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April 12, 2007

नजीब महफूज: सैटनिक वर्सेस, रुश्दी से पहले


- विजय शर्मा

वैष्णव और द्वैत दर्शन मे विश्वास रखने वाले वेल्लमकोंडा रामराय कवि आदि शंकराचार्य से इतनी घृणा करते कि उनकी पुस्तक तक स्पर्श करने को तैयार न थे, पढ़ना तो दूर की बात थी. एक बार उनके एक मित्र ने शंकराचार्य की एक पुस्तक बलपूर्वक उन्हें थमा दी और उसे पढ़ने के लिए बाध्य किया. रामराय कवि ने शंकर की कोई पुस्तक कभी नहीं पढ़ी थी. उन्होंने पढ़ना प्रारम्भ किया परंतु बिना स्पर्श किए. घृणा के कारण वे दूर से एक छड़ी की सहायता से पुस्तक के पन्ने पलटते और पढ़ते जाते. लेकिन ज्यों-ज्यों वे पढ़ते गए चकित होते गए. प्रभावित होते गए. डूबते गए. और पढ़ते गए. जल्दी ही उन्होंने छड़ी को दर किनार किया और पुस्तक हाथ में उठा ली अब वे हाथ से पन्ने पलट रहे थे. पुस्तक समाप्त होने तक रामराय कवि पूरी तरह परिवर्तित हो चुके थे. उन्होंने शंकर की प्रत्येक पुस्तक खोज निकाली और उनका अध्ययन किया, इतना ही नहीं उन्होंने शंकराचार्य के दर्शन की प्रशंसा और व्याख्या में एक सौ पुस्तकें लिखीं. एक से बढ़ कर एक पुस्तक. बहुत कम वय में गुजरने के पूर्व उन्होंने ये प्रत्येक अनूठी पुस्तकें रचीं.

लेकिन कितने लोग हैं जो जिस पुस्तक से घृणा करते हैं उसे पलटने का कष्ट करते हैं? भले ही छड़ी की सहायता से. पुस्तक को प्रतिबंधित करने से पहले उसे पढ़ने की जहमत उठाते हैं? अक्सर धार्मिक कठमुल्ला पुस्तक को बिना पढ़े (उनकी आंखों पर पट्टी बँधी होती है. पढ़ भी लेंगे तो समझ लेंगे इसमें शक है) किताब को प्रतिबंधित करने का नारा लगाने लगते हैं. इतना ही नहीं वे लेखक को मार डालने का फतवा भी जारी कर देते हैं. फरवरी 1989 में अयातुल्ला खुमैनी ने यही किया. सल्मान रुश्दी की किताब 'सैटनिक वर्सेस' को इस्लाम धर्म, पैगम्बर मुहम्मद और कुरान आदि के खिलाफ घोषित करते हुए रुश्दी के लिए फतवा जारी कर दिया. इस पर नॉर्मन मैलर ने कहा था, 'खुमैनी ने हमें अपने नाजुक धर्म शब्दों की शक्ति में पुन: विश्वास हासिल करने का अवसर दिया है. ' बाद में जब रुश्दी ने इस्लाम को पुन: स्वीकार करते हुए एक तरह से माफी माँग ली और किताब को उस रूप में भविष्य में न प्रकाशित कराने का वायदा किया तब भी फतवा न हटा. और तो और खुमैनी के गुजरने के बाद उनके वारिस ने फतवा जारी रखते हुए उसे और दृढ़ता प्रदान कर दी. खुमैनी आध्यात्मिक नेता थे और उनकी बात को कोई काट नहीं सकता है.

रुश्दी के फ़तवे की पूरी दुनिया में खूब चर्चा हुई. बच्चा-बच्चा इस बात को जानता है परंतु बहुत से पढ़े-लिखे और साहित्य प्रेमी, खासतौर से हिन्दी साहित्य प्रेमी शायद नहीं जानते हैं कि 1989 से बहुत पहले एक और लेखक की एक किताब को लेकर धामक कठमुल्लाओं ने ऐसा ही हंगामा किया था. लेखक थे मिस्र (इजिप्ट) के नजीब महफूज और 1959 में लिखी पुस्तक थी 'औलादो हार्रतुना' (चिल्ड्रेन ऑफ गेबेलावी).

वैसे तो जिन किताबों को प्रतिबंधित करने की माँग समय-समय पर उठती रही है उनकी फेहरिस्त बड़ी लम्बी है. यूलीसेस (जेम्स जॉयस), लीव्स ऑफ ग्रास (वॉल्ट विटमैन), रूसोज कंफेशंस (रूसो), कॉल ऑफ द वाइल्ड, द आयरन हील (जैक लंडन), फ्रेंकनस्टीन (मेरी शेली), ब्लैक ब्युटी (अन्ना सीवेल), सिविल डिसओबिडियंस (थोरो), लेडी चैतर्लीज लवर (डी एच लॉरेंस), गॉन विथ द विंड (मार्गरेट मिशेल), साइलेस माइनर (जॉर्ज इलिएट), द अरबियन नाइट्स. और तो और सऊदी अरब में तो बाइबिल नहीं बाँटी जा सकती है. एक समय था जब सोवियत यूनियन में बाइबिल और कुरान दोनों प्रतिबंधित थी. भारत में भी समय-समय पर किताबें प्रतिबंधित होती रही हैं.

