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August 16, 2007

मां और मातृभूमि


कविता

मां और मातृभूमि

-हरिहर झा

छुटा देश तो जीना दूभर दुखड़ा किससे कहना

माया मोह की गठरी लादे सुख दुख इसके सहना


समझे दर्द न दिल का कोई घूटी रही अभिलाषा

मातृस्नेह की एबीसी मे कैसे हो सकती परिभाषा


रहा न अपना, देश पराया अपना लेने का बीड़ा

याद क्यों आई? मां ने जन्म दिया था उसकी पीड़ा


मां का गर्भ था स्वर्ग के जैसा छाया परमानन्द

शयनकक्ष की अद्भूत निंद्रा सुख सुविधा मे बन्द


माता का लहू पोषण देता भूख लगी और तृप्ति

मां की धमनी पीपल छैयां कष्ट गया निवृत्ति


सांस लिये का श्रम न जहां हो जब पूरा आराम

मां की धड़कन गीत बना बस सुना सुबह और शाम


केवल नौ महिने क्या बीते मां हो गई मजबूर

प्रसव की पीड़ा भोगी खुद और किया स्वयं से दूर


जो दिवारें पाल पोस कर बांटती सुख आनन्द

देती धक्का शर्मसार हो रह न सका मैं बन्द


निकल न पाऊं, रह ना पाऊं अद्भुत रही सुरंग

ममता खदेड़ रही क्यों मुझको छिड़ी हुई क्यों जंग


शिशु जन्म ले इसमे चाहे हों जितने संताप

मातृभूमि को छोड़ विदेश मे बसना है क्या पाप ?


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