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December 24, 2007

एक सिम्पल मैन का बीवीनामा : रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा का आलेख

आलेख

bibinama

एक सिम्पल मैन का बीवीनामा

-रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा

बीवी कैसी हो... पति कैसा हो... ये दो सवाल... हैं तो बहुत सिम्पल... और इनके जवाब भी लोग बहुत सिम्पल से ही देते हैं। बीवी सुंदर होनी चाहिए, सुशील होनी चाहिए। पति और परिवार का ख्याल रखने वाली होनी चाहिए। कामकाजी यानी नौकरीपेशा भी होनी चाहिए। साथ ही खास बात यह है कि पत्नी नौकरीपेशा होते हुए भी पतिव्रता और पारंपरिक होनी चाहिए।... इस बात पर ज्यादा जोर दिया जाता है। ठीक उसी तरह पति की बात करें तो, पति ऐसा होना चाहिए, जो पत्नी का ख्याल रखें।

मगर हम यहां इन सब बातों के बारे में चर्चा नहीं कर रहे हैं... । बात करते हैं विषय पर, बीवी कैसी हो... इस सिम्पल से सवाल का जवाब कुछ यूं हो सकता है।... जवाब किसका है। पहले आप यह भी जान लीजिए। जवाब भी एक सिम्पल मैन का है। जिसकी एक सिम्पल-सी सोच है।

मगर इस सिम्पल सोच में कई बड़ी बातें छिपी हुई है।... चलिए सब्जेक्ट पर लौटते हैं।

बीवी कैसी हो... तो बीवी ऐसी हो, जिसकी अपनी कोई पहचान हो, या फिर पहचान बनाने की ललक हो, कॅरियर बनाने की लगन हो, देश की जिम्मेदार नागरिक बनने की चाहत हो। देश के लिए अपना तुच्छ या बहुमूल्य योगदान देने का जज्बा हो।

हमारे इस जवाब के पक्ष-विपक्ष में कई सवाल उठ सकते हैं। पहला सवाल विपक्ष से। ये पहचान और नाम या होता है... और आप बीवियों से यह उम्मीद यों करते हो कि उनका कुछ नाम- धाम और पहचान-वहचान हो। तो जनाब, यों न उम्मीद करें...। आप क्या समझते हैं (खासकर पुरूष मानसिकता वाले व्यक्तियों से) नाम-पहचान सिर्फ पुरूषों की बपौती है क्या...। महिलाओं को शादी के बाद अपना सारा व्यक्तित्व, अपनी सारी काबिलीयत पति- बच्चे और परिवार पर न्यौछावार कर देनी चाहिए। देश कोई चीज नहीं हैं या...। चलिए देश की बात छोड़ भी दें, तो या आदमी का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता ... अपनी कोई पहचान नहीं होती है... जब पुरूषों को अपनी पहचान, अपना अस्तित्व प्यारा होता है... तब महिला यूं न अपना अस्तित्व, अपना वजूद बनाए...।

अपने अस्तित्व को लेकर सजग स्त्री

सवाल और भी उठाए जा सकते हैं। पर जवाब सबका सिर्फ एक ही है...। बदलते व त में स्त्री अपने अस्तित्व को लेकर सजग हो गई है। अब तक कहा जाता था कि स्त्री के लिए सबसे खतरनाक होता है उसका स्त्री होना। मगर अब स्त्री अपने ही हथियार से दुश्मनों को परास्त कर रही है।

बात जब स्त्री देह की होती है। तब आज यही कहा जाता है, स्त्री के लिए अब उसकी देह एक हथियार हो गई, एक ढाल बन गई।... क्योंकि अब तक स्त्री देह को ही एक स्त्री के कमजोरी का कारण माना जाता था। इस बात पर विचार करके स्त्री ने अब अपनी इस कमजोरी को ही सबसे बड़ा हथियार बना डाला है। स्त्री बाखूबी जानती है कि इस हथियार का इस्तेमाल कब, कहां और कैसे करना है। स्त्री देह जब से हथियार में तब्दील हुई है। उसकी धार अब पैनी हो चली है। पहले वह बोथरी हुआ करती थी। जिससे स्त्री अगर अपने इस बोथरे हथियार के जरिए किसी से मुकाबला करने के बारे में सोचती थी तो नुकसान उसी का होता था। कहावत भी इस बारे में मशहूर है कि तरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी तरबूजे पर। हलाल तो तरबूजे को ही होना है। मतलब साफ है, स्त्री-पुरूष संबंधों में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है।

अब संबंधों का भुगतान वसूलती है स्त्री

लेकिन अब समय बदला है। स्त्री को स्त्री-पुरूष संबंधों के कारण भुगतना नहीं पड़ता, बल्कि स्त्री उसका भुगतान वसूलती है। कई स्त्री-पुरूष इसके खिलाफ बोलते मिल जाएंगे। उन्हें बोलने दीजिए। हमें भी उन्हें सुनना चाहिए। यहीं कहेंगे न आप कि अपनी देह को, हर किसी के नीचे बिछा देना कहां तक उचित है।... बरसों से सुनते आ रहे है।... धर्मग्रंथों में लिखा है, देह की पवित्रता बहुत मायने रखती है। स्त्री को अपनी देह ऐसे ही थोड़ी न सबके सामने परोस देना चाहिए।