परंतु महफूज और रुश्दी की किताब का यहाँ एक संग जिक्र करने का खास मकसद है. महफूज ने अपनी किताब 'औलादो हार्रतुना' (चिल्ड्रन ऑफ गेबेलारी) में मानवता के इतिहास को प्रारम्भ से लेकर बीसवीं सदी के पाँचवे दशक तक को समेटने का प्रयास किया है. 1959 में आए उपन्यास की कथावस्तु बिल्कुल भिन्न है. यह कैरो के एक उपनगर के बच्चों और उनकी कठिनाइयों की शुरुआत से सृष्टि की कहानी है. इसमें उन्होंने इस्लाम से जुडे कई मिथकों को प्रतीकवादी शैली में आम चरित्रों के रूप में प्रस्तुत किया है. कुरान और हदीस का सहारा लिया है. इसमें कुरान के 114 सूरा की भाँति 114 चैप्टर हैं. उपन्यास के चरित्र धामक चरित्रों से मिलते-जुलते हैं. एडम और इव, मोसेस, जीसेस, मोहम्मद, इदरिस, जाबाल, कासिम आदि और बहुत से दूसरे लोगों के साथ इसमें आधुनिक वैज्ञानिक भी छद्म वेश में उपस्थित हैं. स्वयं गेबेलावी अल्लाह सिरजनहार से मिलता-जुलता है. इस कहानी के कुछ बासिन्दे स्थानीय प्रमुख (राजनीति) का अनुगमन करते हैं तो कुछ उच्च आदर्शों (धर्म) की ओर रास्ता लेते हैं. इसमें मनुष्य की अनवरत खोज, आध्यात्मिक मूल्यों के विषय को उन्होंने अपनी कथावस्तु बनाया है. इसमें दिखाया गया है कि असल में ये वैज्ञानिक ही हैं जो आदिम पिता गेबेलावी (ईश्वर) की मौत के जिम्मेदार हैं. इसमें चित्रित किया गया है कि प्रेम के पारस (अमृत) और विस्फोटक को आधुनिक विज्ञान का मनुष्य एक जैसी दक्षता से मिलाता है. वह गॉड की मृत्यु का जिम्मेदार है परंतु स्वयं भी नष्ट होता है. उन्होंने दिखाया है कि अच्छाई और बुराई के लिए अलग नियम हैं, उनके टकराव, उससे उत्पन्न तनाव का इसमें चित्रण हुआ है. नई परिस्थितियों में नए तनाव को झेलते हुए व्यक्ति का चित्रण है. इसके बावजूद उपन्यास के अंत में आशा की किरण है. जिस तरह से महफूज ने उच्च स्तर की बातों को इस किताब में चित्रित किया है वह परम्परावादी लोगों के गले नहीं उतरी और यह किताब उनके अपने देश में प्रकाशित न हो सकी. परंतु अन्य देशों में इसका प्रकाशन हुआ. उपन्यास को जलाया गया और सडकों पर रैलियाँ निकाली गई और महफूज को इस्लाम का दुश्मन करार दिया गया. 'औलादो हार्रतुना' ने उनके जीवन को उलट-पुलट दिया. उनको मुल्क की संस्कृति व मजहब के लिए खतरनाक सिद्ध किया जाने लगा. जब धर्म के ठेकेदार उनके विरुद्ध थे देश के अधिकाँश बुद्धिजीवी भी उनसे कट गए इससे उनको कितनी पीडा हुई होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है. पर वे हारे नहीं, न ही उन्होंने लिखना बन्द किया. जिनका जमीर जागा होता है वे बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहना नहीं छोड़ देते हैं. नजीब ऐसे ही जागे हुए जमीर के लेखकों में से थे.

जब पहले-पहल यह उपन्यास काहिरा (कैरो) के प्रमुख पत्र 'अल अहराम' (द पिरामिडस) में धारावाहिक प्रकाशित होने लगा इस्लामिक यूनिवसटी अल अजहर के नेता, धर्म और नैतिकता के ठेकेदारों ने किताब को धर्म पर आघात मान कर किताब और लेखक के खिलाफ नारे लगाए और किताब को प्रतिबंधित करना चाहा. पर न तो आधिकारिक बन्दिश लगी न ही धारावाहिक का प्रकाशन रुका. 1988 में सलमान रुश्दी की किताब द सैटेनिक वर्सेस के फतवा के दौरान पुन: महफूज की इस किताब को लेकर गरमागरम बहस उठी. अचानक महफूज ने पाया कि उन्हें एक विदेशी लेखक के साथ खडा कर दिया गया है. जबकि दोनों लेखकों और दोनों की किताबों में कोई समानता ना थी. महफूज स्वयं इस्लाम को मानने वाले हैं, नैतिकता का पालन करने वाले. रुश्दी इंग्लिश में लिखते हैं महफूज अरबी में. एक बहुत पहले प्रवासी बन गया और उसने दूसरे देशाेंं की नागरिकता भी ले ली, जबकि महफूज ने शायद ही कभी अपना वतन याँ यू कहें अपना जन्म स्थान छोड़ा. लेकिन कट्टरवादियों ने दोनों को एक मान लिया. महफूज ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मानवता का पवित्र अधिकार मानते हुए रुश्दी के बचाव में 2 मार्च 1989 को अल अहराम न्यूजपेपर में वक्तव्य दिया. बस फिर क्या था महफूज के दुश्मनों ने दोनों किताबों को एक ही पलडे पर रख कर महफूज के लिए भी उसी फतवे की माँग शुरु कर दी जो सल्मान रुश्दी के लिए जारी किया गया था.

इस दौरान नजीब महफूज ने अपना विचार इन शब्दों में रखा: ''मैं खुमैनी के सल्मान रुश्दी को मारने के फतवा की भर्त्सना करता हूँ क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों का उलंघन है और इस्लाम पर प्रहार है'' अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में उनका कहना है कि इसे पवित्र माना जाए. विचार केवल प्रति-विचार के रूप में ही सुधारे जा सकते हैं. उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हुए भी सामाजिक शांति को उससे ऊ पर स्थान दिया. उनका मानना है कि लोग तर्क और विचार की रोशनी को बुझा देना चाहते हैं. अभिव्यक्ति की आजादी की हर हाल में रक्षा होनी चाहिए और किसी विचार को अगर परास्त या दुरुस्त करना है, तो बलपूर्वक नहीं बल्कि प्रतिरोधी विचारों के द्वारा ही ऐसा किया जा सकता है.

