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September 9, 2005

भारतेंदु हरिश्चन्द्र की दो हज़लें (हास्य ग़ज़लें)

हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दो हास्य ग़ज़लें
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(भारतेन्दु हरिश्चन्द्र संस्कृत, उर्दू, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बँगला के भी विद्वान थे तथा संगीत, धर्म, दर्शन सब में माहिर थे. मात्र 35 वर्षों के जीवन काल में ही (9 सितंबर 1850- 6 जनवरी 1885) भारतेन्दु ने इतना कुछ साहित्यिक सृजन कर लिया, वह भी उस दौर में जब साहित्यिक-सहूलियतों का घोर अकाल था – ऐसी मिसाल कम ही मिलती है. उस जमाने में भी भारत की दशा संभवतः वही थी जो आज है- बानगी देखिए –चूरन साहब लोग जो खाता, सारा हिन्द हजम कर जाता.)

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हज़ल
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नींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से
तंग आया हूँ मैं इस पुरसोज़ दिल के साज से

दिल पिसा जाता है उनकी चाल के अन्दाज़ से
हाथ में दामन लिए आते हैं वह किस नाज़ से

सैकड़ों मुरदे जिलाए ओ मसीहा नाज़ से
मौत शरमिन्दा हुई क्या क्या तेरे ऐजाज़ से

बाग़वां कुंजे कफ़स में मुद्दतों से हूँ असीर
अब खुलें पर भी तो मैं वाक़िफ नहीं परवाज़ से

कब्र में राहत से सोए थे न था महशर का खौफ़
वाज़ आए ए मसीहा हम तेरे ऐजाज़ से

बाए गफ़लत भी नहीं होती कि दम भर चैन हो
चौंक पड़ता हूँ शिकस्तः होश की आवाज़ से

नाज़े माशूकाना से खाली नहीं है कोई बात
मेरे लाश को उठाए हैं वे किस अन्दाज़ से

कब्र में सोए हैं महशर का नहीं खटका ‘रसा’
चौंकने वाले हैं कब हम सूर की आवाज़ से

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ग़ज़ल जबानी शुतुरमुर्ग परी हसब हाल अपने के
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गाती हूँ मैं औ नाच सदा काम है मेरा
ए लोगो शुतुरमुर्ग परी नाम है मेरा

फन्दे से मेरे कोई निकलने नहीं पाता
इस गुलशने आलम में बिछा दाम है मेरा

दो-चार टके ही पै कभी रात गंवा दूं
कारुं का खजाना तभी इनआम है मेरा

पहले जो मिले कोई तो जी उसका लुभाना
बस कार यही तो सहरो शाम है मेरा

शुरफा व रूज़ला एक हैं दरबार में मेरे
कुछ खास नहीं फ़ैज तो इक आम है मेरा

बन जाएँ चुगद तब तो उन्हें मूड़ ही लेना
खाली हों तो कर देना धता काम है मेरा

ज़र मज़हबो मिल्लत मेरा बन्दी हूँ मैं ज़र की
ज़र ही मेरा अल्लाह है ज़र राम है मेरा

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1 टिप्पणियाँ.:

प्रमेन्द्र प्रताप सिंह् said...

भारतेंदु हरिश्चन्द्र अच्छी लगी

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