पुरूष देह की पवित्रता का ख्याल नहीं आता

हम पूछते है आपसे।... बताइए तो जरा। भला या बुराई है इस बात में।... देह उसकी है। तो इस्तेमाल करने का हक भी उसी को होना चाहिए। (पुरूषों से) आपको स्त्री देह की पवित्रता की चिंता खूब सताती है। आपको अपनी यानी पुरूष देह की पवित्रता का ख्याल नहीं आता। वैसे हमारा मानना है कि देह की पवित्रता और अपवित्रता जैसी कोई बात नहीं होती। कुछ है तो, वो है व्यक्ति की सोच, व्यक्ति का नजरिया।

अपनी सोच को ग्लोबल बनाइए

अब हम फिर से टॉपिक पर लौटते हैं। तथाकथित पुरूष अपनी पत्नियों के खुलेपन से डरते हैं। उन्हें स्त्री के, अपनी स्त्री के अपवित्र हो जाने की चिंता सताती है। हम कहते हैं कि आपकी यह चिंता उस वक्त कहां जाती है, जब यह गुनाह, आप खुद करते हैं। स्त्री को अपवित्र करने का।... जरा सोचिए जनाब।... अपनी सोच का ग्लोबल बनाइए। अगर आप खुलापन चाहते हैं, तो दूसरों को भी खुलापन दीजिए

बदल रही है लोगों की सोच

विवाह संस्था पर आज सौ सवाल उठ रहे हैं। विवाह संस्था के सामने अस्तित्व को बचाए रखने का संकट है। यों। कारण, आज हर व्यवस्था बदलाव चाहती है। वक्त के हिसाब से कुछ परिवर्तन, कुछ लचीलापन मांगती है। मगर कुछ पुरूष अब भी वहां अपनी हुकूमत बरकरार रखना चाहते हैं। अपने आप को परमेश्वर कहलाना पसंद करते हैं। और जब पत्नी इस बात को इंकार करती है तो समझो बस उसकी शामत आ गई। आखिर कौन रहना चाहेगा ऐसे माहौल में। बस फिर क्या है तनाव, झगड़ा और बिखराव-तलाक। पर इधर लोगों की सोच में बदलाव आया है। अभी एक फिल्मी कलाकर का बयान आया था कि उन्हें अच्छा लगेगा, खुशी होगी। अगर उनकी पत्नी को पहले से सेक्स का अनुभव हो।

यह तो सिर्फ एक पक्ष है कि पुरूष अब स्त्री की सेक्स आजादी को दबे, छिपे ही सही मगर स्वीकार करने लगे हैं। मगर बात सिर्फ सेक्स की नहीं है। आजादी हर तरह की होनी चाहिए। जिंदगी को अपने अंदाज में जीने की आजादी। इसलिए हमारा मानना है कि बीवी ऐसी हो जो पहचान-नाम के बारे में सोचती हो। अपने अच्छे और बुरे भी फैसलों का परिणाम उसी को अकेले भुगतना होगा। इसलिए बेहतर यही होगा कि बीवी अपने आपको पहले एक दोस्त की जगह रखकर सोच- विचार कर लें। अपने लाइफ पार्टनर से अच्छी-बुरी हर बातें शेयर कर लें। फिर चाहे अपने फैसलों को पूरी तरह न बदलें। लेकिन उनमें उचित संशोधन, रद्दोबदल जरूर कर लें। हमारा मानना है कि पुरूषों को स्त्री की उतनी आजादी को खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए, जितनी आजादी वे खुद अपने लिए चाहते हैं।

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संपर्क:

रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा

ए-१०२८, जी डी कॉलोनी

मयूर विहार, फेस-३

दिल्ली-११००९६

मो. +९१-९८७३०७४७५३

5 टिप्पणियाँ.:

महर्षि said...

वाह डोंगरे जी आप यहां भी, खैर रचनाकार जैसे मंच पर जगह पाने के लिए बधाई हो

Anonymous said...

Dear RKD,
First of all Congratulation for Debue on e-media. Secondly, the language of the article need some improvements, you are enough capable to revised in smart and professional writing skill, explore youeself with clear vision of subject.
All the best!
Yours
Sanjay M. Apturkar

viru said...

Dongre Ji kya bat......he.....good...Keep it Up..lage raho....

रमेंद्र said...

वाह भाई डोंगरे, अच्छा लिखा. लगे रहो

Ramkrishna Dongre said...

tum vidinirmaata ki tarh baat karte ho

Ramkrishan,

lekh ki shura-aat to achi thi...

laga kuch gambhir or saarthak soch rahe ho...

but baad mein tum bhi usi
patriachal soch par aagaye,
jis par ye duniya or samaj chal raha hai.

or antim pera padkar laga
ki mane is lekh ka arambh
pad kar isse sarthakta ki umid karne ki moorkhta kase kar li...

bas yahi kahungi ki mahilayon ko
azadi or kathit adhikaar dene ki baat katre karte...

tum unke vidinirmaata ki tarh baat karne lage...

aakhir koi bhi kyu mahilayon ko bataye ki unhe kya HONA or KARNA chahiye...

unhe zimedaar nagrik hona hai
ya carrer oriented ya parampairk...

let them decide,
you or some1 else plz dont do this for them..

unicode wala baksa yaha khulta to ye comment tumare blog par hi deti-Ramkrishan.

...or umid hai theek thaak hoge..
bi & tak care.

pooja

by RAMKRISHNA TRISHNA

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