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January 26, 2008

असग़र वजाहत का उपन्यास : गरजत बरसत (किश्त 3)

उपन्यास

 

गरजत बरसत

----उपन्यास त्रयी का दूसरा भाग---- -

-असग़र वजाहत

पहला खण्ड

(पिछली किश्त  से आगे पढ़ें...)

 

..

मैं सिगरेट खरीदकर मुड़ा ही था कि मोहसिन टेढ़े के दीदार हो गये। दिल्ली की बाज़ार में कोई पुराना मिल जाये तो क्या कहने। मोहसिन टेढ़े ने भी मुझे देख लिया था और उसके चेहरे पर फुलझड़ियां छुट रही थीं।

यार तुम कहां रहते हो. . .कसम खुदा की बड़ा गुस्सा आता है तुम्हारे ऊपर।” मोहसिन आकर लिपट गया। सुना तो था. . .जैद़ी कह रहा था कि तुम दिल्ली ही में हो और 'नेशन` में हो. . .

“तुम सुनाओ यार मोहसिन क्या हाल है?”

“सब फस्ट क्लास है।”

“क्या कर रहे हो?”

वह हंसने लगा। ऐसी हंसी जिसमें शर्मिन्दगी भी शामिल थी।

“यार मैं सुबह यहीं कनाट प्लेस आ जाता हूं। 'बंकुरा` में लंच लेता हूं. . .एक चक्कर सर्किल का लगाता हूं. . .फिर अमरीकन लायब्रेरी में बैठ जाता हूं. . .शाम को मैक्समुलर भवन में कोई फिल्म देख लेता हूं. . रात दो रुपये वाली टैक्सी पकड़ कर आर.के.पुरम चला जात हूं।” वह फिर शर्मिन्दगी मिश्रित हंसी हंसने लगा।

मुझे यह सब सुनकर हैरत नहीं हुई। मोहसिन टेढ़े के बारे में हम सबको हॉस्टल के दिनों से पता था कि वह अच्छे खासे खाते-पीते जमींदार खानदान से ताल्लुक रखता है।

मैं हॉस्टल के कमरा नंबर तेईस में था और मोहसिन टेढ़े चौबीस में था। मुझसे एक साल जूनियर होने की वजह से पहले तो डरा-डरा रहा करता था फिर दोस्ती-सी हो गयी थी और अक्सर शामें 'कैफे डी फूस` या 'अमीरनिशां` में साथ-साथ गुजार लेते थे। बचपन में उसे पोलियो का कुछ असर हो गया जिसकी वजह से टाँगों मे कुछ टेढ़ापन आ गया था।

लेकिन उसका नाम मोहसिन टेढ़े सिर्फ टांगों के टेढ़ेपन की वजह से पड़ जाता तो बहुत मामूली बात होती। उसमें और कई तरह के टेढ़ेप़न थे और शायद अब भी होंगे। पहला टेढ़ापन तो यह नजर आया कि उसने प्रीयूनिवर्सिटी क्लास तीन बार पास की। हर बार 'कम्बीनेशन` बदल जाता था। पहले साल फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बाटनी से की, पास हो गया। लेकिन अगले साल सब्जेक्ट बदल कर प्रीयूनिवर्सिटी क्लास का इम्तिहान दिया। तीसरे साल भी यही किया। हम लोग उसे प्रीयूनिवर्सिटी मास्टर कहने लगे थे और उसका ये रिकार्ड बन गया कि जितनी बार उसने प्रीयूनिवर्सिटी पास की है उतनी बार किसी और ने नहीं की हैं।

मोहसिन टेढ़े ग़ज़ब का कंजूस था और कभी-कभी खूब पैसा उड़ाता था। उसे अपने ही रिश्तेदारों की एक लड़की से इश्क हो गया था। लड़की बहुत समझदार थी। मोहसिन टेढ़े को इश्क आगे बढ़ाने की सलाहें पूरा हॉस्टल दिया करता था। एक बार सभी लड़कों ने तय किया कि मोहसिन टेढ़े को चाहिए कुछ महंगे किस्म के परफ्यूम लड़की को तोहफ़े में पेश करे। मोहसिन टेढ़े परफ्यूम खरीद दिल्ली चला गया था और कोई तीन-चार सौ के परफ्यूम ले आया था। ये लड़की को पेश किए गये थे जिसने इन्हें कुबूल कर लिया था। उसके बाद हॉस्टल ने राय दी थी कि अब मोहसिन टेढ़े को चाहिए कि लड़की को फिल्म दिखाने ले जाये और सिनेमा देखने के दौरान से उसे शादी का प्रस्ताव रख दे। मोहसिन टेढ़े ने यही किया था लेकिन लड़की ने न सिर्फ इंकार किया था बल्कि उस पर नाराज़ भी हुई थी और उठकर चली गयी थी। इस पर हॉस्टल की राय बनी थी कि मोहसिन टेढ़े कम से कम अपने परफ्यूम तो वापस ले आयें। मोहसिन टेढ़े ने ऐसा ही किया था। परफ्यूम वापस लेकर वह हॉस्टल आया था तो उदास था। इश्क में नाकाम लोग शराब पीते हैं। यह सोचकर हॉस्टल ने मोहसिन टेढ़े को हॉस्टल ने शराब पीने की राय दी थी। शराब ने नशे में उसे पता नहीं क्या सूझी थी कि उसने परफ्यूम की दोनों बोतलें हॉस्टल के हर लड़के पर 'स्प्रे` कर दी थीं। और फिर खाली बोतलों को बरामदे में तोड़ डाला था।

मोहसिन टेढ़े ने तीन बार प्री यूनिवर्सिटी करने के बाद इंजीनियरिंग

में डिप्लोमा कर लिया था। लेकिन ये तय था कि वह वैसी नौकरी नहीं करेगा जो डिप्लोमा करने के बाद मिलती है। क्योंकि ज़मीन जायदाद आम और लीची के बागों से उसे हज़ारों रुपये महीने की आमदनी होती थी और वह अकेला है। वालिद का इंतिकाल हो गया और उसकी मां उसे अलीगढ़ इतना पैसा भेजा करती थीं कि उससे पांच लोग पढ़ लेते।

