सत्यप्रसन्न के चंद दोहे
चंद दोहे
- सत्यप्रसन्न
छल प्रपंच धोखाधड़ी, हिंसा अत्याचार
धूप बांचती जा रही कलियुग का अखबार
धूपिया दोहे
धूप चुरा कर ले गई नभ के आंसू बीन
शरद, राग कुछ गा रहा, धरा हुई रंगीन।
सीमाओं में कैद है मुल्कों की तकदीर
सूरज किस सीमा बंधा, धूप बंधी किस तीर।
अभी अभी थी द्वार पर अब जा चढ़ी मुंडेर
धूप कुंआरी है भला, किस साजन के फेर।
लिखा धूप ने एक खत कल मौसम के नाम
सूरज कैसे हो गया उगते ही बदनाम।
आँख मिचौली खेलती अमराई में धूप
उस पर यौवन सिर चढ़ा ये कैसा विद्रूप।
छल प्रपंच धोखाधड़ी, हिंसा अत्याचार
धूप बांचती जा रही कलियुग का अख़बार।
उँगली थामे धूप की बचपन लेकर साथ
कागज पन्नी बीनने निकल पड़ा रघुनाथ।
जब से शहरी हो गए चौपालों के पाँव
धूप सरीखी जल रही, नीम तले की छांव।
लो बालों में पड़ गई एक घूप की रेख
प्रियतम ने दिनभर किया उसका ही उल्लेख।
धूप उठा कर ले गई है उजास के कोष
पर कल फिर ले आएगी, है इसका संतोष।
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सोचिया दोहे
इतना सा तो दिल है इसमें कितने दर्दों के जंगल,
अपनी दुनिया कहाँ बसाएँ, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
झूठ दौड़ता झटपट लेकिन सच के पावों में है मोच,
कैसा मरहम कौन लगाए, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
जिसके हाथों खून हुआ था, वही न्याय की कुर्सी पर,
कैसे होगा निष्पक्ष फैसला, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
नहीं रोशनी कोई भीतर, बाहर कोई आग नहीं,
कैसे होगा दूर अँधेरा, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
बरसा मेघ टूट कर बरसा अग-जग पानी-पानी है,
फिर भी धरती क्यों प्यासी है, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
इतना सा तो दिल है इसमें कितने दर्दों के जंगल,
अपनी दुनिया कहाँ बसाएँ, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
आस्तीन के सांपों से तो फिर भी बचना मुमकिन है,
अपने विष का तोड़ कहाँ है, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
आदमखोरों की बस्ती में रहना कोई खेल नहीं,
कैसे फिर भी जिंदा हैं हम, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
तेरे पांवों के छालों की, पीड़ा मेरे पाँव सहें
अपना सुख दुःख कैसे बांटें, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
अपना घर तो शीशे का है, उनके हाथों में पत्थर,
कैसे बीतेगा कल अपना, कुछ मैं सोचूं कुछ तू सोच।
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संपर्क:
सत्यप्रसन्न राव
एमआईसी/2/23,
साडा कॉलोनी, जमनी पाली
सरदार वल्लभभाई पटेल नगर
कोरबा (मप्र)
मोबाइल - 9425540406












1 टिप्पणियाँ.:
दोहे अच्छे लगे, पढाने के लिये धन्यवाद।
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