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February 5, 2007

कहानी : गुरूदेव


-अविनाश

गुरुदेव ने पहले ही दिन कहा था, 'बेटा बतकही के चक्कर में जिस दिन पड़े_ख़बर का मर्म भूल जाओगे.' उन्हें लगता था कि लड़का नया-नया है और जल्दी ही न्यूज़ रूम के लोग इसे हड़प लेंगे.

गुरुदेव अच्छे आदमी हैं. वे अच्छे इसलिए हैं, क्योंकि वे खुद मानते हैं कि पत्रकारिता में अब उनके जैसे लोग नहीं बचे. अपनी भाषा, अपनी समझ पर खुद उन्हें ही बहुत फख्र है. उन्हें इस बात का भी फख्र है कि न्यूज़ रूम के लोग भी ऐसा समझते हैं. हर मुश्किल वक्त में उनको सेनापति बनाया जाता है.
लेकिन न्यूज़ रूम के लोग कहते हैं कि यह मुश्किल वक्त पिछले कई सालों से नहीं आया है. जब से यह ख़बरिया चैनल 24 घंटे का हुआ है, तब से तो एकदम नहीं.

लेकिन अतीत की भव्यता से ही वह इतने खुश रहते हैं कि लगता है कि सब कुछ जैसे बस कल शाम का ही क़िस्सा है. हालांकि यह क़िस्सा दूसरों के लिए रहस्य ही है. पत्रकारिता में नए पौधे उग आए हैं. जिन्हें वह किस्सा याद है और जो गुरुदेव के दोस्त-मित्र रहे हैं, वे ऊंचे ओहदों पर हैं_उन्हें गुरुदेव के अतीत की चर्चा करने की फुर्सत नहीं.
लेकिन जैसा कि सूत्र बताते हैं, वे बड़े लोग जब कभी खाली होते हैं और उनका मन उन ख़बरों की ख़बर लेने का होता है, तब वे गुरुदेव की चर्चा ज़रूर करते हैं. वे सब मानते हैं कि गुरुदेव की चर्चा में बड़ा आनंद है. फ़िल्मी दुनिया के किसी गॉशिप से भी ज्यादा.

लेकिन यह सब गुरुदेव का परिचय नहीं है. उनका परिचय है उनका नाम. किसी अच्छी कहानी और बुरे-से-बुरे जीवन की शुरुआत भी नाम और गोत्र से होती है.
गुरुदेव का नाम है 'के'. उनका नाम कभी सिर्फ़ 'क' हुआ करता था. इसी 'क' नाम से उन्होंने अपना पूरा बचपन काटा. मधुबनी में कमला बलान के किनारे सुनसान रेत पर बैठकर घंटों यह सोचते रहे कि वे इस पूरे ज़िले के कलक्टर हैं.
फिर जब पटना के महेंद्रू में वे कुछ दोस्तों के साथ एक कमरा शेयर करके रहते थे, उस वक्त भी उनका नाम 'क' ही था. उन्हीं दिनों पटना से निकलने वाले आर्यावर्त में संपादक के नाम चिट्ठी लिखा करते थे. उन दिनों को याद करते हुए वे मानते हैं कि वे महज चिट्ठियां नहीं, उस समय की राजनीति, संस्कृति और समाज के संक्षिप्त दस्तावेज़ हैं.
बाद में गुरुदेव 'क' नाम के साथ ही दिल्ली आ गए और डीयू में उन्होंने एडमिशन ले लिया. यहीं बढ़ती उम्र के साथ उन्हें यक़ीन हो गया कि ज़िले का कलक्टर बनना उनके बस में नहीं.