पर इससे उनके विरोधी ठंडे नहीं पडे. वे अपने आप को बहुत अकेला महसूस करते थे. शायद सच्चाई का पक्ष लेने वाले की यही नियति होती है. सल्मान रुश्दी ने फतवा से बचने के लिए ना मालूम अपने कितने ठिकाने बदले. देश बदले. पर जहाँ भी रहे उस देश की सरकार ने उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए. उन्होंने स्वयं भी सुरक्षा के कठोर नियमों का पालन किया. रुश्दी के जीवन में इस दौरान कई बदलाव आए. उनके इस अनिश्चित जीवन से तंग आकर उनकी पत्नी उन्हें छोड़ गई पर लिखना उन्होंने जारी रखा. मिस्र की सरकार ने भी कट्टरवादियों के 'काफिर' की सुरक्षा की पेशकश की परंतु महफूज ने इसे कभी स्वीकार न किया. और अपना जीवन सामान्य चर्या से चलाते रहे, दोस्तों के साथ बैठते रहे. उन्होंने लिखना जारी रखा और एक दिन इसी गुट के एक धर्मांध ने उन पर हमला कर दिया और इससे साहित्य जगत का कितना नुकसान हुआ इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है.

गुंटर ग्रास अपने नोबेल भाषण में कहते हैं कि वे किताब जलाने वालों के देश से आते हैं. ग्रास अपने भाषण में पहले पूछते हैं कि क्या है जो किताब और उसके साथ लेखक को इतना खतरनाक बना देता है कि उसे समाप्त करने के उपाय किए जाते हैं? वे आगे स्वयं ही उत्तर भी देते हैं वे कहते हैं कि लेखक सत्य की खोज में गड़े मुर्दे उखाडता है, वह शल्य चिकित्सा करता है और इस सिलसिले में घाव को खोलता है. बन्द दरवाजों के पीछे झाँकता है अतीत की शांति भंग करता है. उसके लिए कुछ भी ऐसा पवित्र नहीं है जिसपर वह प्रश्न नहीं उठाता हो चाहे वह पूँजीवाद हो अथवा कोई और वाद या फिर राजाओं की जीत. और यही उसे कुछ लोगों की नजरों में खटका देता है यहाँ तक कि अपराधी बना देता है. मेरी समझ में नहीं आता है किताब जला कर लोग क्या सिद्ध करना चाहते हैं. खैर मेरी समझ में बहुत सी बातें नहीं आती हैं. लेकिन इतना जरूर जानती समझती हूँ कि किताब वही जला सकता है जो मानवता की इस अमूल्य विरासत की कद्र करना नहीं जानता है. गुंटर ग्रास व्यंग्य कर रहे हैं अपने देशवासियों पर. वैसे हमारा देश भी कुछ कम नहीं है किताब जला कर यहाँ के लोग (कुछ थोड़े से) भी अपनी बहादुरी दिखाने की कोशिश करते हैं. शायद कुछ लोगों के लिए किताब जलाना या उसे प्रतिबंधित करने के लिए शोर- शराबा, हंगामा करना एक फैशन है. हमारे यहाँ भी नजीब की मृत्यु पर साहित्य जगत में खास सुनगुन नहीं हुई. पत्र-पत्रिकाएँ भी अपने हितों को बचा कर चलती हैं.

सुकरात को बिना कुछ लिखे ही जहर का प्याला पीना पड़ा. कितने ही जर्मन, इटैलियन, स्पैनिश, और पुर्तगाली लेखकों को अपनी भाषा और अपना वतन छोड़ना पड़ा. नामालूम रूस और चीन के कितने लेखक आतंक का शिकार हुए. 1995 में नाइजीरियन लेखक केन सारोवीवा और उनके समर्थकों को फाँसी की सजा सुना दी गई और मार डाला गया. उनकी खता थी कि उन्होंने अपने देश में व्याप्त बुराइयों के विषय में लिखने की हिमाकत की थी. दूर क्यों जाएँ बगल के बांग्ला देश की तस्लीमा नसरीन अपने लेखन के कारण देश के कठमुल्लाओं की नजरों में चढ़ गईं, उन्हें अपना वतन छोड़ना पड़ा. महफूज को भी सत्य की कीमत चुकानी पड़ी. वे कहते हैं कि सत्य की खोज उन्हें लिखने को उकसाती है.

नोबेल एकेडमी के प्रजेंटेशन भाषण में प्रोफेसर स्टूर एलेन ने कहा: ''1911 में 10 दिसम्बर को जिस दिन उस वर्ष का साहित्य का पुरस्कार मौरिस मीटयरलिंक को यहाँ स्टॉकहोम में किंग गॉस्टव्स पाँचवें के हाथों मिला उसके दूसरे दिन काहिरा में नजीब का जन्म हुआ. '' कैरो में 11 दिसम्बर 1911 में जन्मे नजीब महफूज ने सत्रह साल की उम्र से ही लिखना प्रारम्भ कर दिया था. उनका पहला उपन्यास 'अबोस अल-अकदर' (आयरनी ऑफ वैल्यूज) 1939 में प्रकाशित हुआ. द्वितीय महायुद्ध 1939-1945 के बीच उन्होंने तीन उपन्यास लिखे. उनके ज्यादातर उपन्यास मिस्र के इतिहास पर आधारित हैं पर चरित्र अतीत से वर्तमान में बिना किसी रोकटोक के आते-जाते रहते हैं. जुलाई 1952 में होने वाली मिस्र क्रांति के पूर्व उनके दस और उपन्यास लिखे जा चुके थे. इसके बाद उन्होंने काफी समय तक लिखना बन्द कर दिया. हालाँकि उनका एक उपन्यास 1953 में पुन: प्रकाशित हुआ. 1957 में प्रकाशित मिस्र त्रयी ने उन्हें सम्पूर्ण अरब दुनिया में चचत कर दिया. खूब शौहरत दी. यह त्रयी थी 'बैनुल-कसरैन' (बिटवीन द पैलेसेस), 'कसरुस्शौक' (पैलेस ऑफ लाँगिंग), 'अस्सुकरिय': (शुगरहाउस). उनकी उपन्यास त्रयी आत्मकथात्मक तत्वों से भरी है. इसके केंद्र में एक परिवार है. इसमें 1910 से लेकर 1950 तक इस परिवार में होने वाली तब्दीलियों का चित्रण है. इसी के साथ इसमें बौद्धिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों का भी चित्रण है. उनकी इस किताब ने उनके देश पर काफी प्रभाव डाला. जो उनके देश की तत्कालीन स्थिति को समझने में सहायक है.