'तो मतलब वही कर रहे हो अलीगढ़ में किया करते थे।` मैंने कहा।

'नहीं यार . . . मैं सोचता हूं सीरियसली फ्रेंच पढ़ डालूं?` वह बोला।

'क्यों क्या यहां फ्रेंच की क्लास में लड़कियां काफी आती है।` मैंने सादगी से पूछा।

वह हंसने लगा, 'हां यार बात तो यही है।`

'ये बताओ, रहते कहां हो?`

'मस्जिद में`, वह हंसकर बोला।

फिर वही टेढ़ापन. . .'अबे मस्जिद में कौन रहता है।`

'यार कसम खुदा की. . .आर.के. पुरम की मस्जिद में रहता हूं।` वह हंसने लगा। 'बड़े सस्ते में कमरा मिला है। वो लोग मुसलमान को ही कमरा देते हैं। बीस रुपये किराया देता हूं. . .पर एक बात है यार।`

'क्या?`

'मस्जिद में दो ग्रुप हैं। दोनों में मुकद्दमा चल रहा है। मौलवी अफ़ताब जिन्होंने मुझे कमरा दिया है, उन्होंने गवाही देने का वायदा भी ले लिया है।`

'तो फंसोगे झंझट में. . .`

'यार मौका आयेगा तो कमरा छोड़ दूंगा।` वह हंसकर बोला।

मैं उसकी समझदारी पर हैरान रह गया लेकिन उसके लिए इस तरह सोचना नया नहीं है। वह ऐसा ही करता आया है।

'चलो कमरे चलो. . .वहीं बैठकर बातें करते हैं`

'यार बसों में इस वक्त बड़ी भीड़ होगी?`

'स्कूटर से चलते हैं।` मैंने कहा।

यार किराया तुम ही देना. . .आज मेरे पास पैसे नहीं हैं।` उसने लाचारी से कहा।

'हां. . .हां ठीक है. . .पैसे मैं ही दूंगा।` मुझे यह अच्छी तरह मालूम है बल्कि यकीन है कि पैसे उसके पास हैं। लेकिन वह अपने पैसे बचाना चाहता है। पता नहीं क्यों उसे यह गहरा एहसास है कि पूरी दुनिया उसके पैसे लूटने के चक्कर में है। और पैसों को किसी भी तरह बचाकर रखना उसकी जिम्मेदारी है। मुझे याद आया एक बार हॉस्टल में पता नहीं कैसे किसी लड़के ने उसके पांच रुपये उधर ले लिए थे और नहीं दे रहा था। मोहसिन टेढ़े ने अपने पांच रुपये वसूल करने के लिए ज़मीन आसमान एक कर दिया था। वार्डेन से शिकायत की थी। सीनियर लड़कों के सामने रोया-गाया था और आखिरकार इस पर भी तैयार हो गया था कि लड़का एक रुपये महीने के हिसाब से पांच रुपये वापस कर देगा।

'तो ये है तुम्हारा घर?`

हां सदर दरवाज़ा. . .कभी बंद नहीं होता। ताला लगा ही रहता है लेकिन पूरा का पूरा दरवाज़ा चौखट समेत अलग हो जाता है। इधर बाथरूम और किचन है। मेरे पीछे पता नहीं कौन-कौन बाथरूम का इस्तेमाल कर जाता है। किचन में स्टोव और चाय का सामान है।

'चाय पियोगे?`

'हां बनाओ।`

'दूध नहीं है।`

'अरे तो फिर चाय में क्या मज़ा आयेगा।`

'पड़ोसी से मांग लाऊं?`

मैं उठने ही वाला था कि बशीर एक ट्रे में दो कप चाय लेकर आ गया।

'अरे तुम चाय ले आये?`

'आपा ने भेजी है।` बशीर चाय देकर चला गया तो मोहसिन टेढ़े ने अजीब टेढ़ी निगाहों से मेरी तरफ देखा।

'क्या मामला है साजिद।`

'यार पड़ोस में इकराम साहब रहते हैं, ये उनका लड़का है

बशीर. . . ।`

'आपा के बारे में बताओ यार।`, वह हंसा।

'यार इकराम साहब की लड़की है। पता नहीं ये लोग कैसे हैं। एक दिन इकराम साहब आये. . .कोई जान न पहचान. . .सौ रुपये उधार ले गये. . .ये लड़का आता रहता है. . .जब मैं घर में नहीं होता तो आपा आकर कपड़े धो जाती है।`

'ठाठ हैं तुम्हारे।`

'यार ठाठ तो नहीं हैं. . .मैं तो कुछ घबरा रहा हूं।`

'आपा हैं कैसी?`

'आज तक देखा नहीं।`

'क्यों झूठ बोलते हो।`

'नहीं यार. . .झूठ क्यों बोलूंगा।`

शाम होते-होते तय पाया कि जामा मस्जिद के इलाके में चलकर खाना खाया जायेगा। प्रोग्राम तय होने के बाद मोहसिन हिसाब-किताब तय करने लगा। उसने कहा कि स्कूटर का किराया तो वह दे नहीं सकता। खाने का बिल शेयर करेगा लेकिन जो वह खायेगी उसी का पेमेण्ट करेगा। मैं अपना पेमेण्ट खुद करूं। मैंने हंसकर कहा, चलो ठीक है। खाने का पेमेण्ट मैं ही कर दूंगा। इस पर वह बोला कि हां तुम्हें 'द नेशन` में नौकरी मिली चलो उसी को 'सेलीब्रेट` करते हैं।

खाने के दौरान वह बताता रहा कि उसके बहनोई की निगाह उसकी जायदाद पर है। सब उसे लूट खाना चाहते हैं। लेकिन उसने यह तय कर किया है कि धीरे-धीरे पूरी जायदाद बेचकर पैसा खड़ा कर लेगा और दिल्ली शिफ्ट हो जायेगा। मैं उसकी हां में हां मिलाता। सोचा मुझ पर क्या फर्क पड़ता है। जो चाहे करे।

----९----

उसके चेहरे से जवानी के अल्हड़ दिनों की छाया हट गयी है लेकिन आकर्षण में कोई कमी नहीं आयी है। बाल कुछ बढ़ा लिए हैं और लंदन में रहने की वजह से रंग कुछ ज्य़ादा साफ हो गया है लेकिन दिल वैसा ही है। मिज़ाज वैसा ही है। वह कल ही रात आया है, अकबर होटल में ठहरा है। सुबह-सुबह टैक्सी लेकर मेरे कमरे पहुंच गया था मुझे यहां पकड़ लाया है। कहता है दफ्तर से आज छुट्टी ले लो। चलो दिनभर दिल्ली में मौज करते हैं। करीम में खाना खाते हैं। कनाट प्लेस में टहलते हैं। किसी सिनेमा हाल में बैठ जायेंगे। शाम को किसी बार में खूब पियेंगे और रात में चलेंगे मोती महल। कल राजी आ रही है इसलिए मैं 'बिजी` हो जाऊंगा।

“ले ये देखो तुम्हारे लिए लाया हूं।” उसने एक पैकेट मेरी तरफ उछाल दिया। दो कमीजें, इलेक्ट्रिक शेवर, दो टाइयां, चाकलेट. . .

