामाजिक बंधन
टूटने के कगार पे हैं
सारे जीवन का भाष्य
इंटरनेट में समा चुकी है
और संवेदनाओं की सीढ़ी
स्वाद-संस्कृति में खत्म हो रही है

अभी विकट समय
अपने आप पर हँस रहा है

कुछ विद्रोही होते हैं
जो मोर्चे बनाते रहते हैं
समय की खड़ी पहाड़ों पर
और बचा पाते हैं
संवेदनाएं
आपसी रिश्ते
और जीवन का भाष्य

अभी सुरक्षित समाज का आश्वासन
अव्यवहारिक मानकर
बच्चों को नहीं सौंपा जा सकता
और सिद्धान्तों के हथियारों को
शहीद नहीं किया जा सकता

विकृतियों का अजायबघर
बौद्धिक अवधारणाओं के रूप में
भले मनोविज्ञान की धज्जियां उड़ा दें
और अट्टहास कर लें
साधने की पूरी मशीनरी पर
पर खूंटियों में लटके
बदलाव की आंधी को
आने से हम नहीं रोक सकते

तालमेल की राजनीति
भला सिद्धान्त को क्या खिलायेगा
और क्या बना पायेगा
लोहे को गर्म
जहां सहानुभूति की आग
समानांतर ताकत की तरह
हमारी बस्ती में विराजती हैं ।

 

 

फासले

महत्वपूर्ण है उस प्रक्रिया से गुजरना
जहाँ सौंदर्य के खिलाफ
चल रहे षडयंत्रों में
प्रतिबद्धता की चुनौती
कलमों से फूटकर
बड़ी शिद्धत से
सवालों को पाट देता है

साफ शब्दों में
संपूर्ण असहमतियां
छाए संकट के बादलों के पार
सुंदरता बन जाती है करूणा
और उम्मीद के फेंटसी समय में
तमाम आक्रोश
भविष्य के उजाले को
आश्वस्त करती है

इस असामान्य असंबद्ध समय में
समाज व परिवेश के प्रति संलग्नता
बगैर माटी के महक का
आखिर सुंदरता को
कहां ले जाएगा
और यथार्थ की असहमतियों में
समय की संवेदनशीलता को
कौन ढोकर ले जाएगा
उस ऊंचे शिखर की ओर
जहां उजाले का यथार्थ
अनुभूतियों के परे
सांस रोके आंखें बिछाए हुए हैं

समय का मुकाबला
छंद की शुद्धता नहीं है
और सभी उत्तरों का मुंह
बुनियादी सवालों से दूर
उस उजाले में खुलते हैं
जहाँ जीवन की अनुभूतियां
डिस्को में तब्दील हो गई हैं ।

 

 
दासता

हमें नहीं चाहिए कोई दिव्य भवन
उन्हीं दो पल्लों के बीच
जहाँ अब भी गूंज उठते हैं
सुरक्षित संगीत के तराने
तुम इसे मेरा पागलपन भी कह सकते हो
पर उस काले पन्नों को
मानचित्र से हमने मिटा डाले हैं
जहाँ बूचड़खाने की बातें
हमारे वोटों में तय होती हैं

यह जो है रास्तों के बीचोंबीच
ध्यान से देखो
छुपी है पत्थरों में आग
और कोई भी पगडंड़ी
अभी नहीं बदली है
अभी समर्थ के सभी रंग
करूणा की ऊंची चोटी पर
तिरंगे की तरह लहरा रहा है

पोस्टकार्ड बनना हमें मंजूर नहीं
और संवेदना पर काल का प्रहार
तुम्हारे कमरों में फैली मिलेगी
यहाँ तो कविताओं की डायरी है
जहाँ हम संवेदनाओं को
हमेशा से ओढ़ते-बिछाते रहे हैं

तुम्हारी डायरी में होगी
कोई दिव्य-भवन के नक्शे
पर करूणा की जमीन
तुम्हारी डायरी से गायब हैं

जो चीजें उतरती हैं
हमारी अंतस की गहराइयों में
और दे जाती है स्फूर्ति
उन्हीं से भय है तुम्हें
और धूप की गर्मी में
आने से तुम डरते हो

यहीं से शुरूआत है
समय की नई दीवारों पर
लिखने के सारे सपने
ताकि चैन की नींद
तुम्हारी तरह
हमें न आए
इसलिए तुम देना चाहते हो
हमें भी कोई दिव्य-भवन ।