यहाँ पर मिस्र की थोड़ी सी जानकारी अन्यथा न होगी. इस्लाम मिश्र का ऑफीसियल धर्म है. और 90% लोग सुन्नी मुसलमान हैं. यहाँ 7% जनता इसाईयत के कोप्टिक चर्च से जुड़ी है और 3% प्रतिशत लोग ग्रीक ऑर्थाडॉक्स, रोमन कैथोलिक, अरमेनियन तथा विभिन्न प्रोटेस्टेंट चर्च को मानने वाले हैं एक बहुत छोटे सी आबादी यहूदियों की भी है. अरबी यहाँ की राष्ट्रीय, बोलचाल और ऑफिस की भाषा है. वैसे पढ़े लिखे लोग इंग्लिश और फ्रेंच भी बोलते हैं. यहाँ की 70 से ज्यादा प्रतिशत आबादी शिक्षित है.

पिछली सदी के पाँचवें दशक में राजतंत्र का तख्ता उलट गया. गमाल अब्दल नासर ने मिलिट्री की सहायता से मिस्र का राजनीति तंत्र बदल दिया. नासर ने मिस्र को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराया. दो साल के अन्दर नासर स्वयं राष्ट्रपति बन बैठे. वे अरब देशों का एकीकरण करना चाहते थे, उन्होंने अरब समाजवाद का भी स्वप्न देखा. हालाँकि यह कामयाब न हो सका. 1958 में मिस्र और सीरिया ने मिल कर यूनाइटेड अरब रिपब्लिक की स्थापना की. 1961 में ही इससे सीरिया हट गया परंतु 1971 तक मिस्र इसी नाम का प्रयोग करता रहा. 1970 में नासर की मृत्यु के बाद उनकी विरासत अनवर अल सादात ने सम्भाल ली. सदात के इजराइल संबंधों को कट्टरपंथी इस्लाम वालों ने कभी स्वीकार नहीं किया. उन्होंने मुस्लिम कृट्टरपंथियों को तोडने के लिए गिरफ्तारियाँ शुरु कीं और प्रेस को प्रतिबंधित किया. कट्टरपन्थी उन्हें सदा इस्लाम का द्रोही मानते रहे. 1981 में मिलिट्री ऑफीसरों ने सदात की हत्या करा दी और वाइस प्रेसीडेंट हुस्ने मुबारक ने कमान सम्भाली. 1993 में 29 अतिवादियों को फाँसी दे दी गई. 1992 में इस्लामिक कट्टरवादियों ने सरकारी अफसरों, क्रिश्चियन, पर्यटकों, बुरका न पहनने वाली औरतों को अपना निशाना बनाना शुरु किया. और यह अभी भी जारी है. 1995 में कट्टरवादियों ने हुस्ने मुबारक की हत्या का प्रयास किया. ये कट्टरवादी समय-समय पर निर्दोष जनता और पर्यटकों की हत्या करके आतंक फैलाते रहते हैं. सन 2000 में मिस्र में स्त्रियों के अधिकारों में कानून द्वारा थोड़ा इजाफा हुआ है. इन्हीं कट्टरपंथियों ने 1994 में महफूज पर हमला किया था.

फिर जब महफूज ने दोबारा लिखना प्रारम्भ किया तो उनकी शैली बदल चुकी थी. वे नए ढंग से लिखने लगे. 1959 में 'द चिल्ड्रेन ऑफ गेबेलावी' के साथ उन्होंने नए ढंग में लिखना शुरु किया. यह काफी जटिल चित्रण वाला उपन्यास है अक्सर राजनीतिक फैसलों को रूपक कथा तथा प्रतीकवाद के रूप में ढालते हुए. इस दूसरे दौर में उन्होंने 'द थीफ एंड द डॉग्स' (1961), 'ऑटम क्वायल' (1962) लिखा, 1966 में लिखा 'ए हाउस ऑन द नाइल' महफूज के खजाने का एक और रत्न है इसमें उन्होंने मिथिकल वार्तालापों को यथार्थ और भ्रम के कगार पर रखा है. इसके साथ ही यह किताब उनके देश के बौद्धिक पर्यावरण पर टिप्पणी भी करती है. यह उपन्यास 'स्मॉल टॉक ऑन द नाइल' 'चिटचैट ऑन द नाइल', 'ए हाउस ऑन द नाइल' के नाम से भी जाना जाता है. इसके हाउसबोट का संवाद और जीवंत बहस सामाजिक भूमिकाओं के विषय के लिए मंच प्रदान करता है. यहाँ हम एक युवा जोड़े से मिलते हैं जो पिरामिड के ब्लॉक्स में अपनी सेज बिछा रहें हैं. (1966) तथा 'मीरामार' (1962) जैसे उपन्यास और कई कहानी संकलन आए. इन्होंने अपना कैरो का घर शायद ही कभी छोड़ा है. और कैरो ही इनकी उपन्यासों, कहानियों और नाटकों की रंगभूमि रहा है.

दो हजार साल पहले तक का अरबी साहित्य का इतिहास स्पष्ट रूप से मिलता है. बहुत समय तक अन्य देशों के साहित्य की भाँति यहाँ भी साहित्य की प्रमुख विधा काव्य ही थी. लेकिन इसके साथ ही यहाँ मौखिक वर्णन की एक प्राचीन और समृद्ध परम्परा मिलती है. भारतीय, ईरानी और ईराकी मूल की बहुत सारी कहानियों का एक संकलन 'द अरेबियन नाइट्स' के नाम से मिस्र में मिलता है. इसकी कहानियाँ विकसित कहानियों की श्रेणी की हैं. आज भी मिस्र में कहानी कहने, सुनने की प्रथा जीवित है. जनता के बीच कहानी कहना युगों-युगों से एक सांस्कृतिक विरासत के रूप में कायम है. उपन्यास अन्य देशों के साहित्य की तरह ही यहाँ भी एक नई विधा है, आधुनिक युग दुनिया के जिस साहित्य में भी उपन्यास का विकास हुआ उसके पीछे कुछ खास बातें रहीं हैं, मसलन: 19 वीं सदी में यूरोपीय साहित्य में उपन्यास विधा के विकास का प्रभाव, 19 वीं में प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना और अखबारों का उदय (अधिकतर उपन्यास पहले अखबारों में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित होते थे), जनता का शिक्षित होना तथा साक्षरता का प्रसार, 19 वीं सदी में विदेशी शक्तियों के शोषण से मुक्ति एवं अंतरराष्ट्रीय ज्ञान से लैस बौद्धिक वर्ग का उदय. मिस्र में भी इन्हीं शर्तों पर उपन्यास का उदय हुआ.

