रबीअ बहार के कुछ क़तात
-रबीअ बहार
कुछ क़तात
मजनू होना भी मुश्किल है लैला भी आसान नहीं है/
प्यार में दीवाने होते थे वह दौर-ए-जीशान नहीं है/
प्यार भी अब तो सोच समझकर साजिश जैसा होता है /
लफ्ज़ -ए-मुहब्बत के मानों में पहले जैसी जान नहीं है /
अंदाज़-ए-अदावत भी जुदा लगता है /
ज़हर भी इस तरह देते हैं दवा लगता है/
अब मुहब्बत भी सियासत की तरह होती है/
बेवफा यार भी अब जान-ए-वफ़ा लगता है/
शम्स को आइना दिखाता हूँ/
बर्फ की मूरतें बनाता हूँ /
इससे मेरा है खून का रिश्ता /
मैं ग़ज़ल को लहू पिलाता हूँ/
फिक्र छोड़ दे प्यारे होगा जो भी होना है /
आदमी अजल से ही वक़्त का खिलोना है /
दोलतें अमीरों की हैं इन्हीं से बावस्ता /
जिनकी आसमान चादर और ज़मीं बिछौना है /
प्यार जब कर गया असर चुपचाप /
हो गयी सब को फिर खबर चुपचाप /
आइनों में शुमार है अपना /
हम भी कहते हैं सच मगर चुपचाप /
एक भी राज़ दोस्तों पे न खोल /
ये लगा देंगे एक सिफर चुपचाप /
रंग -ओ- निकहत गुलाब जैसी है /
उस की मस्ती शराब जैसी है /
जी में आता है चूम लूं उस को /
वो मुक़द्दस किताब जैसी है /












3 टिप्पणियाँ.:
कतात बहुत बढिया है , पढ़कर अच्छा लगा !
अच्छी हैं भाई. शुक्रिया.
इससे मेरा है खून का रिश्ता /
मैं ग़ज़ल को लहू पिलाता हूँ/
...वाह!
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूं,
वह गजल आपको सुनाता हूं।
लाइनें वाकई लाजवाब हैं।
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