“सुनो यार साले शकील को फोन करके बुला लेते हैं. . .मज़ा आयेगा. . .हम एक दिन के लिए अलीगढ़ भी जा सकते हैं. . .पांच साल हो गये यार. . .अलीगढ़ छोड़े”, अहमद बोला।

“लो फोन करो”, मैंने शकील का नंबर दिया। वह फोन मिलाने के लिए आपरेटर से बात करने लगा।

फोन मिला और लाइन पर शकील आया तो वह चिल्लाया “अबे साले चूतिया क्या कर रहा है. . .मैं. . .मैं कौन हूं. .. अब मैं तेरा बाप हूं अहमद. . .कल ही लंदन से आया हूं. . .साजिद के साथ बैठा हूं . . .तुम बेटा ये करो कि आज रात की गाड़ी पकड़ो और सीधे दिल्ली आ जाओ. . .मीटिंग? अब ऐसी मीटिंगे बहुत हुआ करती हैं. . .जानता हूं साले तुम नेता हो गये हो. . .न आये तो अच्छा न होगा. . .समझो।”

अहमद की वही आदतें हैं पैसा इस तरह ख़र्च करता है जैसे पानी बहा रहा हो। जो प्रोग्राम बना लेता है वह किसी भी तरह पूरा ही होना चाहिए। शाम जब उसे चढ़ गयी तो बताने लगा कि वह इन्दरानी को तलाक दे रहा है। मैं सकते में आ गया। लेकिन 'क्यों` पूछने पर उसने बताया कि वह राजी रतना से प्यार करने लगा है। हो सकता है कि यह बात मेरी समझ में इसलिए न आई हो कि मैं पूरी प्रक्रिया से परिचित नहीं था। मुझे यह पता था कि आठ साल पहले मैं उसकी शादी में कलकत्ता गया था जहां इन्दरानी से उसने ब्रह्मसमाज के अनुसार शादी की थी। मंत्र अंग्रेज़ी में पढ़े गये थे। उसके बाद लखनऊ में निकाह हुआ था। दिल्ली में सिविल मैरिज हुई थी। वह इन्दरानी पर जान दिया करता था। बीच में कोई दो साल पहले वह राजी रतना को लेकर केसरियापुर आया था तो मैं यही समझा था, मौज मस्ती मार रहा है। लेकिन यह तो सोच भी न सकता था कि इन्दरानी को, जिसने अपने चाचा के माध्यम से उसके लिए विदेश मंत्रालय में नौकरी दिलाई है, उसे इतनी आसानी से 'टाटा` कर देगा।

“लेकिन हुआ क्या?”

“होना क्या था यार राजी के बिना मैं नहीं रह सकता। मैंने यह बात साफ इन्दरानी को बता दी. . .पहले तो वह बोली यह 'फैचुएशन` है। पर साल भर बाद समझ गयी कि मैं उसके साथ नहीं रहूंगा. . .मैंने उसके साथ 'सोना` बंद कर दिया था।”

“उसने तुम्हें नौकरी. . .वह भी भारत सरकार के विदेश. .”

“यार नौकरी कोई न कोई किसी न किसी को दिलाता ही है। इसका मतलब ग़ुलामी तो नहीं होता।”

“हां ये तो ठीक है. . .लेकिन. . .।”

“लेकिन क्या?”

“तुम्हारे बेटे का क्या होगा।”

“ओ. . .प्रिंस चार्ल्स. . .हम लोग उसे प्रिंस चार्ल्स कहते हैं. . .वह हॉस्टल में चला जायेगा. . .यहां शिमला में बड़े अच्छे बोर्डिंग हैं वहां पढ़ेगा”, वह हंसकर बोला।

“तुमने राजा साहब से बात कर ली है।”

“अब्बा जान से. . .हां. . .क्यों नहीं. .कहते हैं इट्स योर लाइफ़. . .जो ठीक समझते हो करो. . .उन्होंने खुद चार शादियां की थी यार. . .और पता नहीं कितने 'अफेयर्स`।” वह हंसकर बोला।

कुछ देर हम ख़ामोश रहे। मेरी ये समझ में नहीं आ रहा था कि वह जो कुछ करने जा रहा है, सही है या ग़लत।

“यार अहमद कु छ समझ में नहीं आ रहा है।”

“समझने की कोशिश ही क्यों करते हो? लो और पियो”, वह हंसकर बोला।

मैं पीने लगा। उसने सिगरेट सुलगा ली और पूछा- “तुम्हारा क्या चल रहा है?”

“यार ऑफिस में एक लड़की है।”

“अरे बेटे. . .मैंने ये तो नहीं पूछा था कि ऑफिस में कोई लड़की है या नहीं है. . .कुछ चल रहा है?” वह जोर देकर बोला।

“कहने की हिम्मत नहीं पड़ती।”

“अबे तेरा वही हाल है. . .फौज़ी से कहने में तूने एक सदी लगा दी थी।”

“हां यार”, मैं उदास हो गया।

“उसे खाने पर बुलाया?”

“खाने पर?”

“हां. . .भेजा खाने पर नहीं, खाना खाने पर।”

“नहीं यार. . .”

“तुम मुझको मिलवा दो उससे।”

“बिल्कुल नहीं। हरगिज़ नहीं. . .कभी नहीं।” मैंने कहा और वह हंसने लगा- “शेर को भेड़ से मिलवा दूं?”

