सीमा सचदेव की कविता कथा - महलों की रानी
कविता-कथा
1.महलों की रानी
सीमा सचदेव
एक कहानी बड़ी पुरानी
आज सुनो सब मेरी जुबानी
विशाल सिन्धु का पानी गहरा
टापू एक वहाँ पर ठहरा
छोटा सा टापू था प्यारा
कुदरत का अदभुत सा नजारा
स्वर्ग से सुन्दर उस टापू पर
मछलियाँ आ कर बैठती अकसर
धूप मे अपनी देह गर्माने
टाप पे बैठती इसी बहाने
उस पर इक जादू का महल था
जिसका किसी को नहीं पता था
चाँद की चाँदनी में बाहर आता
और सुबह होते छुप जाता
उसको कोई भी देख न पाता
न ही किसी का उससे नाता
इक दिन इक भूली हुई मछली
रात को टापू की राह पे चल दी
सोचा रात वही पे बिताए
और सुबह होते घर जाए
देखा उसने अजब नजारा
चमक रहा था टापू सारा
सुन्दर सा इक महल था उस पर
फूल सा चाँद भी खिला था जिस पर
देख के उसको हुई हैरानी
पर मछली थी बड़ी सयानी
जाकर खड़ी हुई वह बाहर
पूछा ! बोलो कौन है अन्दर
क्यों तुम दिन मे छिप जाते हो?
नज़र किसी को नही आते हो?
अन्दर से आई आवाज़
खोला उसने महल का राज
रानी के बिन सूना ये महल
इसलिए रक्षा करता है जल
ढक लेता इसे दिन के उजाले
क्योंकि दुनिया के दिल काले
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मछली रानी बड़ी सयानी
समझ गई वो सारी कहानी
चली गई वो महल के अन्दर
अब न रहेगा महल भी खण्डहर
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मछली बन गई महल की रानी
अब न रक्षा करेगा पानी
महल को मिल गई उसकी रानी
खत्म हो गई मेरी कहानी
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संपर्क:
सीमा सचदेव(एम.ए.हिन्दी,म्.एड.,पी.जी.डी.सी.टी.टी.एस.,ज्ञानी)
७ए,३र क्रॉस,रामान्जन्या ले आऊट,
माराथली ,
बैंगलोर-५६००३७












2 टिप्पणियाँ.:
सुन्दर रचना
सर जी कविता बहुत अच्छी लगी। खासकर इस लाइन "मछली रानी बड़ी सयानी" बचपन की याद दिला दी जब हम अपने दोस्तों के साथ हाथों पे ताली देकर इस गाते थे।
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