February 26, 2008

दिव्य प्रकाश दुबे का सस्वर, जीवंत कविता पाठ : आज अचानक फिर से वो टकरा गए

हम सभी कभी न कभी डायरी लिखते हैं या कोशिश करते हैं कुछ यादों को ,कुछ पन्नों में समेटने की ये कविता उसी कोशिश का एक हिस्सा भर है

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आज अचानक फिर से वो टकरा गए...

-दिव्य प्रकाश दुबे

 

आज अचानक फिर से वो डायरी में यूँ टकरा गये
हो पहली-पहली बार सब कुछ ऐसा किस्सा सुना गये

कोशिश तो की मैंने मगर पन्ना नहीं पलटा गया
ली वक्त ने करवट मगर हमसे नहीं पलटा गया

धुँधले हुये शब्दों ने फिर एक साफ मूरत जोड़ ली
सूखे हुये गुलाब ने एक पल में खुशबू मोड़ ली

लिखे हुये वादे सभी एक पल में जैसे खिल गये
छूटे हुये अरमान सब ख्वाबों से आके मिल गये

सब छोड़ के तुम पास थे
बाहों के अब विश्वास थे

आँखों ने फिर से सींच के तुमसे कही बातें वही
तुमने भी शरमा के फिर धीरे से है हामी भरी

अब वक्त जैसे है नहीं और बस तुम्हारा साथ है
अब स्वर्ग को जाना नहीं जो हाथ तेरा साथ है

फिर हाथ तेरा थामकर
खिड़की से बाहर झाँककर

हमने नयी दुनिया गढ़ी
जिसमें न कोई अंत था
पल-पल में जब वसन्त था
इतने में एक झोंका आया
मुझे एक पल को भरमाया

मैंने रोका पर रुका नहीं
पन्ना भी तो अब टिका नहीं

पन्ना पलटा और आँख खुली
पन्ना पलटा और आँख खुली

और दूरी का अहसास हुआ
दूरी का अह्सास हुआ......

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संपर्क:

दिव्य प्रकाश दुबे

dpd111@gmail.com

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