मिस्र के प्रारम्भिक उपन्यासकार जिन्होंने इस विधा को दिशा-दशा प्रदान की उनमें सबसे पहला नाम मुहम्मद हुसैन हेकल (18881956) का आता है. इनका 1912 में प्रकाशित 'जैनब' उपन्यास अरबी का पहला मुकम्मल उपन्यास माना जाता है. परंतु इनके सबसे काबिल उत्तराधिकारी का जन्म तब हुआ जब ये अस्त हो रहे थे. महफूज को इनका उत्तराधिकारी माना जाता है जिन्होंने अरबी उपन्यास को बुलन्दी पर पहुँचाया. उसे इतना प्रौढ़ बनाया कि वह नोबेल पुरस्कार का हकदार बना.

अरबी उपन्यास को जिन शुरुआती उपन्यासकारों ने मजबूती प्रदान की उनमें इब्राहिम अल मैजिनी (18901949), ताहा हुसैन (18891973), महमूद ताहिर (18941954) और तौफीक अल हकिम (18981987) के नाम आदर से लिए जाते हैं. अरबी साहित्य में उपन्यास तात्कालिक घटना है तकरीबन महफूज के समय की. वे उसे प्रौढ़ता की ऊँचाइयों पर पहुँचाते हैं. विभिन्नता और आंशिक रूप से प्रयोगात्मक उपन्यासों की रचना करके. ये उपन्यास मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद से रूपक तथा रहस्य-मीमांसा की बनावट तक जाते हैं. उनके साहित्य की एक विशेषता है अतीत से वर्तमान तक के समय की प्रस्तुति.

महफूज की शिक्षा प्रथम किंग फाउद यूनिवसटी (आज की कैरो यूनिवसटी) में हुई. उनके पिता सिविल सर्विस में निम्न श्रेणी के अधिकारी थे. महफूज सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे. हाई स्कूल तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने मध्यकालीन एवं अरबी साहित्य का अच्छा खासा ज्ञान प्राप्त कर लिया था. यूनिवसटी में फिलॉसफी पढ़ने के दौरान ही वे प्रोफेशनल जरनल्स में आलेख लिखने लगे थे. अपनी इंग्लिश सुधारने के लिए उन्होंने जेम्स बैकी के 'एन्शियंट इजिप्ट' का 1932 में अरबी में 'मिस्र अल-कदीम' नाम से अनुवाद कर डाला. ग्रेजुएशन पूरा होते ही छ: साल के भीतर उन्होंने 80 कहानियाँ लिख डाली. 1972 तक महफूज सिविल सर्वेंट थे. पहले मिनिस्ट्री ऑफ मोर्टमैन एंडोवमेंट्स, फिर ब्यूरो ऑफ आर्ट के सेंसरशिप के निदेशक, फाउंडेशन फोर द सपोर्ट ऑफ द सिनेमा के निदेशक और अंत में मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर में कल्चर अफेयर्स के कंसल्टेंट के रूप में. ब्यूरोक्रेसी से निवृत्त होते ही सृजन की धारा और तेजी से प्रवाहित होने लगी. इस बार प्रयोग ज्यादा होने लगे. उनके तीस उपन्यास, सौ से ऊ पर कहानियाँ और दो सौ से ऊ पर लेख हैं. उनके आधे से ज्यादा उपन्यास फिल्म में परिवर्तित हो चुके हैं. फिल्में जो पूरी अरबीभाषा-भाषी प्रदेशों (फिल्म निर्माण की संख्या की दृष्टि से मिस्र का भारत और हॉलीवुड के बाद दुनिया में तीसरा स्थान है) में दिखाई जाती हैं. उनके हर उपन्यास का प्रकाशन मिस्र में एक सांस्कृतिक घटना होती थी और गिब्राल्टर से लेकर खाड़ी तक कोई भी साहित्यिक चर्चा उनके नाम के बिना पूरी नहीं हो सकती है. फिर भी बदकिस्मती है कि अरबी दुनिया के बाहर बहुत कम जोग उन्हें जानते हैं.

जब उन्हें 1988 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो प्रेस रिलीज में कहा गया, 'स्वीडिस एकेडमी पहली बार एक मिस्र निवासी को पुरस्कृत कर रही है'. ये साहित्य के लिए नोबेल पाने वाले अरबी भाषा के भी प्रथम व्यक्ति हैं. अधिकतर पुरस्कार बहुत देर से मिलते हैं कई बार तो महत्वपूर्ण रचनाकारों को पुरस्कार मिल ही नहीं पाता है. जब महफूज को नोबेल पुरस्कार मिला वे पचास वर्षों से लिख रहे थे और उनकी उम्र 77 साल थी. नोबेल समिति ने अपनी विज्ञप्ति में कहा कि वे आज भी अध्यवसायी हैं. अरबी भाषा में उपन्यास विधा के उत्थान में उनका महत्वपूर्ण योगदान है. इसके साथ ही उनका कार्य हम सबको भी संबोधित है.

उनका 'ए विस्पर ऑफ मैडनेस' 1938 में प्रकाशित हुआ. मिनिस्ट्री ऑफ रिलीजियस अफेयर्स में काम करते हुए 1939 से 1954 तक उन्होंमे एक योजना के तहत तीन भागों में फराओ काल को उपन्यासों में समेटा. इसके बाद उन्होंने इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए और सामाजिक यथार्थवादी उपन्यासों की ओर मुड गए. इसके साथ ही वे मिस्र की फिल्म इंड्रस्ट्री के लिए स्क्रीनप्ले भी लिखने लगे. मिस्र की राजशाही का तख्ता 1952 में पलटने के बाद बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों में उनकी 'कैरो त्रयी' खूब सफल रही. और जब नवें दशक में उनका इंग्लिश अनुवाद आया तो दुनिया के अन्य मुल्कों में उनकी शौहरत फैली, उनके अपने देश में एक बार फिर से तीनों उपन्यासों की प्रसिद्धि हुई. उपन्यास त्रयी में नायक कमाल अस्तित्व के गूढ प्रश्नों से जूझता है. महफूज ने स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस तकनीक के प्रयोग भी किए और एब्सर्ड साहित्य पर भी अपनी कलम आजमाई. उनके पहले के उपन्यास प्राचीन मिस्र के फराओ के वातावरण में स्थित हैं परंतु उनमें आज के समाज पर भी दृष्टि है. काहिरा पर आधारित उनके उपन्यासों में वातावरण आधुनिक काल का है.