गुरुदेव कहते हैं, 'दिल्ली में भाषा उनके साथ आई.'
ऐसी भाषा, जिसमें मिट्टी की खुशबू भरी हुई थी. आर्यावर्त के लिए चिटि्ठयों के जरिए जिस क़िस्म की भाषा का रियाज़ हुआ, वह तो था ही. इसी खुमारी में एक दिन गुरुदेव 'दरबारे दिल्ली' नाम से निकलने वाले अख़बार के दफ्तर पहुंच गए.
उस समय अख़बारों में जो लोग काम करते थे, उनमें आज की तरह का दर्प नहीं था. वे कम ही प्रतीक्षा करवाते थे और आगंतुकों से आदमी की तरह मिलते थे. फिर वह आगंतुक नौकरी के सिलसिले में ही क्यों न आया हो. और गुरुदेव आज की तरह नौकरी की तलाश में भटकने वाले लौंडे-लपाड़े तो थे नहीं, जो ज़िंदगी की तमाम दूसरी जंग हारकर मीडिया में भाग्य आजमाने चले आते हैं. उनके पास इतनी प्रतिभा तो थी ही कि वे एक पूरा वाक्य लिख पाएं. हालांकि उनका यह अफसोस कभी-कभी अब भी छलक जाता है कि पूरा एक वाक्य लिखने की प्रतिभा के सहारे वे किसी ज़िला के कलक्टर नहीं बन सके.
गुरुदेव को 'दरबारे दिल्ली' में नौकरी मिल गई. उप-संपादकी करते हुए उन्होंने संपादक के चेंबर में लगातार हाज़री लगाई...और एक दिन उनसे अपने लिए अपराध बीट ले ही लिया.

अपराध बीट. इस बीट में दूसरे क़िस्म का रुतबा था. पुलिस से जान-पहचान और अपराधियों के बीच क्रेज भी. वे अपराधी जो बाद में राजनीति की राह पकड़ने वाले थे, गुरुदेव से सांठगांठ बनाए रखते. कभी दफ्तर के बाहर आकर उन्हें बुलाते...और पांव छू कर उनकी कृपा मांगते, तो गुरुदेव गदगद हो जाते. वे कहते हैं कि तब उनकी आंखों से आंसू बहने लगते थे. वे नहीं जानते थे कि लोग उनसे इस क़दर प्यार करते हैं और उनका इतना सम्मान करते हैं.
उस वक्त एक दूरदर्शन हुआ करता था, जिस पर दिन में इक्का-दुक्का समाचार के बुलेटिन थे और उसमें नौकरी सरकारी हुआ करती थी. लेकिन अब चूंकि अख़बार में काम करते हुए दस लोगों के बीच गुरुदेव सरकार को गाली भी दे लेते थे, और सोच भी नहीं पाते कि दूरदर्शन के लिए समाचार ला, कह और दिखा पाएंगे.

संयोग से उन दिनों हिंदी की एक संघसमर्पित समाचार पत्रिका ने एक बड़े जनवादी पत्रकार के साथ अनुबंध किया...और दूरदर्शन पर आधे घंटे के एक न्यूज़ बुलेटिन का स्लॉट ख़रीद लिया. गुरुदेव लपक के पहुंचे और चूंकि वहां पत्रकारों की ज़रूरत थी और गुरुदेव अब तक ज़रूरत भर पत्रकार हो गए थे, उन्हें रख लिया गया.
जिस दिन उनको काम करने की चिट्ठी थमाई गई, उस रात वे सो नहीं सके. सपने में उन्हें मधुबनी की वह गली याद आई, जिसमें वे गुनाहों के देवता बने घूमते और किसी सुधा को अपनी सूरत दिखाने और उसकी सूरत देखने के लिए ताक-झांक किया करते थे. सालों से उनके स्वप्न में एक कर्फ्यू-सा जो लगा था, वह हट गया था.
सपने में उन्होंने देखा कि शहर में चहल-पहल है और इस चहल-पहल के बीच बहुत सारे लोग उनकी तरफ़ हसरत से देख रहे हैं. जैसे कह रहे हों_'क' ज़िंदाबाद!!!