सुबह अहमद के कमरे के दरवाज़े की 'कालबेल` बजी तो मैंने उठकर दरवाजा खोला। सामने शकील खड़ा है। चेहरे पर प्यारी-सी मुस्कुराहट के अलावा सब कुछ बदला हुआ था। हम दोनों गले मिले।

अहमद ने बाथरूम से निकलकर शकील को देखा तो जोर का नारा मारा ये मारा पापड़ वाले को` और दौड़कर लिपट गया।

'पर बेटा तुमने ये अपनी हुलिया क्या बना रखी है। पूरे नेता लगते हो।` अहमद ने पूछा।

शकील सफेद रॉ सिल्क का शानदार कुर्ता और खड़खड़ाता हुआ खादी का पजामा पहने था। एक हल्के कत्थई रंग की बास्कट की जेब में महंगा कलम, डायरी साफ नज़र आ रहे थे। एक हाथ में वी.आई.पी. का सूटकेस था। ओमेगा घड़ी बंधी थी। आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा था। एक हाथ में पान पराग का डिब्बा दबा था। चेहरा कुछ भर गया था और खास बात ये कि एक अच्छी तरह कटी-कटाई फ्रेंचकट दाढ़ी नमूदार हो गयी थी।

'ये तो यार. . .जानते हो न जिला की युवा कांग्रेस का अध्यक्ष हो गया हूं।` वह कुछ मज़ाक में कुछ गंभीरता से बोला।

'अबे साले तो उसके लिए नयी हुलिया बना ली है।`

'यार तुम लोग समझते नहीं। इसी हुलिये से तो वहां रोब पड़ता है, शहर में लोग सलाम करते हैं। अफसर इज्जत करते हैं. . .चार काम निकलते हैं।`

'सुना साले तुमने शादी कर ली और हम लोगों को बुलाया भी नहीं।` अहमद ने कहा।

'यार बस बड़ी हबड़-तबड़ में हो गयी। घर वाले चाहते नहीं थे कि हाजी करामत अंसारी के यहां मेरी शादी हो।`

'क्यों?`

'यार तुम लोग तो जानते ही हो. . .मेरे भाई और अब्बा ने मुझे जायदाद में हिस्सा देने और दुकान की आमदनी से बाहर कर दिया था। दो सौ रुपये महीने दे देते थे और पड़ा सड़ रहा था तो राजनीति में आ गया। कुछ दबने लगे। उसके बाद मैंने खुद भी हाजी करामत अंसारी के यहां बातचीत चलवाई. . .हाजी साहब इलाके के बाअसर आदमी हैं मेरे वालिद को लगा कि अगर मेरी वहां शादी हो जाती तो किसी तरह मुझे दबा न सकेंगे. . .वो लोग तो बरात में गये भी नहीं थे।`

'खैर अब सुनाओ कैसी कट रही है`, अहमद ने पूछा।

'मस्ती है।`

'करते क्या हो?`

'यार नेता हूं. . .वही करता हूं जो नेता करते हैं।` वह मज़ाक में बोला।

'मतलब?`

'नेपाल से लकड़ी मंगवाता हूं. . .`

'और लकड़ी के साथ-साथ लड़की ?` मैंने पूछा।

शकील हंसने लगा।

अहमद ओमेगा घड़ी देखकर बोला, 'लगता है पैसा तो पीट रहे हो।`

'नहीं यार ये घड़ी तो शादी में मिली थी।`

'बीबी कैसी है?`

'बस यार जैसी होती हैं।`

'तो बेटा तुमने उसी तरह शादी की है जैसे अकबर द ग्रेट ने की थी।` अहमद ने कहा और हम सब हंसने लगे।

अकबर होटल में नाश्ता करने के बाद कनाट प्लेस आ गये। इन दोनों में अपनी-अपनी प्रेमिकाओं या पत्नियों के लिए कुछ खरीदना था। चाय वाय पीते शकील से बातें होती रहीं. . .ज़मीन खरीदकर डाल दी है. . .सोचा है कभी कॉलोनी कटवा दूंगा. . .बगै़र पॉलीटिक्स के पैसा नहीं आता और बिना पैसे के पॉलीटिक्स नहीं होती. . .एम.पी. का टिकट चाहिए तो चार एम.एल.ए. के उम्मीदवारों को पैसा देना है. . .पार्टी जो देती है, नहीं देती है उससे कोई मतलब नहीं है. . .अपना एक सर्किल तो बनाना ही पड़ता है. . .जिसमें सभी होते हैं. . .दाढ़ी न रखूं तो लोग मुसलमान नहीं मानेंगे. . .मुसलमान न माना तो गयी पॉलीटिक्स. . .अब तो ये है कि कितने वोट हैं आपके पास? मैंने शहर ही नहीं ज़िले की मस्जिदों का एक 'नेटवर्क` बना दिया है. . .मदरसे उन्हीं में शामिल हैं।

“तो मतलब तुम्हारे ऐश हैं।”

“पीते-पिलाते हो कि छोड़ दी।”

“यार अब बड़ा डर हो गया है।”

“अबे यहां दिल्ली में कौन देखेगा।”

“हां दिल्ली की बात तो ठीक है. . .है क्या शाम का प्रोग्राम?”

“अबे यहां तो रोज़ ही होता है. . .आज तुझे नहला देंगे”, अहमद ने कहा।

रतजगा रही। रात भर पीना-पिलाना और गप्प-शप्प चलती रही। अहमद लंदन की कहानियां सुनाता रहा। शकील ने कहा कि अगली गर्मियों में लंदन ज़रूर जायेगा।

“ये तो साला 'नक्सलाइट` हो गया है”, अहमद ने शकील को मेरे बारे में बताया।

“यार तुम भी साजिद. . .”हे वही के वही”, शकील ने दुख भरे लहजे में कहा।

“क्यों बे? इसमें क्या बुरी बात है”, मुझे गुस्सा आ गया।

“यार गुस्सा न करो. .. इस तरह की पॉलीटिक्स इंडिया में कभी चलेगी नहीं”, वह बोला।

“क्यों?”

“देख लेना. . .तुम लोग किताबें पढ़ते हो. . .मैं ज़िंदगी देखता हूं समझे?”

