व्यंग्य : चुंबन लो, पैसे दो
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व्यंग्य
चुंबन लो, पैसे दो
- यज्ञ शर्मा
दिल्ली में एक नियम लागू होने वाला है- जो भी सार्वजनिक स्थान में चुंबन लेगा, उसे 500 रुपये दंड भरना पड़ेगा। यह कानून लागू हो गया तो दिल्ली में क्या हुआ करेगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
दृश्य 1:
लोदी गार्डन में नौजवान जोड़ा बैठा है। जोड़ा समझता है कि झाड़ी की ओट में किसी को कुछ नहीं दिखता। बड़ी भारी गलतफहमी में है। हमारी पुलिस की एक खासियत है। खुलेआम होता कारनामा उसे भले ही न दिखे, ओट में होने वाला हर काम उसे साफ दिखता है। इधर नौजवान जोड़ा नजदीक आया, उधर पुलिसवाला हाजिर हो गया, 'के हो रया है?' 'बैठे हैं, सिपाही जी।' 'बैठ्ठा है कि चुम्मा ले रया है? चल 500 रुपैया निकाल।' 'पर, हमने तो कुछ नहीं किया।' 'नहीं करया तो झाड़ी के पिच्छे के करणे बैठा है? खुल्ले में बेंच पे के नहीं बैठ्ठा? 500 रुपैया निकालता है के ले चलूं थाणे?' 'मेरे पास 500 नहीं है।' 'कित्ते हैं?' '100।' 'चल दे दे।'
दृश्य 2:
लोदी गार्डन। खुली जगह में लगी बेंच पर नौजवान जोड़ा बैठा है। एक पुलिसवाला उनके पास आया, 'ये के हो रया है?' 'बैठे हैं, सिपाही जी।' 'इधर खुल्ले में बैठ के तू के कर सके है, रे? जा, उधर झाड़ी के पिच्चे बैठ जा।' 'ना जी, उधर नहीं बैठना। कल बैठे थे तो 100 रुपये भरने पड़ गये।' '500 की जगह 100 ई भरे, चार सौ तो बचे न।' 'पर रोज के 100 रुपये तो भारी पड़ जाएंगे, जी। इसलिए, हमने सोचा है कि अब चुंबन शादी के बाद ही लेंगे, अपने घर में।' 'अरे, तै घर में चुंबन लेगा तो म्हारा के होएगा? मने तो पैसे खिला के इधर की पोस्टिंग मिली है। तू घर में चूमेगा तो मेरी वसूली कैसे होवेगी?... एक काम कर, मैं तनै कंसेसन दे दूंगा। चाहिए तो महीने का रेट फिक्स कर ले। जा, झाड़ी के पिच्छे बैठ्ठ जा और चुम्मा ले, बेखटके।'
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दृश्य 3:
लोदी गार्डन में नौजवान जोड़ा बेफिक्र हो कर बैठा है। चुंबन रेट तय हो चुका है। पुलिसवाला डायरी लेकर पास आया, 'कित्ते हो गये रे?' 'तीन, सिपाही जी।' 'झूठ मत बोल। पांच हुए हैं, मैंने खुद गिणे हैं।' 'अरे नहीं सिपाही जी, तीन ही लिये, सच्ची।' बहस तीन-पांच पर अटक गयी। पुलिस वाला जल्दी में था। उसे और भी कई जोड़ों का हिसाब करना था। झिकझिक में समय खराब हो रहा था, 'अच्छा, ठीक है। न तेरा, न मेरा। न तीन, न पांच। चल, चार का हिसाब कर दे।'
दृश्य 4:
लोदी गार्डन में एक नौजवान जोड़ा आया। हवलदार को जोड़ा अनजाना-सा लगा, 'के रे, पैली बार आया है?' 'हां, सिपाही जी।' 'रेट पता है, न?' 'किस चीज का?' 'चुम्माचाटी का?' 'कितना है?' 'चुंगी भरणी है तो 500 और नहीं भरणी तो जित्ता तू दे सके।' 'पैसे न होवे तो?' 'तो कहीं और जा के बैठ। यहां बैठ्ठणा है तो नियम मानना पड़ेगा। और, नियम ये है कि चुंबन ले तो पैसा दे।' 'पर, मेरे पास पैसे नहीं हैं, सच्ची। कसम से!' 'ठीक है। कैश नहीं, तो काइंड में दे दे।' 'मतलब?' 'मतलब जे कि मैं एक चक्कर लगा कर आऊं हूं। तब तक तू अपने चुम्मे ले ले, बाद में मैं लूंगा।' 'ये कैसे हो सकता है?' 'कैसे नहीं हो सकता, रे? जब मरीन ड्राइव पर हो सकता है तो लोदी गार्डन में काहे नहीं?'
दृश्य 5:
जैसे ही नौजवान जोड़ा लोदी गार्डन में आ कर बैठा, पुलिसवाला भी आ गया। नौजवान रौब से बोला, 'पहचाना नहीं क्या? मैं, कमिश्नर साहब का बेटा!' 'सॉरी बबुआ, भूल हो गयी। आप आराम से बैठ्ठो। मैं इधर फटकूंगा भी नहीं। कुछ नास्ता-कोल्ड डिं्रक भिजवाऊं?'
हो सकता है यह नियम लागू करते समय प्रशासन को सच्चे प्रेमियों का ख्याल आ जाए और जुम्मे के दिन चुम्मे फ्री कर दिये जाएं।
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साभार - प्रभासाक्षी











4 टिप्पणियाँ.:
हा..हा..हा.. मजा आ गया भाई साहब
सही है।
अनुराग
बहुत बढ़ियां सोच का परिंदा उड़ा.
:)
समीर लाल
हा..हा..हा.. मजा आ गया भाई साहब
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