अचानक उन्हें याद आया कि अरे...अब उनका 'क' कहां?
'दरबारे दिल्ली' में काम करते हुए उन्हें एक बार चंद्रास्वामी से मिलने का मौक़ा मिला. वे पांव पर ऐसे गिर गए, जैसे लंबी तपस्या के बाद कोई बड़े देवता सामने प्रकट हो गए हों. चंद्रास्वामी ने उनकी ललाट पर हाथ फेरा और अपने बाएं हाथ से एक हीरे की अंगूठी निकालकर गुरुदेव के दाहिने हाथ में रख दी.
गुरुदेव ने कहा, ''बस्स...अब आप ही हमारे भाग्य विधाता हैं.''
चंद्रास्वामी ने कहा, ''नाम बदल लो, करोड़ों की दौलत तुम्हारे दरवाज़े पर होगी.''
गुरुदेव ने कहा, ''आप ही कोई नाम दे दें स्वामी.''
चंद्रास्वामी ने कहा, ''आज से तुम्हारा नाम 'क' नहीं 'के' होगा.''

तब से आज तक गुरुदेव को लोग 'के' नाम से जानते हैं. कइयों को अटपटा लगता है कि ये नाम तो हिंदुस्तान में पाया नहीं जाता. वे पूछते हैं तो गुरुदेव हत्थे से उखड़ जाते हैं. कहते हैं, ''औकात में रहकर बात करो. तुम जानते ही कितना हो हिंदुस्तान को?'' लेकिन जब उनका कोई समकालीन पूछता है, तब वे अपने नाम से जुड़ी कोई कहानी गढ़ने की कोशिश करते हैं और हकलाते हुए नामकरण की काल्पनिक कहानी कहने की कोशिश करते हैं.
जब अख़बार छोड़कर गुरुदेव ने टीवी की नौकरी पकड़ी, तो वेतन मिला बीस हज़ार रुपए. इतना वेतन उनके ज़िले के कलक्टर को भी नहीं मिलता था. उन्हें लगा कि अब वे अपने गांव में एक तालाब खुदवा सकते हैं और उसके महार पर एक शिलालेख लिखवा सकते हैं_'क'...नहीं-नहीं...'के' की कृपा से यह तालाब हमारी मातृभूमि को सप्रेम भेंट.

लेकिन अब गुरुदेव उस चैनल की नौकरी करते हैं, जहां मैं थोड़े ही दिनों पहले आया हूं. 24 घंटे के इस चैनल में चार घंटे काम करने के एवज में गुरुदेव को दो लाख रुपए मिलते हैं. हालांकि शिफ्ट आठ घंटे की होती है, लेकिन चूंकि गुरुदेव मालिक से मिल मिलाकर रहते हैं_इसलिए और सिर्फ़ इसलिए चार घंटे उन्हें शहर में घूमने, स्मोकिंग ज़ोन में बतकही लड़ाने और किसी नेता और अतीत के अपराधी के साथ महंगे रेस्तरां में खाने-पीने की छूट मिली रहती है.
...और दरअसल गुरुदेव की कहानी यहीं से शुरू होती है. इसी चैनल से. इससे पहले तो उन्हें इस लायक भी नहीं समझा जाता था कि उनकी कहानी किसी से कही सुनाई जाए.

गुरुदेव कहते हैं कि उन्हें इस चैनल में लाया गया था आउटपुट हेड बनाकर. आउटपुट का काम टीवी में सबसे रुतबे का होता है. वे किसी ख़बर के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं. किसी रिपोर्टर की ख़बर पांच बार ऑन एयर कर सकते हैं और चाहें तो एक बार चलाकर हमेशा के लिए गिरा सकते हैं. यह तय कर सकते हैं कि हेडलाइन क्या-क्या होगी.
लेकिन अब गुरुदेव को अक्सर यह कहते हुए सुना जाता है कि वे राजनीति के शिकार हुए. रिपोर्टरों से लेकर ख़बर जमा करने वाले और आउटपुट को उन ख़बरों की थैली थमाने वाले इनपुट डेस्क के एक आदमी ने उनके साथ राजनीति की.
और जैसा कि गुरुदेव बताते हैं यह वही आदमी है, जिसे उन्हीं के कहने पर रखा गया.