अपने कमरे में

ऐसा है कि
मैं आदमी बना रहना चाहता हूं
अपने आईने के समक्ष
गहन विस्तार के खोल में
जैसे किसी एकाकी घर की गंध
जैसे जन्मता हो एक शिशु

ऐसा है कि
नींद में कंपकंपाते हुए
जज्ब करते हुए विचारों को
बालों और परछाई से
नहीं देखा जाता विश्राम के पल को

मैं नहीं चाहता
अकेली सुरंग की तरह
गरम खून के कदम
क्रोध और विस्मरण के साथ
कहीं शर्म और भय से
उन दरवाजों में लटक जाए
जहाँ न रंगीन चिड़िया आती है
न ही बजते हैं शंख की ध्वनि

मैं गुजरता हूं शांत
उन मुहानों से होकर
अपने सीलन भरे मकान की ओर
जहाँ न जहर के दांत हैं
न बेचे जा रहे हैं लाशें
ऐसा है कि
रेशा-रेशा नम तंतुओं के बीच
इस जर्जर कमरे में
भले उत्तर आधुनिकता के पंख
जीव तत्व बनकर नहीं आये हों
पर किताबों की दुनिया है
पीड़ाओं के सूखे गुलाब हैं
तभी तो रक्तिम थकान से भरे पांव
नष्ट हो चुकी चीजों के बीच
एक नामालूम जीव तत्व के मौन में
पसर जाते हैं अपने बिछावन में ।

 

 

फिर कभी नहीं

आदमी मसल डालते हैं
कठोर धातु को भी अपने हाथों से
प्रकाश के उन सारे पंखुड़ियों को
फेंटी गयी ताश की तरह
जब नहीं मिलती है उन्हें शांति

कपड़े और धुएं के बीच
मौजूद है वे आत्माएं
जो मानव वसंत की मल्लिका के पास
समुद्री स्त्रोतों से
चुन लेते हैं स्फटिक
और बना लेते हैं चाकू को धार
जहां पतझड़ के कोटरों के बीच
कोई फूल अपना बीजाणु सुरक्षित रख सके

औंधे पड़े मुखौटों का एक झुंड
मुसीबतजदा भूमि को
उन्मुक्त सीटियों के बीच
किसी भी गोधूलि बेला में
अपना पता सौंपते हुए
अक्षय जीवन के खोखले लहरों में
बिल्कुल तन्हा पाता है
जिस हिस्से में
जल स्त्रोत की धार
अनवरत बहती जाती है
और जिस रूप में
छायाओं की आवाजों के नीचे
कोई नाव
खूनी लहरों में बही जाती है
वहां होने की हर जरूरत
लौटा चुका होता है
मानवी सुख की उस खोह में
जहां न चुंबन की कौंध है
न ही दोहराया जाता है
पहली छुवन की सघन उत्कर्ष को

जो कुछ फैल रहा था
हवा के तंग रास्ते तक
जीवन बिखरता गया
और अक्षय भंडार में
कई छेद हो गये
तब पहली बार प्रतिक्रिया की मौत
उन आखिरी कदमों में
अधूरे टुकड़ों सा फैल गये
जो दे गया उन्हें
एक धारदार चाकू
और जहरीले मिथेल को
वे हवाओं में मिला चुके थे ।
षडयंत्र

समय तब भी बरसता था
जब हमारे पास
न चूल्हे में लकड़ी थी
न चौखट में सूरज

काल और धूल के संबंध में
एक बात बिल्कुल साफ थी
कि सभी ग्रहदशा
ऊंची रसोई में ही पकते थे
और जमीन में लोटती
हमारे काल के सभी खंड
समय के उपर
कभी भी नहीं उड़ पाये

वह भला क्या जानेगा
कि मृत्यु के भय से
आंगन के सभी बीज
अक्षांश पर जा टंगी है
और हम बादलों के गरजने से
खेत में हल चला रहे हैं

छोटे-बडे दिनों की तरह
फसलें भी
प्रयोगशालाओं में जा पहुंची है
और व्यवस्था की खेती
उनके पेटेंट में
बंद होकर रह गई है
प्रश्न अभी भी हैं
हमारे समक्ष
अपने परिवार की
जिन्हें हम हल तो बना लेंगे
और जोत देंगे बैलों की जगह
पर स्मृति में पड़ती धूल से
क्या उनकी ग्रहदशा को
सुधार पायेंगे
और क्या उगा पायेंगे
समय के इस रेत से
एक मुट्ठी भर अनाज