वृन्दावन लाल वर्मा, आचार्य चतुर्सेन शात्री, प्रियंवद की भाँति नजीब को भी इतिहास से खास लगाव रहा है. महफूज के उपन्यासों में इतिहास का विशेष महत्व है. उन्होंने अपनी कलम के कमाल से इतिहास के निर्जीव चरित्रों को सजीवता प्रदान की है. वे इतिहास की बारीकियों के बीच समकालीन राजनीतिक सामाजिक परिस्थितियों से कथानक को पिरोते चलते हैं. 1939 में रचा उनका 'अबास अल-अकदर' प्राचीन मिस्र की शौर्य गाथा पर आधारित है. इस उपन्यास का मूल नाम हिकमत कूफू था जिसका अनुवाद कूफू का ज्ञान हो सकता है. यह फराओ चौथे साम्राज्य 2680 ई. पू. था और इसे एक भविष्यवक्त्ता ने कहा था कि उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे को राजगद्दी नहीं मिलेगी. गद्दी रा (सूर्य देवता) के मन्दिर के प्रमुख पुजारी के बेटे देफेत को मिलेगी. फराओ भविष्य को मोडने का हर संभव प्रयास करता है. इस कथा में इडीपस और मोसेस के भाग्य की तरह ही पेचीदगी है. भाग्य के साथ छेडछाड के सारे प्रयत्न असफल होते हैं. बाद में जब महफूज सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों को उठाते हैं तब भी उनका भाग्य और नियति में यह विश्वास अंत तक कायम रहता है. पर वे कर्म को छोड़ने की बात नहीं कहते हैं कर्म के महत्व, प्रश्न करने के अधिकार को भी प्रदर्शित करते हैं. इस दृष्टि से वे भारतीय जीवन दर्शन के काफी निकट हैं शायद यह पूरे पौरस्त्य दर्शन की खासियत है कर्म के साथ भाग्य और नियति पर विश्वास. प्राचीन मिस्र के बहाने वे तात्कालिक मिस्र के उत्थान, राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष, आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति करते हैं. 1945 में 'खान अल-खलीली' के साथ वे अतीत से अपने युग की ओर लौटते हैं.

उनका 'अमाम अल अर्श' (बीफोर द थ्रोन) 1983 में प्रकाशित हुआ. अर्श खुदा के तख्त को कहते हैं. इसमें उन्होंने अनोखी शैली अपनाई है. इसमें मिस्र के विभिन्न युगों के लीडर, मिस्र के सभी शासक एक कोर्ट में जमा है और उनका मुकदमा चल रहा है. इस कोर्ट में सूर्य देवता ओसिरिस सिहासन पर बैठा है. देवी आइसिस और उनका बेटा गरुड मुखी होरस दोनों ओर बैठे उनकी सहायता कर रहे हैं. पाँच हजार साल पहले के मिस्र के संस्थापक मेनेस (अजिस फराओ ने उच्च और ननिम्न मिसे को मिला कर एक किया था) से लेकर ओटोमन से लेकर अनवर अल सदात तक सब उपस्थित हैं. इसमें अरबिक पूर्व और इस्लामिक इतिहास, आधुनिक राजनीति सबको प्रस्तुत किया गया है. लेखक प्राचीन काहिरा के नागरिक के नाते मुस्लिम दुनिया में सम्पूर्ण अरब आन्दोलन पर प्रश्न खड़े करता है. अपने आप को दो सभ्यताओं की औलाद मानने वाले महफूज के लिए मिस्र और इस्लाम दोनों सभ्यताएँ महत्वपूर्ण हैं.

इस भरे हुए कोर्ट में कवि, सूफी, औरतें, सम्राट, फराओ, राष्ट्रपति, सबको बोलने और सुनने सुनाने का हक है. सब बोल रहें हैं आरोप प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं. बहस चल रही है. परीक्षण और सुनवाई हो रही है. यहाँ हिट्टीज के खिलाफ माँग उठ रही है. फराओ रामसेस द्वितीय अपने बहुत बाद के क्रांतिकारी नासर की प्रशंसा करता है. साथ ही वह नासर को मिस्र को महत्वहीन बना देने का दोषी भी करार देता है मेनेस नसर को अरब में मिला देने का अपराधी कहता है. बारी आने पर नासर अपने उत्तराधिकारी अनवर अल सदात को मिस्र को ओपेन डोर पॉलिसी के लिए दोषी ठहराता है. इस नीति के कारण मिस्र अमेरिका के प्रभाव में आ गया और पूँजीवाद इस पर छा गया, भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया. अपने बचाव में सदात तर्क देता है. बहस के दौरान दोनों नेताओं की खूब मट्टी पलीद होती है. परंतु सदात के बचाव के लिए प्रसिद्ध फराओ एखेनाटेन आ जाता है. जबकि योद्धा फराओ रामसेस द्वितीय नासर का पक्ष लेता है. नेफेटटी भी आती है. अपने मरे हुए पति को वह अगले जीवन में पाने की इच्छा जाहिर करती है. कोर्ट में प्रश्न उठता है कि इन फराओ, सम्राटों और राष्ट्रपतियों ने सामान्य जनता के लिए क्या किया है? बाद में मेरीअमन बताता है कि उसके मन में केवल एक ईश्वर के सूक्त और नेफेटटी की सुन्दरता की प्रशंसा का भाव बढ़ रहा है.