लेकिन बाद के दिनों में हुआ यह कि मालिक के आगे-पीछे करने में वह गुरुदेव का उस्ताद निकल गया और एक दिन आउटपुट की उस्तादी गुरुदेव से छीनकर उसे दे दी गई. गुरुदेव सामान्य रिपोर्टर बना दिए गए. हालांकि वे ऐसा नहीं मानते. मानते हैं कि वे इस चैनल के ज़रूरी संवाददाता हैं और उनके बिना इस चैनल का काम नहीं चल सकता.
इन दिनों गुरुदेव महीने में कुछ ख़बरें यह कहकर आउटपुट को देते हैं कि एक्सक्लूसिव है, किसी के पास नहीं है_और जब उनकी बात को हँसी में उड़ा दिया जाता है, तो वे स्मोकिंग ज़ोन में यह कहते हुए नज़र आते हैं कि चैनल डूब रहा है.
ऐसा नहीं है कि गुरुदेव बस यूं ही गुरुदेव हैं. उनकी किस्मत भी कई बार साथ दे देती है. साथ का मतलब यह कि उन्हें कोई आइडिया कहीं से मिलता है, तो वे तुरंत मालिक के पास पहुंच जाते हैं.
ऐसे ही एक दिन वे मालिक के पास पहुंचे. आइडिया दिया, सदी का पहला गीत ढॅ।
उसके बाद यह गीत पूरे न्यूज़ रूम की ज़बान पर चढ़ा और टीवी की भाषा में कहें, तो हमने कई दिनों तक इस गाने को खूब खेला.

पहली बार जब हमने पर्दे पर ठुमकते दृश्यों के बीच उस गीत के बोल सुने_हम उतने तन्मय नहीं हुए_जितने गुरुदेव की इस करामात के बाद. लगा कि पूरा देश वही गीत गा रहा है.
चैनल से लौटते हुए जब पान की दुकान पर खड़े हुए, तो रेडियो एफएम के साथ ज़बान लड़ाते पनवाड़ी को देखकर मज़ा आ गया. वही गीत था_मगर पान की लाली में भीगा हुआ.
'कजरारे कजरारे तेरे कारे कारे नैना.'
पहली बार गुरुदेव के प्रति श्रध्दा हुई.
खुसरो के उस गीत की लरजती हुई लय याद आ गई.
'न नींद नैना न अंग चैना न आप ही आवें न भेजें पतिया.'
आज शायद ही विरह का वह मसला हमारे ज़ेहन में हो. पास में मोबाइल है और सारी दूरियां सिमटकर बांहों के घेरे में आ गई हैं.

बदलती हुई दुनिया में गुरुदेव की यह खोज क्लिक कर गई और पूरा न्यूज़ रूम उनकी वंदना करने लगा.
हमने भी कॉलर टोन रिसीव किया. हमारे मोबाइल में गूंज उठा_'कजरारे कजरारे तोरे कारे कारे नैना.'
नई सदी के पहले गीत की खोज का खुमार इस कदर चढ़ा कि गुरुदेव और आक्रामक हो गए. वे अब किसी मुगलिया सल्तनत के सुल्तान की तरह न्यूज़ रूम में घुसने लगे. पहले भी वे कुछ इसी अंदाज़ में जीते रहे हैं लेकिन अब उनके आने में एक लचक है, जो लोगों को अपनी तरफ़ खींचती है.
देश में लोकतंत्र पर ज़रा-सा कोहरा छाता है और उस वक्त अगर गुरुदेव ओबी स्पॉट पर होते हैं, तो लगभग चीखने लगते हैं.
कहते हैं, ''यह चीख जनता की चीख है और तब तक गूंजती रहेगी, जब तक लोकतंत्र के दुश्मन पस्त नहीं हो जाते.''
लेकिन इन दिनों वे राज दरबारों के क़िस्से सुनाने लगे हैं. एक बार हिमाचल के राजकुंवर के साथ उन्हें नाश्ते का मौक़ा मिला_उसका वृतांत.