“बड़े काबिल हो गये हो सालेर, अहमद ने कहा।

“देखो, एक बात सुन लो. . .हम लोगों की छोड़कर कोई पार्टी, कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जो गऱीब को गऱीबी से आज़ाद करना चाहती है। अगर कुछ पार्टियों की ऐसी इच्छा भी है तो उनके पास कोई प्रोग्राम नहीं है, रणनीति नहीं है. . .हम लोग मानते हैं कि राजसत्ता का जन्म बंदूक की नोक से होता है. . .गरीब आदमी के पास ताकत आयेगी तो सत्ता आयेगी. . .सत्ता आयेगी तो उसका भला होगा. .. र, मैंने कहा।

“अरे गरीब अपना भला करना चाहें तब तो कोई आगे आये न? हमारे गरीब तो गरीबी में ही खुश हैं।”

“ये चालाक सत्ताधरियों का प्रोपगेण्डा है. . .समझे? कौन चाहता है भूखा मरना है? किसे पंसद आयेगा कि दवा और इलाज के

अभाव में मर जायेगा? कौन अपने बच्चों को पढ़वाना नहीं चाहता?

“लेकिन यार तुम जंगलों में 'आर्म्स स्ट्रगल` करने न चला जाना”, अहमद बोला।

“वक्त आयेगा तो वह भी करना पड़ेगा. . .बात सिर्फ इतनी है कि मैं इस 'सिस्टम` से नफ़रत करता हूं और किसी भी क़ीमत पर इसको बदलना चाहता हूं. . .किसी भी क़ीमत पर, चाहे उसमें मेरी जान ही क्यों न चली जाये।”

“यार हो गये हो बड़े पक्के”, अहमद बोला।

“चलो यार मान लिया जो कह रहे हो सच है. . .हम कांग्रेसी किसी से बहस नहीं करते।” शकील बोला।

“हां तुम लोग तो लोकतंत्र के जोड़-तोड़ में माहिर हो गये हो . . .बहस क्यों करोगे”, मैंने कहा।

रात में तीन बजे हम दोनों भी अहमद के कमरे में ही पसर गये। इतनी रात गये कौन कहां जाता?

साढ़े नौ बजे काफी हाउस से लोग उठने लगते हैं लेकिन हमारी मण्डली जमी रहती है। लगता है कि करने के लिए इतनी बातें हैं कि समय हमसे मात खा जायेगा। दस बजे जब काफी हाउस के बैरे हम लोगों से तंग आकर बत्तियां बुझाने लगते हैं तो हम उठते हैं और मोहन सिंह प्लेस में ही पंडित जी के कैफे में बैठ जाते हैं। यहां ग्यारह बजे तक बैठ सकते हैं। उसके बाद पंडित को जम्हाइयां आने लगती हैं और छोटू तो खड़े-खड़े सोने लगता है। इस दोनों पर हम में से किसी को तरस आता है और हम उठ जाते हैं। बाहर सड़क की दूसरी तरफ वाला ढ़ाबा बारह बजे तक खुलता है। एक-आद चाय वहां पीने के बाद अपनी-अपनी तरफ जाने वाली आखिरी बसों के लिए डबल मार्च शुरू हो जाती है जो कभी-कभी दौड़ने जैसी भी लगने लगती है।

रावत को रीगल के स्टाप पर छोड़कर मैं अपने स्टाप की तरफ जाने लगा तो रावत ने कहा, “यार साजिद तुम मेरे घर चलो. . .आराम से बातें करेंगे।”

बली सिंह रावत हमारे ग्रुप में नया है। अभी छ: सात महीने ही बंबई से आया है। वह नैनीताल से शाह जी का पत्र नवीन जोशी के नाम लाया था। नवीन ने उससे मेरा परिचय कराते हुए कहा था, “तुम दोनों एक ही संस्था में काम करते हो रावत 'दैनिक राष्ट्र` में सब-एडीटर हैं।”

इसके बाद ऑफिस में जब कभी मौका मिलता हम लोग साथ-साथ कैंटीन में लंच करने लगे। रावत ने खुद ही बताया था कि उसका ताल्लुक भोटिया जन-जाति से है जो भारत और तिब्बत की सीमा पर रहती है। किसी ज़माने में ये लोग तिब्बत के साथ व्यापार करते थे लेकिन अब वह बंद हो गया है और मोटिया जानवर पालकर गुजर-बसर करते हैं। उसने बताया था कि वह अपनी बिरादरी का पहला आदमी है जिसने बी.ए. पास किया है और इतनी बड़ी नौकरी यानी बंबई में 'दैनिक राष्ट्र` की प्रूफरीडरी की है। वह इन बातों पर हँसता था। उसके अंदर शर्म, ग्लानि या अपमानित महसूस होने का भाव नहीं होता था। कहता था जब मेरी मां ने कहा कि मेरी शादी करना चाहती है तो बिरादरी ने शादी लायक सभी लड़कियों को उसके सामने खड़ा कर दिया था और कहा था जिसे चाहो चुन लो। उसे यह बताते हुए संकोच नहीं होता था कि वह मेहनत मजदूरी करके पढ़ा है। शाह लोगों के छोटे-मोटे काम किए हैं। बंबई में ठेला खींचा है।

मैं उसके साथ उसके घर पहुंचा तो बारह बज चुके थे। उसकी पत्नी ने दरवाज़ा खोला। उसे देखकर लगा कि वह सो रही थी। रावत ने उससे मेरा परिचय कराया और कहा कि खाना पकाओ, ये हमारे साथ खाना खायेंगे। मेरे बहुत मना करने के बाद भी रावत इस बात पर अड़ा रहा और कमरे से जुडे किचन में उसकी पत्नी को खाना पकाने में जुट जाना पड़ा।

हम हाथ मुंह धोकर बैठे तो रावत बोला, “देखो मैं जो कुछ हो गया उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था. . .ये बात तो मैंने कभी सोची ही नहीं थी कि मैं 'दैनिक राष्ट्र` में उप-संपादक हो जाऊंगा और अब मैं. . .” वह रुका, फिर बोला, “जानते ही हो मैं फिल्म समीक्षक हूं। कला पर लिखता हूं। मैं तो नहीं कहता कि मेरा लिखा 'ग्रेट` है लेकिन

किसी से कम भी नहीं है।”

