वीरेन्द्र जैन का व्यंग्य : लेखक-पत्नी संवाद
व्यंग्य
लेखक-पत्नी संवाद
-वीरेन्द्र जैन
’’मैं एक लेख लिखने जा रहा हूं‘‘ मैंने पत्नी से कहा।
’’और तुम कर ही क्या सकते हो, तुम्हें लौकी छीलना तक तो आता नहीं है इसलिए लेख ही लिखो‘‘ पत्नी ने आदत के अनुसार मेरे काम को निरर्थक और हेय प्रदर्शित करते हुये कहा और लौकी छीलती रही।
’’लेख का विषय है पत्नी से लड़ने का मजा‘‘ मैंने उसकी बात पर ध्यान न देकर अपनी बात आगे बढ़ायी।
’’मैं तो हमेशा से कहती आ रही हूं कि तुम्हें मुझसे लड़ने में मजा आता है इसलिए तुम बात बेबात हमेशा लड़ते रहते हो‘‘ अपने तुनकने अंदाज में वह बोली।
’’मैं लड़ता हूं‘‘ मैंने सवाल जैसा कुछ कहा।
’’और क्या मुझे मजा आता है?‘‘ उसने भी उत्तर में प्रश्न जैसा किया।
’’ अरे भाई ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती‘‘ मैं एक निष्कर्ष पर सहमति बनाना चाहता था।
’’ ताली बजाने की कौन कह रहा है? पर चाँटा तो एक हाथ से मारा जाता है। और लड़ाई में तालियाँ नहीं बजायी जातीं। तालियाँ बजाने के लिए तो तुम ढेर सारे सम्मान समारोहों में जाते रहते हो जहाँ दूसरे के लिए दोनों हाथों से ताली बजा कर खाली हाथ लौट आते हो।‘‘
’’ तो क्या दूसरे के गले में पड़ी मालाओं को लाकर फिर से तुम्हारे गले में डाल दूं!‘‘
’’ एक बार डाली थी उसे ही अब तक भुगत रही हूं‘‘ पत्नी ने जोर जोर से लौकी को काटना शुरू कर दिया था।
’’ भुगत तो मैं रहा हूं। तुम तो राज कर रही हो।‘‘
’’किस पर राज कर रही हूं?‘‘
’’मुझ पर, पूरे घर पर‘‘
’’घर की नौकरानी होने को घर पर राज करना कहते हैं? इसी भाषा ज्ञान के आधार पर साहित्यकार बने घूमते हो, और दूसरों के सम्मान समारोह में गरिमा बढ़ाते रहते हो‘‘
’’ अरे भाई तुम मालकिन हो, रानी हो इस घर की‘‘
मुझसे इतना सुनना था कि वह चौके में गई और वहीं से बरतन फेंकने शुरू कर दिये।
’’अरे ये क्या कर रही हो तुम!‘‘ मुझे बरतनों की चिंता थी।
’’ तुम्हें मालकिन होने का नमूना दिखा रही हूं। इन सारे बरतनों का इस्तेमाल मैं करती हूं और इन्हें धोती माँजती पोंछती हूं, पर इनमें से किसी पर भी मेरा नाम नहीं सब पर तुम्हारा नाम खुदा हुआ है- इस चम्मच पर भी।‘‘ उसने आखिरी आइटम के बतौर चम्मच फेंकते हुये कहा।
’’ अरे भाई मैं भी आखिर तुम्हारी प्रजा हूं । तुम रानी हो इस घर की। यह पूरा घर तुम्हारा है।‘‘
’’मेरा?‘‘
’’और क्या?‘‘
वह तेजी से बाहर गयी और दरवाजे से मेरी नेम प्लेट उतार लायी और बोली ’’पढ़ो इस पर क्या लिखा है?‘‘
’’ इसे तो रोज ही पढ़ता हूं।‘‘
’’यह किसका नाम है?‘‘
’’मेरा, और किसका?‘‘
’’ और यह नेम प्लेट उस घर के बाहर लटकी रहती है जिसकी तुम मुझे मालकिन बता रहे हो, उस घर के बाहर तुम्हारे नाम की प्लेट लटकती है‘‘
’’ पर मैं हेड आफ दि फेमिली हूं, इस घर को चलाने के लिए कमाता हूं, इस घर को मैंने बनवाया है। इसलिए मेरे नाम की प्लेट लगी है‘‘
’’ वही तो मैं भी कह रही ह कि तुम इस घर के लिए लिए लौकी तक नहीं छीलते फिर भी नेम प्लेट और बरतनों तक पर तुम्हारा नाम है और मैं सारे दिन इस घर के लिए खटती हूं तो मुझे अच्छे मैनेजमेंट की नीति के अनुसार मालकिन कह कर मूर्ख बना रहे हो। पर तुम भी क्या करो, तुम्हें भी आये दिन मूर्ख बनाया जाता रहता है, सम्मान समारोहों के आमंत्रण पत्रों पर लिखा रहता है कि पधारिये और गरिमा बढ़ाइये। पर इसका साफ अर्थ होता है कि आइये भीड़ बढ़ाइये और करतल ध्वनि में योगदान दीजिये। भीड़ भी इसलिए इकट्ठी की जाती है ताकि उस आधार पर अनुदान की अधिक राशि जुगाड़ी जा सके।‘‘ पत्नी ने इतना बोलने के बाद भी लम्बी साँस नहीं ली और मेरी अगली बालिंग पर छक्का मारने के अंदाज में मेरे उद्गारों की प्रतीक्षा करने लगी।
’’ अरे भाई मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सभी एक दूसरे के काम आते हैं। आज मैं जिनके लिए जाता हूं कल वे मेरे अनुदान याचिका में वातावरण बनाने में सहयोगी होंगे इसी आशा में..........‘‘
’’ इसका मतलब सब एक दूसरे को मूर्ख बना रहे हैं‘‘ पत्नी ने मेरे वाक्य को अपनी तरह से पूरा किया।
’’ तुम्हें तो मेरी हर बात बुरी लगती है‘‘ मैंने खीझ कर कहा।
’’ हर बात नहीं, हर गलत बात........ और तुम कभी ठीक बात कहते भी नहीं हो।‘‘
’’ हाँ मैं तो पूरी तरह गलत हूं। एक ठीक तो केवल तुम ही हो।‘‘ इतना कह कर मैंने पत्नी की तरफ देखा तो पाया कि उसके आंसू बह रहे थे। एकदम से करुणा उमड़ती-उमड़ती रह गयी जब देखा कि वह प्याज काट रही थी और वे आंसू उसके कारण बह रहे थे।
’’ नहीं मैं भी गलत हूं‘‘ जब पत्नी ने यह कहा तो मुझे लगा कि उसे पश्चाताप हो रहा है। मैं भावुक होता उसके पहले ही वह बोली ’’तुम हमेशा समारोहों से खाली हाथ नहीं आते हो अपितु हमेशा ही तुम्हारे हाथों में कुछ होता है‘‘
’’क्या?‘‘ मैंने आश्चर्य से पूछा ही नहीं आश्चर्य हुआ भी।
’’ अगले किसी समारोह में गरिमा बढ़ाने का निमंत्रण पत्र‘‘ पत्नी ने कहा।
मैं अपने कमरे में लौट आया। लेख लिखने के लिए............।
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संपर्क:
वीरेन्द्र जैन
२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टॉकीज के पास भोपाल म.प्र.









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