इसी तरह 'टीचिंग ऑफ चेती' में वे बारहवें साम्राज्य से कथावस्तु उठाते हैं इसमें किताबों को जीवन के उच्च मूल्यों से जोड़ा गया है और उच्च मूल्यों को जीवन के लिए उतना ही आवश्यक बताया गया है जितना जीवन के लिए पानी महत्वपूर्ण होता है. साहित्य के लिए अरबी में अदब शब्द का प्रयोग होता है जिसका मूल अर्थ उच्च संस्कृति यानी अच्छा व्यवहार होता है. शुरु में रुमानियात (उपन्यास) भी अदब की शिक्षा के लिए विकसित हुए थे. महफूज की सर्वोत्तम कहानियाँ कैरो के मध्यम वर्ग के लिए लिखी गई हैं. और चूँकि उनकी रचनाएँ कई स्तर पर व्याख्यायित की जा सकती हैं वे कला के दायरे में आती हैं.

1985 में आने वाली उनकी किताब 'अल-ए'इश फिल-हकीका' (ड्वेलर इन ट्रूथ) एखनाटन पर आधारित है. यह उनका एक बेहतरीन उपन्यास है. इसमें वे कई वाचकों की शैली को पुन: अपनाते हैं और एखनाटन की पहचान की विख्यात पहेली को प्रस्तुत करते हैं. इस फराओ ने सूर्य और अपने पूर्वज तूतनखामन की प्रशंसा में बहुत सुन्दर सूक्त रचे थे. वह अपनी समस्त उपासना सूर्य मंडल एटन, सूर्य देवता जिसकी रश्मियाँ जो हथेलियों पर बने ऑंख ''जीवन शक्ति'' के चिह्न पर समाप्त होती हैं को समाप्त करता है. एटन प्राचीन सूर्य देवता का प्रतीक है जो सर्वशक्तिमान और सार्वभौमिक देव माना जाता है. राजा स्वयं अपना नाम बदल कर एखनाटेन (जो एटन के लिए उपयोगी है) रख लेता है और अपने नए देश को अखेटएटन, ''एटन का क्षितिज'' नाम देता है.

1947 में लिखे उपन्यास 'जकाक अल मिदक' ('मिदक ऐली) में गली को उन्होंने एक स्टेज की तरह सजाया है जिसमें रंगबिरंगे लोग हैं. मिदक ऐली का वर्णन प्यारा और पारदर्शी है. यह बहुरंगी भीड़ मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद को प्रस्तुत करती है. हालाँकि मिदक ऐली अपने आसपास के कार्यकलापों से दूर पूरे एकाकीपन में रहती है, यह अपनी एक खास और अनोखी हलचल से भरी हुई है. इस उपन्यास में मिस्र की राजधानी काहिरा का परिवेश, वहाँ की गलियाँ, जीवन शैली, रिश्ते और संस्कृति सभी कुछ जीवंत हो कर सामने आ जाते हैं. इनमें उन्होंने परम्परावादी अरब शहरी जीवन का चित्रण किया है. मूल रूप से इसकी जड़ें सम्पूर्ण जीवन से जुड़ी हैं फिर भी एक ही साथ यह गए जमाने के बहुत सारे रहस्यों को भी सीने पर रखे हुए है. इसके चित्रण का एक नमूना देखना अन्यथा न होगा, 'सूरज डूबने लगा है' और मिदक ऐली भूरी छटा की चमक में छिप रही है. अंधेरा विशाल था क्योंकि यह तीन दीवारों के मध्य एक जाल की तरह था. यह समतल रूप से सनादीकिया स्ट्रीट से उठा. इसके एक ओर एक दुकान, एक कैफे और एक बेकरी है, दूसरी तरफ एक दूसरी दुकान और ऑफिस. यह अचानक समाप्त हो जाती है, जैसे इसकी प्राचीन ख्याति समाप्त हो गई, दो साथ के घरों के संग, हरेक तीन मंजिला है.

'दिन का शोरगुल अब शांत हो गया है और शाम की आवाजें सुनाई पडने लगी हैं, एक फुसफुसाहट यहाँ, एक वहाँ': ''भीतर आओ; हमारे शाम के मिलने का वक्त हो गया है''. ''चाचा कामिल, उठो और अपनी दुकान बन्द करो! '' ''संकेर! हुक्के का पानी बदलो. '' ''जादा! चूह्ला ठंडा करो. '' ''यह हशीश मेरे कलेजे में लगती है. '' ''अगर पिछले पाँच साल से हम ब्लैक आउट और हवाई हमले का आतंक में हैं तो यह केवल हमारी कमजोरी के कारण. ''

'फिर भी गली के मुहाने पर दाहिनी ओर की मिठाई बेचने वाले चचा कामिल की और बाएँ ओर की नाई की दुकान सूर्यास्त के थोड़ी देर बाद तक खुली रहती है. यह चचा कामिल की आदत और अधिकार है कि वे अपनी दुकान के सामने कुर्सी डाल कर उस पर सो जाते हैं अपनी गोद में... वे वहाँ तब तक रहते हैं जब तक कि कोई ग्राहक उन्हें न पुकारे अथवा नाई अब्बास उन्हें तंग करता हुआ जगा न दे. वे काफी तगड़े आदमी है, उनका लबादा उनकी तने जैसी टाँगों को दिखाता है उनका पिछवाड़ा मस्जिद के गुम्बद की तरह बड़ा और गोल है जिसका बीच का हिस्सा कुर्सी पर रहता है बाकी इसके किनारों से बाहर फैला पड़ता है. उनकी तोंद तुम्बे जैसी है और उनकी छातियाँ बड़ी उभरी हुई हैं. गर्दन तो दिखती ही नहीं है. उनके कंधों और फूले हुए लाल और गोल चेहरे के बीच सांस लेने के बीच गायब हो जाती है. नतीजतन फलक पर मुश्किल से एक लकीर दिखती है लगता है उनकी न तो नाक है न ऑंखें. इस सबके ऊ पर उनका छोटा, गंजा सर है जिसका रंग उनकी पीले पर चमकीली चमडी से अलग नहीं है. वे सदा हाँफता रहते हैं और सांस फूली रहती है मानो अभी अभी रेस दौड कर आ रहे हों. वह शायद ही कभी मिठाई बेचने का काम पूरा कर पाते है उससे पहले नींद आ जाती है. लोग उन्हें कहते हैं कि वे जल्द ही मर जाएंगे क्योंकि चर्बी उनके दिल पर चढ़ रही है. वे इस बात से हमेशा राजी होते है. पर मौत उसका क्या नुकसान कर पाएगी जो सदा एक लम्बी नींद में है? '

'नाई की दुकान छोटी है फिर भी गली में खास मानी जाती है. इसमें एक आईना है और एक कुर्सी तथा नाई के काम के औजार. नाई दरमियाने कद का आदमी है, पीले रंग का थोड़ा भारी. उसकी ऑंखें जरा उभरी हुई हैं और भूरी चमडी के बावजूद उसके लहरदार बाल पीले रंग के हैं. वह सूट पहनता है और कभी बिना एप्रन के बाहर नहीं जाता है; शायद ज्यादा फैशनेबल हेयरड्रेसर्स की नकल में. एक गली का सरल भाषा में जीता जागता वर्णन.