''मुश्किल से राजकुंवर ने दो-तीन शब्द कहे और इतनी नफ़ासत से पेश आए कि क्या कहना.''
गुरुदेव इस बात पर मुग्ध थे कि नाश्ता करते हुए राजकुंवर ने उन्हें चार बार भर आंखों से देखा. और दुखी इस बात से कि पुरानी राजशाही की तासीर, चलने का सलीका और बड़ों के मान का वह संस्कार नए ज़माने में बिल्कुल ही नहीं बचा. वे खुश थे कि उन्होंने राजकुंवर के साथ नाश्ते के दौरान इसका निर्वाह किया. जब भी राजकुंवर कुछ पूछते, गुरुदेव तपाक से कहते, 'हुजूर!'
एक बार दरभंगा महाराज के वंशज ने उन्हें खाने पर बुलाया. एक तलवार भेंट की. वे चाहते हैं कि इस चैनल के न्यूज़ रूम में इस तलवार को कहीं टांग दें.

फ़िलहाल तलवार उनके शयनकक्ष की शोभा है. अब बीवी इसी बात से खफ़ा रहती है. ऐसा भी कहीं आदमी हुआ है. एक तो देर रात घर आते हैं_पी-पिला कर. बिस्तर पर बिखर जाते हैं...और एकटक तलवार को देखते रहते हैं.
सुबह की चाय का भाप कानों में जाता है तो नींद खुलती है_लेकिन आंखों को बस तलवार की धार चाहिए. बीवी की सूरत पर समय की झुर्री पड़ रही है.
गुरुदेव लेकिन महफिल के शौकीन हैं, और जब भी घर से निकलते हैं...दाढ़ी में खिज़ाब चाहिए.
बीवी तब से कुछ नहीं कहती, जब से गुरुदेव ने उन्हें कमरे में बंद कर भर दम पीटा.
बात बस इतनी थी कि गुरुदेव के मोबाइल पर एक लड़की का अश्लील एसएमएस पढ़कर उसके बारे में सवाल-जवाब कर दिया था.

बीवी पूरे छह महीने तक अस्पताल में पड़ी रही. गुरुदेव ने पूरे छह महीने दिन-रात बीवी की सेवा की, लेकिन उस हादसे के बाद बीवी की खामोशी अब तक नहीं टूटी है.
गुरुदेव इस बात से परेशान रहते हैं, या सुखी_घर में किसी को नहीं पता. न उनके नौकर को, न बच्चों को. क्योंकि घर में अब भी तलवार ही निहारा करते हैं.
अब लेकिन गुरुदेव की सांस उखड़ने लगी है. दमा उन्हें बेदम किए रहता है. वे देखते हैं कि इतना ऐश्वर्य और इतने पैसे के बाद भी लोग उनसे बच रहे हैं. गांव का कोई आदमी उनके पास नहीं आता. एक बार आया था उनका चचेरा भाई, उन्होंने घर के राशन की लिस्ट थमा कर मंगल बाज़ार भेज दिया था. गांव से एक नौकर मंगवाया, और दो साल बाद जब वह वापस गया तो लकवा लेकर गया.

अब वे अकेले हैं. घर में भी, अपनी कार में भी और न्यूज़ रूम में भी.
आते हैं. मशीन से चाय निकालते हैं. टी बैग डुबोते-डुबोते कंप्यूटर ऑन करते हैं. देखते हैं हज़ारों हज़ार इनहाउस मेल अपने क़त्ल के इंतज़ार में उनके इनबॉक्स में पड़े हैं. वे ग़ौर करते हैं कि इस बीच किसी ने उनसे दुआ-सलाम नहीं की. वे तड़प कर रह जाते हैं और प्रतिशोध की एक हल्की-सी चिंगारी दिल के किसी कोने में भड़क उठती है. उन्हें लगता है इस न्यूज़ रूम को आग लगा देनी चाहिए. वे कंट्रोल ए से सारे मेल सलेक्ट करते हैं और कंट्रोल शिफ्ट डी से सारे मेल उड़ा देते हैं.
अचानक उनकी नज़र कैलाश पर पड़ती है. कैलाश सिर नवाए उनके सामने खड़ा है.
वे पूछते हैं, ''और कैली, क्या सब चल रहा है?''