मैंने इधर-उधर देखा। एक बड़ा-सा कमरा, पीछे बरामदा। कमरे के एक कोने पर बड़े से बेड पर उसके दो बच्चे सो रहे हैं। दूसरे कोने पर लिखने की मेज के साथ एक तख्त़ रखा है जिस पर शायद वह सोता है। दीवारों पर कैलेण्डर और कुछ कलात्मक फिल्मों के पोस्टर लगे हैं।

“मैं आज जो भी हूं अपनी मां की वजह से हूं। तुम उसे देख लो ये कह ही नहीं सकती कि इस बेपढ़ी लिखी, बिल्कुल गांव वाली महिला में इतनी ताकत होगी। उसके अंदर अपार शक्ति है। अब भी वह दिन में दस मील पैदल चल लेती है। यार वहां कि जिंदगी ही ऐसी है। इतनी कठोर, इतनी निर्मम, इतनी संघर्षशील कि आदमी मेहनत किए बिना रह ही नहीं सकता. . .ये बताओ खाने से पहले कुछ पियोगे? मेरे पास मिलिट्री की रम पड़ी है।”

“नेकी और पूछ पूछ”, मैंने कहा।

वह रम की बोतल और गिलास लेकर आया। पत्नी से पानी मंगवाया और कुछ नमकीन बना देने की भी फरमाइश कर दी। हम पीने लगे। धीरे-धीरे कमरे का नाक नक्शा बदलने लगा। रावत बिना पिए ही काफी भावुक ढंग से बोलता है। नशे के बाद उसकी भावुकता और नाटकीय और बढ़ गयी थी। वह हर तरह भंगिमा से अपनी बात प्रमाणिक सि----कर रहा था।

“आज भी तुम वह घर जहां मां रहती है देख लो तो अचंभे में पड़ जाओगे. . .समझ लो इससे थोड़ा बड़ा कमरा. . .कमरा भी क्या है. .कुछ पत्थर लगाकर दीवारें बनी हैं। पिछली दीवार पहाड़ है। लकड़ी के टुकड़े लगाकर दरवाज़ा बंद होता है। इसी में मेरी मां और पच्चीस तीस मेडे रहती हैं।”

“तुम्हारे वालिद गुज़र गये हैं?” मैंने पूछा।

“हां उसे भेड़िये खा गये थे. . .भेड़िये. . .वह इतने जीवट का आदमी था कि जंगली रीछ से लड़ जाता था। एक बार उसने अपने भाले से जंगली रीछ का सामना किया था. . .मां बताती है कि रीछ भाग गया था।”

वह बोल रहा था। उसकी बातों में सच्चाई का ताप था। मुझे लगा रावत अब भी कई मायनों में वही है। उसी इलाके का रहने वाला, सीधा-साधा आदमी जो शहरी हलचल के छल-कपट से दूर है। हमारी शब्दावली में उसे सीध कहा जायेगा जिसके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं।

मैं पांच साल का था। मुझ सब याद है। मेरे पिता ने जानवरों के लिए एक बाड़ा बनाया था। रात का समय था। अचानक बाड़ा टूटने की आवाज से पिताजी जाग गये। उन्होंने मां से कहा कि लगता है भेडियों ने बाड़ा तोड़ दिया। इतनी ही देर में भेड़ों के मिमियाने की आवाज़ें आने लगी। कुत्ते बुरी तरह भौंकने लगे। पिताजी लकड़ी के तख्त़ हटाकर दरवाज़ा खोलने लगे। मां ने कहा 'बाहर मत जाओ।` पिताजी ने कहा, 'मेरे जीते जी भेड़िये उन्हें खा जायें ?` वे अपना भाला लेकर बाहर निकले, उनके पीछे मां निकली और मां के पीछे मैं निकला। मुझे देखकर पिताजी ने कहा, 'ये कहां आ रहा है। इसे छत पर चढ़ा दे।` मां ने मुझे छत पर उछाल दिया। पिताजी भेडियों से भिड़ गये। लाल लाल आंखें चमक रही थी। भेड़िये पच्चीस-तीस थे। उन्होंने पिताजी पर हमला कर दिया। उनके सामने जो भेड़िया आ जाता था उसे भाले से गोद देते थे लेकिन भेड़िये पीछे से हमला करने में बड़े होशियार होते हैं। मां उन्हें मार रही थी कि पिताजी के पीछे न आ सके। पर भेड़िये एक दो थे नहीं। और फिर उन्हें भेड़ों के रक्त की सुगंध मिल गयी थी। मां ने जब देखा कि भेड़िये भाग नहीं रहे हैं तो अंदर से एक लकड़ी पर कपड़ा जलाकर बाहर आयी और आग से भेड़िये भागने लगे। पर इस बीच पिताजी को भेडियों ने बुरी तरह काट लिया था। वे लेटे हांफ रहे थे। मां कपड़े से खून साफ कर रही थी। पिता ने उससे कहा कि देख मैं नहीं बचूंगा. . .बचते भी कैसे. . .वहां से अस्पताल तक पहुँचने में दो दिन लगते हैं. . .तो पिताजी ने कहा. . .मैं नहीं बचूंगा, मुझे एक वचन दे. . .तू किसी भी तरह इसे पढ़ा देगी. . .मां ने वचन दिया था।”

गरम-गरम पकौड़े आ गये थे लेकिन हम दोनों ने उधर हाथ नहीं बढ़ाया। रावत की आंखों में तो आंसू आ गये थे। वह उन्हें अपने हाथों

से पोंछ रहा था। मैं हैरतज़दा बैठा देख रहा था कि मेरे सामने एक ऐसा आदमी बैठा है जिसकी जिंदगी अच्छी से अच्छी कहानी को भी मात देती है। जो मुझे किसी दूसरी दुनिया की बातें लग रही थीं।

“अब जहां हमारा घर था वहां स्कूल कहां? दस मील दूर एक प्राइमरी स्कूल था। घाटी में उतरना पड़ता था और फिर पहाड़ पर चढ़ना पड़ता था। मां रोज मुझे वहां ले जाती थी. . .घाटी में एक पहाड़ी नदी पार करना पड़ती थी. . .वहां से मैंने पाँचवी की थी। हर साल किताब कापी खरीदने के लिए मां को भेडें़ बेचना पड़ती थी। मैं जानता था कि और कोई रास्ता नहीं है।”