उन्हें एक पत्रकार ने बताया था कि जब उनके नाम की घोषणा नोबेल पुरस्कार के लिए हुई तो सन्नाटा छा गया. क्योंकि उनके अपने देश के बाहर उन्हें बहुत कम लोग जानते थे. हिन्दी वालों का भी दुर्भाग्य है कि अधिकाँश लोग उनके नाम और काम से परिचित नहीं हैं. जबकि हमारे देश में अरबी जानने वालों की कमी नहीं है. मैं अपने एक उर्दु दाँ मित्र से बात कर रही थी उनके अनुसार उर्दु वाले भी महफूज के जानिब कुछ खास नहीं जानते हैं. हाँ भाषाओं को लेकर जो आइसोलेशन की स्थिति है और अनुवाद को दोयम दर्जे का कार्य मानने की हठधर्मी है वह इसका कारण अवश्य है. हर भाषा-भाषी यह गलतफहमी पाले हुए है कि बस उसकी भाषा और उसका साहित्य महान है. या फिर शायद जानबूझ कर उनका बॉयकॉट कर रखा है. उनकी मृत्यु पर हिन्दी की अधिकाँश पत्रिकाएँ चुप्पी साधे रहीं. कुछ एक पत्रिकाओं ने एक पंक्ति में सूचना मात्र दी.

जहाँ पाब्लो नेरुदा अपनी जन्मभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए देश-विदेश भटकते रहे, दुनिया-जहान की खाक छानी, लम्बी-लम्बी यात्राएँ कीं वहीं महफूज ने अपनी धरती पर रह कर ही वहाँ का चित्रण किया. उन्होंने अपना जन्म स्थान कैरो एकाध अनिवार्यता के अलावा कभी नहीं छोड़ा. उन्होंने कभी लम्बी-लम्बी यात्राएँ नहीं कीं और तो और वे अपने घर से बाहर निकलना भी शायद ही कभी पसन्द करते थे. वे पैदल चलना पसन्द करते थे और हर शुक्रवार को खास तौर पर अपने दोस्तों से मिलने कैफे में अवश्य जाते थे. समय के इतने पाबन्द थे कि सबको मालूम था कि वे शुक्रवार को शाम साढे छ: बजे घर से निकलते हैं और इसी का फायदा उठाते हुए कट्टरवादियों ने उन पर हमला किया था.

मिस्र और अरबीदेशों के बाहर बहुत कम लोग महफूज और उनके काम से परिचित थे अत: अपने नोबेल भाषण में बहुत विनीत हो कर वे अपना परिचय देते हैं. यह परिचय वे अपने जन्म और कार्य के लेखाजोखा से नहीं देते हैं. उनका यह भाषण उच्च स्तर के साहित्य का एक नायाब नमूना है. वे कहते हैं, ''मैं दो सभ्यताओं के मिलन का पुत्र हूँ. '' इन सभ्यताओं का इतिहास के किसी मोड पर कभी मिलन हुआ था. इनमें से एक फराओ कालीन सभ्यता सात हजार साल पुरानी सभ्यता है और दूसरी इस्लामिक एक हजार चार सौ साल पुरानी सभ्यता. वे आगे कहते हैं कि इन दोनों सभ्यताओं से आप विद्वत जन परिचित हैं परंतु फिर से याद दिलाने में कोई हानि नहीं है.

अपने नोबेल भाषण में आगे वे फराओ सभ्यता की इमारतों और लड़ाइयों की बात वे नहीं करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि इस बीते हुए गर्व की बात करना आज के आधुनिक युग में खास मायने नहीं रखता है. न ही वे बात करते हैं कि पहले-पहल कैसे खुदा के अस्तित्व की ओर इसने गाइड किया और मनुष्य के चेतन में उतरा. वे पैगम्बर मोहम्मद की बात नहीं बताते हैं. न ही इस महान सभ्यता में हुई साहित्य, वास्तुकला और चमत्कारों पिरामिडों या फिनिक्स और कारनाक की बातें करते हैं. वे ऐतिहासिक दस्तावेज से उठा कर एक घटना सुनाते हैं जिसमें उनके कथाकार बनने के बीज छुपे हुए थे. बताते हैं कि फराओ को अपने हरम की छ: औरतों और उनके कोर्ट के कुछ आदमियों के पापपूर्ण संबंधों की जानकारी हुई. उस काल के नियमानुसार इन लोगों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए था. परंतु उसने ऐसा नहीं किया बल्कि कानून के जानकारों के सामने समस्या रख कर उन्हें इसकी खोजबीन करने के लिए कहा. वह सच्चाई जानना चाहता था ताकि वह न्याय कर सके. सच्चाई जानने की यही ललक महफूज के लेखन का रहस्य है. फराओ का यह व्यवहार महफूज की नजरों में एक साम्राज्य कायम करने या पिरामिडों का निर्माण करने से बढ़ कर है. यह उस सभ्यता की उच्चता को दर्शाता है. वे कहते हैं वह सभ्यता समाप्त हो गई. एक दिन महान पिरामिड भी समाप्त हो जाएँगे परंतु जब तक मनुष्य के पास चिंतनशील मस्तिष्क और एक जाग्रत चेतना है तब तक सत्य और न्याय जीवित रहेंगे. इनके लिए मनुष्य की खोज जारी रहेगी.

इसी तरह वे इस्लामिक सभ्यता के सिद्धांतों स्वतंत्रता, समानता औ