February 25, 2008

संजय सेन सागर की कविताएँ

कविताएँ



-संजय सेन सागर

मां तुम कहां हो


मां मुझे तेरा चेहरा याद आता है

वो तेरा सीने से लगाना,


आंचल में सुलाना याद आता है।

क्यों तुम मुझसे दूर गई,


किस बात पर तुम रूठी हो,

मैं तो झट से हंस देता था।


पर तुम तो

अब तक रूठी हो।


रोता है हर पल दिल मेरा,

तेरे खो जाने के बाद,


गिरते हैं हर लम्हा आंसू ,

तेरे सो जाने के बाद।


मां तेरी वो प्यारी सी लोरी ,

अब तक दिल में भीनी है।


इस दुनिया में न कुछ अपना,

सब पत्थर दिल बसते हैं,


एक तू ही सत्य की मूरत थी,

तू भी तो अब खोई है।


आ जाओ न अब सताओ,

दिल सहम सा जाता है,


अंधेरी सी रात में

मां तेरा चेहरा नजर आता है।


आ जाओ बस एक बार मां

अब ना तुम्हें सताउंगा,


चाहे निकले

जान मेरी अब ना तुम्हें रूलाउंगा।


आ जाओ ना मां तुम,

मेरा दम निकल सा जाता है।


हर लम्हा इसी तरह ,

मां मुझे तेरा चेहरा याद आता है।

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वो बूढ़ी सी अम्मा

गोरी से पीली

पीली से काली हो गई हैं अम्मा


इक दिन मैंने देखा

सचमुच बूढ़ी हो गई है अम्मा।


कुछ बादल बेटे ने लूटे

कुछ हरियाली बेटी ने


एक नदी थी

कहां खो गई रेती हो गई हैं अम्मा


देख लिया है सोना चांदी

जब से उसके बक्से में


तब से बेटों की नजरों

अच्छी हो गई हैं अम्मा।


कल तक अम्मा अम्मा कहते

फिरते थे जिसके पीछे


आज उन्हीं बच्चों के आगे

बच्ची हो गई है अम्मा।


घर के हर इक फर्द की आँखों में

दौलत का चश्मा हैं


सबको दिखता वक्त कीमती

सस्ती हो गई अम्मा।


बोझ समझते थे सब

भारी लगती थी लेकिन जब से


अपने सर का साया समझा

हल्की हो गई अम्मा।

---------------.

जरूरत तुम्हारी है

जम गयी है ओस गुलाब की पत्ती पर,

समां गई है तेरी याद इस दिल में ,


बिखरने लगे है यादों के पन्ने

तेरी प्यार की हवा से।


गिरने लगे है अश्क,

नम हो गई यादों की किताब,


सिसक रहा है हर लफ्ज ,जिसमें

समाई हैं ,जुदाई।


थम गया है सागर

खाने लगी है हवा कोने कोने से,


पत्थर हो गई है, साहिल की रेत

पानी से बिछड़कर।


सिमट-सा रहा है आसमां

बरस रहें है तारें तेजी से ज़मीं की ओर,


गले मिल रहे चांद और सूरज

एक लंबे अरसे के बाद।


बदल सकती है सारी कायनात,

मेरी इस नज्म की तरह ,


नहीं बदल सकता तो सिर्फ मेरा प्यार

जो है तुम्हारे लिए।


आ गया है प्यार का दिन ,

आ जाओ अब तुम भी ,


मेरी टूटती हर एक सांस को

जरूरत तुम्हारी है।

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संपर्क:

संजय सेन सागर

आदर्श नगर, मकरोनिया, चौराहा, सागर (म.प्र.)

दिनांक १२. ०२. २००८

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(चित्र - कृष्ण कुमार अजनबी की कलाकृति)

1 टिप्पणियाँ.:

shakshi said...

sanjay ji aapki jitni bhi poem maine padi hain sab behad mamsparshi hai,aap jab bhi likhte hain janha bhi likhte maa par jarur likhte hai ,aapki yahi baat mujhe bahut acchi laghti hai aap ishi tarah se likhte rahp main padta rahoonga!!

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