“पकौड़े ठण्डे हो रहे हैं।” उसकी पत्नी ने हमें याद दिलाया।

पाँचवी के बाद गांव के मुखिया के साथ मां मुझे नैनीताल लाई। हम दो दिन चलकर नैनीताल पहुंचे थे। मुखिया बिकरम शाह को जानता था। बात यह तय हुई कि मैं दुकान, मकान की सफाई किया करूंगा और बदले में वहां सो जाया करूंगा. . .माँ हर महीने आया करती थी। अपने साथ खाने-पीने का सामान लाती थी। वैसे मैंने एक साल बाद सिनेमा हाल में गेट कीपरी भी शुरू कर दी थी। वहां से पंद्रह रुपये महीने मिल जाते थे. . .पर खाने-पीने का तो ठीक नहीं था. . .कभी जब एक दो दिन खाने को न मिलता था तो चेहरा निकल आता था। देखकर बिकरम शाह कहते, लगता है, तुझे कुछ मिला नहीं खाने को. . .जा अंदर खा ले।”

हम खाना खाने लगे। उसकी पत्नी गरम-गरम फुलके दे रही थी। मेरा और रावत के बहुत कहने पर भी हमारे साथ खाने पर नहीं बैठी। रावत ने बताया कि अब हमारे खा लेने के बाद ही खायेगी। खाने के बीच खामोशी रही। हां एक-एक सिगरेट सुलगाने के अंधेरे में उड़ते जुगनू पकड़ने की कोशिश करने लगा। मैं बिल्कुल खामोश था क्योंकि उस वक्त मैं इससे बड़ा और कोई काम नहीं कर सकता था।

“इसी तरह गाड़ी चलती रही। हाई स्कूल किया कुछ नैनीताल की हवा लगी। कालेज में दाखिला लेने के लिए मां ने अपने चांदी के गहने बेचे थे. . .और यार” वह कहते-कहते पहली बार झिझका। लगा कोई ऐसी बात कहने जा रहा है जिसका उसे मलाल है, दुख है।

पर यार उन दिनों मुझे अच्छा नहीं लगता था कि वह मुझसे मिलने आती है. . .यार सब लोग देख कर . . .और फिर वह दो दिन पैदल चलती हुई आती थी। यही नहीं पीठ पर लड़कियों का गट्ठर या भाड़े पर लाये जाने वाला समान भी लाद लेती थी ताकि खाने-पीने के लिए कुछ हो जाये. . .मैंने एक दिन उससे कहा कि वह न आया करे। वह समझदार भी थी मेरे कपड़े लत्ते और मेरे दोस्तों को देखकर समझ गयी थी कि मैं क्यों मना कर रहा हूं। उसने मुझसे कहा कि वह नहीं आयेगी. . .पर यार वह आती थी। मुझे दूर से देखती थी और वापस चली जाती थी।” रावत की आवाज़ बहुत भारी हो गयी और उसके आंसू तेजी से गालों पर ढरने लगे। मैं सटपटा गया।

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दो साल बाद घर पहुंचा तो देखा पानी सिर से ऊंचा हो गया है। अम्मां ने भूख हड़ताल कर दी कि जब तक मैं शादी के लिए 'हां` नहीं करूंगा वे खाना नहीं खायेंगी। अब्बा ने तमाम तर्क दिए कि लड़की में क्या बुराई है। बी.ए. किया है। लंदन में पली बढ़ी है। जाना-बूझा खानदान ही नहीं है हमारे दूर के अजीज भी हैं। मिर्जा इब्राहिम की अकेली लड़की है। मिर्जा साहब का बहुत बड़ा कारोबार है। खाला ने भी समझाया कि बेटा माशा अल्लाह से अट्ठाईस के हो गये हो। कब करोगे शादी? क्या हम तुम्हारे सिर पर सेहरा देखने की हसरत में मर जाएंगे? खालू ने कहा- मियां तुम्हारा 'सेहरा` पिछले दस साल से लिखा पड़ा है। बस लड़की वालों के नाम डालने हैं। अम्मा 'हां` करो तो मैं 'सेहरा` आगे बढ़ाऊं।

अम्मां ने ये भी कहा कि तुम कहीं करना चाहते हो। किसी से इश्क मुहब्बत हो तो बता दो। मैं हंस दिया। ऐसा तो कुछ है नहीं। मैं कई खूबसूरत बहाने बनाकर मामले को टाल दिया। सोचा यार अभी से क्या फंसना शादी-ब्याह के चक्कर में।

शाम चायखाने में हम सब जमा हो गये। उमाशंकर, अतहर, मुख्त़ार, कलूट के साथ गप्प-शप्प होने लगी। बातचीत में दिल्ली छाई रही। वे यह जानना चाहते थे कि दिल्ली में क्या हो रहा है। देश के भविष्य को निर्धारित करने वाले क्या कर रहे हैं? मैं इन सवालों के जवाब दे रहा था और सोच रहा था कि पूरे देश को यह बता दिया गया है कि देखो तुम्हारे भविष्य के बारे में फैसला दिल्ली में होता है। और दिल्ली के बारे

में इतनी उत्सुकता से जानकारी लेने वाले अपने शहर के प्रति उदासीन हैं। उनका मानना है यहां कुछ नहीं हो सकता। पता नहीं यह कितना सच है लेकिन दस पन्द्रह साल से जो सड़कें खराब है वे आज तक वैसी ही हैं जैसी थीं। बिजली की जो हालत है वह भी वैसी ही है जैसी थी। अस्पताल के सामने जो अराजकता है वह भी कायम है। मरीज़ों की रेलपेल है और डॉक्टर अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। अदालतों में भी रिश्वत का बोलबाला है। पुलिस अपना ताण्डव करती रहती है। अधिकारी मौज मस्ती में दिन बिताते हैं लेकिन लोगों को सिर्फ चिंता दिल्ली की है।