टीवी में सबका नाम छोटा करके पुकारने का चलन बन गया है. जैसे प्रियदर्शन नाम है, तो पीडी पुकारेंगे. चंद्रप्रकाश नाम है, तो सीपी पुकारेंगे और संदीप नाम है तो सैंडी पुकारेंगे. इसी तरह कैलाश को न्यूज़ रूम में लोग कैली कहकर पुकारते हैं.
मैं जब शुरू-शुरू में इस चैनल में आया था, तो बहुत दिनों तक यही समझता रहा कि इसका नाम कैली ही है. लेकिन वक्त क़े साथ असल का पता तो चल ही जाता है.
कैली ने मुस्कराकर कहा, 'सब ठीक है'
''और चैनल में क्या चल रहा है?''
कैली कहता है, ''चलेगा क्या, सब बकवास. कोने में चलिए, कुछ और बताता हूं!''
फिर वह गुरुदेव से कहता है, 'यहां किसी को ख़बर से खेलना नहीं आता. या तो क्रिकेट के पीछे लगे रहते हैं या सिनेमा के पीछे. किसी को देश की फिक्र नहीं.''

फिर कैली उन्हें बताता है कि आजकल बॉस किसके साथ सांठगांठ में हैं, किस पर मेहरबान हैं और किसको डंडा किया जा रहा है.
गुरुदेव इसी बात से कैली से खुश रहते हैं. उन्हें लगता है कि पूरे न्यूज़ रूम में कैली ही उनका खैरख्वाह है.
वे कैली को अपनी कार में बिठाकर चैनल से बहुत दूर ले जाते हैं. सड़क के किनारे खड़े होकर कुल्फी खिलाते हैं और कहते हैं, 'देखो, मैं अब भी सड़क से कितनी मोहब्बत करता हूं. सड़क के किनारे के ठेले मुझे अपनी ओर खींचते हैं. पुराने दिनों की याद दिलाते हैं.'
और जब वे नोएडा की सड़कों पर कैली को टहलाते हैं, तो दीवार पर गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज बताने वाले नीम-हकीमों के पोस्टर दिखाते हुए कहते हैं कि मुल्क की नब्ज़ इन्हीं नीम-हकीमों के हाथों में है.
उन्हें लगता है कि उन्होंने कोई ऐसी बात कह दी है, जो सिर्फ़ वही कह सकते हैं.
उनका मूड बन रहा है. वे कैली से कहते हैं, ''आज की रात तुम्हारे नाम.''
कैली कहता है, ''सर ये कुछ ज्यादा नहीं हो जाएगा.''

गुरुदेव कहते हैं, ''छोड़ो भी. हम सब ज़लावतन में हैं. रात-दिन की फिक्र मत किया करो. हमारी सोहबत किसी-किसी को नसीब होती है.''
कैली की जैसे सांस अटक रही है, लेकिन वह अपना दु:ख बयान करने की हालत में नहीं है. मालिक अब भी गुरुदेव की कोई-कोई बात मान लेते हैं.
रात के दो बजे हैं. नोएडा की एक सड़क के किनारे गुरुदेव नीम बेहोशी में चित्ता लेटे हैं. उल्टी चारों ओर फैली हुई है. उम्दा शराब की बेकाबू गंध हवा में उड़ रही है.
कैली गुरुदेव की कार के अंदर बैठकर फूट-फूटकर रो रहा है.

वह एक औसत प्रतिभा का लड़का गांव से शहर आया था. यहां उसने सब कुछ करने की कोशिश की. सेल्समैनशिप से लेकर दलाली तक. लेकिन कहीं ठौर नहीं मिल पाया. एक दिन क़िस्मत के सांढ़ की तरह इस नंबर वन चैनल में आ गया. और यहां कभी इनके तो कभी उनके चरण छूकर अब तक अपनी नौकरी बचा रहा है.
लेकिन आज उसे अपनी ज़िंदगी गलीज़ लग रही है. हालांकि हादसे इससे भी बड़े-बड़े जब-तब हुए. और यह तो कोई हादसा भी नहीं. हफ्ता दस दिन पर दारू पीकर सड़क के किनारे गुरुदेव के लुढ़कने का वह सबसे अधिक साक्षी रहा है.
...पर आज पता नहीं क्यों उसे गांव की याद आ रही है. उस बूढ़ी मां की याद, जिसे उसने हर महीने कुछ पैसे भेजने का भरोसा दिया था और शहर आकर पूरी कमीनगी से भूल गया था.
दूसरे दिन वह सुबह छह बजे घर पहुंचे और पूरे दिन बिस्तर पर मुर्दा की तरह पड़े रहे. दोपहर तीन बजे आंख खुली, तो मालिक के नंबर से पचास मिस्ड कॉल देखकर उन्हें होश आ गया. उन्हें याद आया कि दोपहर दो बजे से संसद भवन पर उसकी ओबी रखी गई है.