समय अब भी बरस रहा है
उन चमकती हवाओं में
उन दमकते ऑफिसों में
जहाँ से तय होते हैं
हमारे मूल्यों का
वह भयानक मूल्यांकन
कि बंद होकर रह जाये
हमारे चूल्हे का जलना ।
तलाश

मैं अपने अंगों की छांह में बैठ जाता है
ललचते हुए चमेली की सुगंध
परखते हुए स्पर्श में पुराना मिलन
लरजते हुए हँसी की चमक
और खोते हुए सृष्टि का शून्य

बैठने की इच्छा तो है
उन बरगद की छांह में
जिनकी डालियों में कोयल कूकते हैं
उन नदी की तीर पर भी
जहां पैरों को चूमने
मछलियाँ आ जाती हैं
और उन गोबर लिपे आंगन में भी
जहां तुलसी हमें पिरो ले जाती है

कभी प्रकाश को छूकर
तो कभी हवा को चूमकर
कदाचित एक थकान अधबुझी सी
सरकती जाती है एकान्त में
कोई अंकुर कभी नहीं फूटने के लिए
और परिचित देह की गंध से
चमेली की सुगंध
कपूर बन जाती है

मेरे सामने जो है
अविकल, अखण्डित
सृष्टि के शून्य में
समा जाने के लिए
उनके सही अर्थों की खोज में
मैं अपने अंगों की छांह में बैठ जाता है।

 

 

सूरज उगेगा

शब्द फूटेंगे
झोपड़ों से
टूटे हुए इंसानों से
मासूमों के यातनाओं से
कूड़ों के डब्बों से
भूख से बिलखते मुख से
और लुटी आबरू के आंचल से

फूटेंगे शब्द
तमाम अनैतिकताओं के बोझों से
जब काला-कलूटा अंधेरा
लाठी चार्ज में फूटी
खोपड़ियों से चीखेगा
जब सर्द से ठिठुरता हर रेशा
काले बाजार में
बेचे गये अनाज से कौंधेगा
जब महाकाल के हाथों की मशालें
इंसानियत को सड़ाकर
बटोरी संपत्तियों से उगेगा
तब शब्द जरूर फूटेंगे


शब्दों को फूटना ही चाहिए
तभी बचेगी संगीनें
बचेगी हमारी हवाएं
चूल्हे में आंच
तन में कपड़े
मांगों में सिंदूर
कविताओं में आग
और जंगलों में फूल

एक दिन इतने शब्द फूटेंगे
कि उनके जेल कम पड़ जाएंगे
और उनके तमाम बल
हमारे शब्दों के पांव धोएंगे
और उस दिन हमारा सूरज उगेगा ।

 

 

व्यवस्था

तुम सोचते हो
नीची छतों के परिदृष्य के उपर
वही तीखा सूरज
पुच्छल तारे की तरह
क्यों नहीं चमक रहा होता है
और धीमी आंच के पकाव में
आसमान फोड़कर
किसी पौधे का उगना
क्यों नहीं चमत्कृत कर
सामने आ पाता है

तुम सोचते हो
अघोषित व्यवस्था की जरूरतें
इतना प्रासंगिक हो
कि ताजादम बस्तियों से होकर
राख का सीधा रिश्ता
उन पेड़ों से झंडे
जहां हमारे तारे बसते हैं

ज्यादा कठिन चिंता है कि
उन तारों के पार
ताजादम बस्तियाँ नहीं होती हैं
और धीमी आंच का चमत्कार
बहुत भीतर अनुपस्थित रहकर भी
पत्तियां पीली होने से बच जाती हैं

यहीं रहते हैं
हमारे समझ के अपने सपने
यहां छोटी सी छोटी जरूरतें भी
किसी अय्याशी से कम नहीं होती
तुम्हारे मौसमी आमों की तरह
एक चकित करने वाली व्यवस्था
यहां होने से रही

तुम सोचते हो
पानी में बीज की तरह
यहां पका लोगे रोटी
बांध लोगे
हमारी स्त्रियों के लम्बे बालों को
अपने आंगन में
बिछा लोगे व्यभिचार के तने में
हमारे कपड़ों के धागों को

पर किसी पुच्छल तारे की तरह
संपूर्ण निर्भयता
चीन की दीवार की तरह
अडिग खड़ा है
और जमीन से जुडे हमारे पांव
आकाश में उड़ने को तैयार नहीं है
हमारे लिए धीमी आंच
किसी तेज आंच से
कम कहां रह गया है ।

 

 


आकांक्षा

मैंने स्वयं से कहा
यह देखना
कि कुएं के तल में
आव