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January 9, 2008

रबीअ बहार के कुछ क़तात


-रबीअ बहार


कुछ क़तात

मजनू होना भी मुश्किल है लैला भी आसान नहीं है/
प्यार में दीवाने होते थे वह दौर-ए-जीशान नहीं है/

प्यार भी अब तो सोच समझकर साजिश जैसा होता है /
लफ्ज़ -ए-मुहब्बत के मानों में पहले जैसी जान नहीं है /



अंदाज़-ए-अदावत भी जुदा लगता है /
ज़हर भी इस तरह देते हैं दवा लगता है/

अब मुहब्बत भी सियासत की तरह होती है/
बेवफा यार भी अब जान-ए-वफ़ा लगता है/


शम्स को आइना दिखाता हूँ/
बर्फ की मूरतें बनाता हूँ /

इससे मेरा है खून का रिश्ता /
मैं ग़ज़ल को लहू पिलाता हूँ/


फिक्र छोड़ दे प्यारे होगा जो भी होना है /

आदमी अजल से ही वक़्त का खिलोना है /

दोलतें अमीरों की हैं इन्हीं से बावस्ता /

जिनकी आसमान चादर और ज़मीं बिछौना है /


प्यार जब कर गया असर चुपचाप /

हो गयी सब को फिर खबर चुपचाप /

आइनों में शुमार है अपना /

हम भी कहते हैं सच मगर चुपचाप /

एक भी राज़ दोस्तों पे न खोल /

ये लगा देंगे एक सिफर चुपचाप /


रंग -ओ- निकहत गुलाब जैसी है /

उस की मस्ती शराब जैसी है /

जी में आता है चूम लूं उस को /

वो मुक़द्दस किताब जैसी है /

3 टिप्पणियाँ.:

रवीन्द्र प्रभात said...

कतात बहुत बढिया है , पढ़कर अच्छा लगा !

मीत said...

अच्छी हैं भाई. शुक्रिया.

जेपी नारायण said...

इससे मेरा है खून का रिश्ता /
मैं ग़ज़ल को लहू पिलाता हूँ/

...वाह!
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूं,
वह गजल आपको सुनाता हूं।

लाइनें वाकई लाजवाब हैं।

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