शहर में कोई पार्क नहीं है। सड़कें ही नहीं हैं तो फुटपाथ का सवाल नहीं पैदा होता। सड़कों के नाम पर ऊबड़-खाबड़, टूटे, ऐसे चौड़े रास्ते हैं जो कभी सड़कें हुआ करते थे। लायब्रेरी बरसों से बंद पड़ी है और अब बिल्कुल ही गायब हो गयी है। मनोरंजन के लिए दो सिनेमाहॉल हैं जो अपनी खस्ता हालत पर रोते रहते हैं। कूड़ा उठाने वाले शायद यहां हैं ही नहीं। सड़कों के किनारे कूड़े के अम्बार लगे हैं और लोग वहीं रहते हैं। देखते हैं लेकिन फिर भी नहीं देखते। नगरपालिका के चुनाव बहुत साल से हुए नहीं। जब भी नगरपालिका बनती है इतने झगड़े होते हैं, इतनी मारपीट होती है, इतनी गिरोहबंदी रहती हैं कि कोई काम नहीं हो पाता और कलट्टर उसे भंग कर देता है। ऐसा नहीं है कि ज़िला प्रशासन के पास आकर नगरपालिका में कोई काम होता हो। भ्रष्टाचार सीमाएं पार कर चुका है लेकिन जीवन चल रहा है। लोग रह रहे हैं।

मैं आज के शहर की तुलना अपने बचपन के ज़माने के शहर से करता हूं और यह जानकर आश्चर्य होता है कि उस ज़माने में यानी सन् ५६-५७ के आसपास यह शहर ज्यादा साफ सुथरा था। सड़कें अच्छी थीं। लायब्रेरी खुलती थी और लोग वहां जाकर पढ़ते थे। शहर में सफाई थी। गर्मियों के दिनों में एक भैंसा गाड़ी सड़कों पर छिड़काव भी करती थी। आबादी कम थी और बिजली पानी की “आधुनिक सुविधाएं न होने के बावजूद जीवन आरामदेह और अच्छा था।

आज़ादी के बाद ऐसा क्या हो गया है कि सब कुछ खराब हो गया

है। शहर के बाहर जो एक दो कारख़ाने या राइस मिलें खुली थीं सब बंद हो गयी हैं। मज़दूरी के नाम पर रिक्शा चलाने के अलावा और कोई काम नहीं है।

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सुबह नाश्ते पर पता चला कि सल्लो को टी.वी. हो गयी है और वह कानपुर में हैलट अस्पताल में भर्ती है। इस ख़बर पर मैं सबके सामने क्या प्रतिक्रिया दे सकता था। खामोश रहा और अफसोस का इज्ह़ार कर दिया लेकिन बुआ से ये पूछना नहीं भूला कि सल्लो किस वार्ड किस बेड पर है।

दोपहर का खाना खाकर ऊपर कमरे में लेटा तो सल्लो की याद अपने आप आ गयी। यह तय किया कि कानपुर में उसे देखता हुआ ही दिल्ली वापस जाऊंगा। पन्द्रह मिनट तक मैं हैलेट अस्पताल के गलियारों और वार्डों का चक्कर लगाता रहा। लोग और मरीज़ वार्ड के बेडों पर ही नहीं, फर्श पर गलियारों में, सीढ़ियों पर, पेड़ों के नीचे, दीवार के साये में, कूड़े के ढेर के पास पसरे पड़े थे। सब साधारण गऱीब लोग. . .सब मजबूर और बेसहारा लोग. . .यार लोग कुछ कहते क्यों नहीं? यह सरकारी अस्पताल है। इसे सरकार ठीक से चलाती क्यों नहीं? ये अस्पताल कभी चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं बनता? और ये अकेला अस्पताल इस हालत में न होगा, बल्कि इस तरह के सैंकड़ों अस्पताल होंगे. . .चीख़, पुकार, रोना, गिड़गिड़ाना, कराहना और दीगर आवाज़ों के बीच आखिऱ वार्ड की गैलरी के एक कोने में मैंने सल्लो और उसकी मां को पहचान लिया। लोग गैलरी में से आ जा रहे थे। ट्रालियां, मरीज़ों के स्ट्रेचरों के लोहे के पुराने पहियों से आवाजें आ रही थीं। लोगों के पैरों की धूल उड़ रही थी और उसी गैलरी के एक कोने में सल्लो दरी पर लेटी थी और उसकी मां उसे पंखा झल रही थी। यह देखकर मैं गुस्से से पागल हो गया।

उन्होंने मुझे पहचान लिया। मैं सोच नहीं सकता था कि सल्लो की यह हालत होगी। उसका सिर बांस के ढांचे जैसा लग रहा था जिस पर

झिल्ली चढ़ा दी गयी हो। गालों की हडि्डयां उभरकर ऊपर आ गयी थीं। आंखें अंदर धंस गयी थीं। ठोढ़ी बाहर को निकल आयी थी और गर्दन सूखकर बांस जैसी हो गयी थी। उसके हाथ पैर जैसे निचोड़ दिये गये थे। हाथों की नीली रगें बहुत नुमाया हो गयी थीं। उसने मुझे देखा और चेहरे पर एक मुस्कुराहट आई जिसकी व्याख्या असंभव है। उसकी मां खड़ी हो गयी थी।

“ये यहां क्यों पड़ी है?”

“भइया बेड़वा नहीं मिला।” वह लाचारी से बोली।

“ठहर जाओ. .. अभी मिल जायेगा. . .यही रहना मैं अभी आता हूं।”

हॉस्पिटल सुपरेण्टेंडेंट के कमरे के बाहर बैठे चपरासी ने मुझे रुकने का इशारा किया लेकिन मैं इतना गुस्सा में था कि उसे एक घुड़की देकर कमरे में चला गया। सामने मोटा-ताजा, लाल-लाल फूले गालों वाला एक चिकना चुपड़ा आदमी बैठा था। मैंने उसके सामने अपना विज़िटिंग कार्ड रख दिया। मेरी तरफ देखकर उसने विजिटिंग कार्ड पढ़ा, एस. एस. अली, सीनियर रिपोर्टर, 'द नेशन` दिल्ली, वह उठकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे से अफराना रोब झड़ चुका था।

“बैठिये सर बैठिये।”

“मैं बैठूंगा नहीं. . .मेरा एक पेशेन्ट आपके वार्ड की गैलरी में पड़ा है उसे “फौरन बेड दीजिए”, मैं गुस्से से बोला।

“कहा कहां सर. . .वार्ड नंबर सर. . .” वह खड़ा होकर किसी का नाम लेकर चिल्लाने लगा।

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सल्लो क