सालों बाद एक सपना उनके आगे सच की झोली फैलाए खड़ा था. हालांकि इससे पहले भी ऐसे छोटे--मोटे मौक़े उनके जीवन में आए थे, लेकिन हर बार वे अपनी बेवकूफी, अपने शाही अंदाज़ और अपनी कछुआ चाल की वजह से वह मौक़ा खोते रहे.
एक बार फिर वही हादसा दरपेश था. वे फौरन सौ सवा सौ की रफ्तार से चैनल पहुंचे, मालिक ने सीधे कमरे में बुलाया. थोड़ी देर बाद अंदर से एकतरफ़ा चीख ने न्यूज़ रूम को दहला दिया.
हालांकि न्यूज़ रूम में यह रोज़ का किस्सा है और रोज़ ही न्यूज़ रूम दहलता रहता है_लेकिन यह चीख इसलिए सबसे अलग थी क्योंकि यह गुरुदेव के ख़िलाफ थी. लोग खुश थे कि यह दर्प की इमारत के
सब यह देखना चाहते हैं कि मालिक के चैंबर से गुरुदेव कौन-सा मुंह लेकर निकलते हैं. अब तक तो उन्होंने खिज़ाब में छिपे हुए पुरसुकून चेहरे को ही देखा था_लेकिन आज उसी चेहरे से झड़ते हुए खिज़ाब को देखने का इंतज़ार है.
थोड़ी देर में गुरुदेव निकले तो उनके चेहरे पर स्याह परतों का नामोनिशान नहीं था, जिसकी उम्मीद में न्यूज़ रूम लगातार सनसना रहा था.

चार कदम बढ़ते ही वे हँसे. लगभग अट्टहास की तरह. कैली को पास बुलाया. लगा जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं था.
कैली लपक कर उनके पास पहुंचा.
लोगों ने कैली के पास खड़े गुरुदेव को यह फुसफुसाते हुए सुना कि उनकी मां डुमरांव स्टेट के खजांची की बेटी थी और पिता बड़े ज़मींदार. वे ज़िला कलक्टर नहीं हुए तो क्या_मीडिया में उनका सानी ही क्या है?
कैली कल की तरह ही मुस्करा रहा था. न्यूज़ रूम में सब इस वार्तालाप से हैरान होना चाह रहे थे, लेकिन तभी एक ब्रेकिंग न्यूज़ ने सबकी तंद्रा भंग कर दी.
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रचनाकार - अविनाश पत्रकारिता के साथ कविता करते रहे हैं, यह उनकी पहली कहानी है जिसे उन्होंने हंस के टीवी मीडिया विशेषांक ले लिए खास तौर पर लिखा है. अविनाश हिन्दी के उभरते चिट्ठाकारों में से एक हैं. इनका चिट्ठा है - मोहल्ला . संप्रति एनडीटीवी में आउटपुट एडिटर.

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चित्र - केनवस पर तैलरंग से बनाई गई रेखा की कलाकृति.

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1 प्रतिक्रियाएँ.:

Divine India said...

अविनाश जी को पहली कहानी के लिए ढेरों बधाइयाँ…
कहानी बिल्कुल सत्य को दर्शाती है…वैसे भी पटना से पढ़े 95% नौजवान IAS की तैयारी में ही दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में आते है और शायद मुझसे अधिक इसके बारे में कोई और क्या जानकारी रखेगा…।IAS में असफल या तो कोचिंग चलाते है नहीं तो पत्रकारिता में…मेरे भी एक गुरुदेव की कथा विल्कुल इससे मिलती है…।

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